दलित राजनीति के प्रतीक और वोट बैंक

आज राजनीतिक दलों में संत रविदास की जयंती मनाने की होड़ लगी है। सभी दल उन्हें एक प्रतीक चिन्ह के तौर पर रख दलित वर्ग को लुभाना चाहते हैं। लेकिन सच्चे मायने में संत रविदास समाज को तोडऩे की नहीं जोडऩे की बात करते हैं, जिसका राजनीतिक दलों में आभाव नजर आता है।

sanjay sharma editor5भारतीय राजनीति में डॉ भीमराव अम्बेडकर को दलित राजनीति का बड़ा प्रतीका माना जाता है। बाबा साहब के समाजिक परिवर्तन के विचार बहुत ही क्रांतिकारी रहे। इन्हीं का प्रस्तुतीकरण हमें संविधान में भी मिलता है। लेकिन अंबेडकर से इतर दूसरे दलित विचारकों को समाज में वह जगह नहीं मिल सकी, जो होनी चाहिए थी। बदलते वक्त में देश की राजनीतिक पार्टियां वोट बैंक के लिए सही इसी खोज को पुख्ता कर रही हैं। ऐसे में दूसरे दलित चेहरों को तरजीह मिलती दिखाई देती है।
बीते 22 फरवरी को जिस तरह संत रविदास की जयंती पर भाजपा सहित दूसरी पार्टियों ने कार्यक्रम का आयोजन किया, इससे इसी तरह की पुष्टि होती दिख रही है। इससे पहले भी संत रविदास की जयंती मनाई जाती रही है, लेकिन कभी किसी पार्टी ने किसी दूसरी पार्टी पर हमला नहीं बोला था। इस तरह की राजनीति नए तौर पर देश की पार्टियों में दिखाई दे रही हैं।
संत रविदास सर्वसमाज की अवधारणा के संत रहे। शायद हमारे समाज ने भले ही उन्हें अपनाने में देर कर दी हो, लेकिन उनके उपदेश समाज के सभी वर्गों को अमन और भाईचारे का संदेश देते रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों में जिस तरह से संत रविदास की जयंती को लेकर घमासान मचा है, वह हमारे राजनीतिक ऊहापोह को दिखाता है। इससे यह भी पता चलता है कि वर्तमान राजनीतिक दल इतिहास से सबक नहीं लेना चाहते। यह हमारे लिए चिंतन और चिंता का विषय है। उनकी स्वीकार्यता सिर्फ राजनीतिक और प्रतीकात्मक है। सामाजिक भेदभाव को खत्म करने और समता मूलक समाज की स्थापना करने में हम आज भी असफल रहे हैं। हमने उनके जीवन दर्शन को व्यापक रूप में नहीं स्वीकार किया। देश की मौजूदा दलित राजनीति भी संत रविदास के उपदेशों पर खरी नहीं उतरती। सामाजिक बदलाव के लिए यह सबसे बड़ा खतरा बनती दिख रही है। अंबेडकर सहित संत रविदास को हमने समाजवादी न बनाकर व्यक्ति और जातिवादी जंजीरों में बांध दिया। जिस उद्देश्य से उन्होंने अपने सामाजिक संघर्ष की शुरुआत की थी, उसे अस्वीकार कर दिया गया। उसकी दिशा को ही मोडक़र नई परिभाषा बना दी गई। उस विचारधारा को निहित स्वार्थ की सीमा में घसीट राजनीतिक चोला पहना दिया गया। जहां सारे उद्देश्य अर्थहीन हो जाते हैं। जिस परिवर्तन की संत रविदास ने कल्पना की थी उसके संदर्भ अब बदल गए हैं, लेकिन उसकी मूल भावना आज भी कायम हैं। उन्हें वर्ण व्यवस्था से अधिक तकलीफ थी। वे इसे खत्म करना चाहते थे। उनके विचार में समाज में बराबरी का हक सभी को मिलना चाहिए। इसके लिए वर्ण व्यवस्था सबसे बड़ी बाधा थी। आज इनमें कमी आयी है, लेकिन अभी भी एक बड़ा तबका हाशिए पर है। जिसे की मुख्य धारा में लाना होगा। आज राजनीतिक दलों में संत रविदास की जयंती मनाने की होड़ लगी है। सभी दल उन्हें एक प्रतीक चिन्ह के तौर पर रख दलित वर्ग को लुभाना चाहते हैं। लेकिन सच्चे मायने में संत रविदास समाज को तोडऩे की नहीं जोडऩे की बात करते हैं, जिसका राजनीतिक दलों में आभाव नजर आता है।

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