दलितों, मुस्लिमों के बाद अब ब्राह्मणों पर डोरे डालने में जुटीं माया

  • जातियों के इसी गठबंधन के सहारे कांग्रेस ने लंबे समय तक किया है राज
  • सतीश चंद्र मिश्रा को सौंपी कमान, पांच दर्जन से अधिक स्थानों पर करेंगे सभाएं

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
1लखनऊ। यूपी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा की नैया पार लगाने के लिए पार्टी प्रमुख मायावती दलितों व मुस्लिमों के बाद अब ब्राह्मïणों पर डोरे डालने में जुट गई हैं। उन्होंने सतीश चंद्र मिश्रा और रामवीर उपाध्याय जैसे भरोसेमंद एवं कद्दावर पार्टी नेताओं को इसकी कमान सौंपी है। अपनी इस रणनीति से वह बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने में भी सफल हो सकती हैं। कभी इन्हीं जातियों के गठजोड़ के सहारे कांग्रेस ने प्रदेश में लंबे समय तक राज किया था। इसलिए माया का जातिगत कार्ड चुनाव की बिसात पर काफी अहम माना जा रहा है।
पिछले चुनाव में मिली हार से सबक लेते हुए मायावती ने एक बार फिर अपनी रणनीति बदली है। दरअसल, 2012 के चुनाव में बसपा को हार का सामना करना पड़ा था। हार की एक वजह ब्राह्मïणों का बसपा से मुंह मोड़ लेना माना जाता है। इस चुनाव में 85 आरक्षित सीटों में से सिर्फ 16 पर बसपा जीत दर्ज कर सकी थी। अपने चुनावी भाषणों में कभी सवर्ण जातियों को नकारने वाली मायावती ने बाद में प्रदेश की राजनीति की नब्ज समझी और सवर्णों को पार्टी में शामिल करने की मुहिम चलाई। इसके लिए उन्होंने सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का नारा दिया। इसका फायदा मायावती को निश्चित तौर पर मिला और 2007 के चुनाव में उन्हें पूर्ण बहुमत मिला। वे सत्ता पर मजबूती के साथ काबिज हो गई थीं। इसी सफलता को दोहराने के लिए उन्होंने एक बार फिर ब्राह्मïण कार्ड खेला है। सवर्ण विशेष कर ब्राह्मïण, दलित और मुस्लिमों के गठजोड़ के कारण ही प्रदेश में कांग्रेस ने कई दशकों तक राज किया था। बसपा इस फार्मूले को अपना कर पहले भी सफलता पा चुकी है और एक बार फिर उसी रास्ते पर चल पड़ी है। नई रणनीति के तहत चुनाव की कमान सतीश चंद्र मिश्रा और परिवार संभालेगा। श्री मिश्रा 62 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 30 सभाएं करेंगे। वह 25 सितंबर को कौशांबी से अपने अभियान की शुरुआत करेंगे। सतीश मिश्रा बसपा के कद्दावर नेता माने जाते हैं और इनकी ब्राह्मïणों में अच्छी पैठ है। दूसरी ओर, बसपा प्रमुख ने पश्चिमी यूपी की कमान पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय को सौंपी है। श्री उपाध्याय का ब्राह्मïण वोटों पर खासा प्रभाव है। कुल मिलाकर पुरानी रणनीति से बसपा इस बार सभी पार्टियों को पीछे छोड़ सत्ता हासिल करने में जुट गई है

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