तृप्ति देसाई और हाजी अली दरगाह

  • हाजी अली दरगाह में प्रवेश की तृप्ति देसाई की कोशिश को उतना व्यापक समर्थन नहीं मिला, जितना व्यापक समर्थन मंदिर के मामले में मिला था। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसका मजाक उड़ाया है। कई लोगों ने कहा कि हाजी अली दरगाह पर जाओ, तो वहां मिलने वाला ज्यूस जरूर पीयो, ज्यूस पीने में कोई महिला-पुरुष का भेद नहीं है। जाहिर है लोग मुद्दे की गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं। 
  • इसके विपरीत ऐसे बहुत से नेता और बुद्धिजीवी सोशल मीडिया पर सामने आए, जिन्होंने तृप्ति देसाई के समर्थन में खुलकर समर्थन व्यक्त किया। तृप्ति देसाई और हाजी अली दरगाह के बहाने कई लोगों ने मुस्लिम समाज पर आरोप-प्रत्यारोपों की झड़ी लगा दी।

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
भूमाता ब्रिगेड की तृप्ति देसाई जो काम कर रही हैं, अभी भले ही उसकी आलोचना हो रही हो, लेकिन उनके समर्थकों की संख्या भी कम नहीं है। समर्थकों का कहना है कि तृप्ति देसाई के काम का मूल्यांकन करने में समाज को कई साल लगेंगे। तृप्ति देसाई शनि शिंगनापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और पूजा के अधिकार को लेकर आंदोलन कर रही थीं और चार सौ साल पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए उन्होंने मंदिर में प्रवेश और पूजा की। उनके काम की सराहना करने वालों में प्रगतिशील लोगों की कमी नहीं है, लेकिन कुछ ऐसे भी लोग है, जिन्हें तृप्ति देसाई का यह काम रास नहीं आ रहा है।
जब तृप्ति देसाई ने मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश के अधिकार और पूजा की लड़ाई शुरू की, तब लोगों को लग रहा था कि वे इस उद्देश्य में शायद ही कामयाब हो पाएंगी, क्योंकि मामला धर्म से जुड़ा है। शासन, प्रशासन और न्याय पालिका ने तृप्ति देसाई के आंदोलन का साथ दिया। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कहा कि हिन्दुओं के धर्म स्थलों पर प्रवेश करना कोई खास बात नहीं है। तृप्ति देसाई की असल कामयाबी तब मानेंगे, जब वे हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा उठाएं और उसमें कामयाब हों।
तृप्ति देसाई ने इस मामले को भी उठाया और हाजी अली दरगाह में महिलाओं के जियारत की वकालत करते हुए कुछ सहयोगी महिलाओं के साथ हाजी अली दरगाह पहुंचीं। वहां उन्हें दरगाह में प्रवेश नहीं करने दिया गया। इसके बाद वे हाजी अली दरगाह के दरवाजे पर धरने पर भी बैठीं। कई लोगों को लगता है कि वे फिजूल के मुद्दे उठा रही हैं। इसके विपरीत बड़ी संख्या में लोग यह भी मानते हैं कि हम सब ईश्वर की संतान हैं और ईश्वर के सामने महिला और पुरुष में कोई अंतर नहीं है।
हाजी अली दरगाह में प्रवेश की तृप्ति देसाई की कोशिश को उतना व्यापक समर्थन नहीं मिला, जितना व्यापक समर्थन मंदिर के मामले में मिला था। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसका मजाक उड़ाया है। कई लोगों ने कहा कि हाजी अली दरगाह पर जाओ, तो वहां मिलने वाला ज्यूस जरूर पीयो, ज्यूस पीने में कोई महिला-पुरुष का भेद नहीं है। जाहिर है लोग मुद्दे की गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं।
इसके विपरीत ऐसे बहुत से नेता और बुद्धिजीवी सोशल मीडिया पर सामने आए, जिन्होंने तृप्ति देसाई के समर्थन में खुलकर समर्थन व्यक्त किया। तृप्ति देसाई और हाजी अली दरगाह के बहाने कई लोगों ने मुस्लिम समाज पर आरोप-प्रत्यारोपों की झड़ी लगा दी। मुस्लिम समाज के बहुत से लोग तृप्ति देसाई के साथ हैं और बहुत से उनसे खफा भी हैं। जो लोग तृप्ति देसाई के आंदोलन से खफा हैं, उनकी गालियां सोशल मीडिया पर आम हैं, लेकिन ऐसे लोग भी हैं, जो खुलकर तृप्ति देसाई के साथ में आ गए हैं।
कई लोगों ने तृप्ति देसाई के आंदोलन और उज्जैन में आए साधु-संतों की बातों को लेकर सोशल मीडिया पर गंभीर कमेंट्स किए। आश्चर्य है कि इस दौर में भी कई साधु-संत ऐसे हैं, जो महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने में आनाकानी कर रहे हैं। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर तृप्ति देसाई को खुलकर सलाह दी है कि वे अपने काम से काम रखें, दूसरों के धर्म के मामले में दखलअंदाजी न करें। उनकी जितनी बड़ी चादर है, उतने ही बड़े पैर पसारेंगी, तो अमन-चैन कायम रहेगा। अभी तो तृप्ति देसाई की लड़ाई काफी लंबी है और उन्हें लोगों का समर्थन भी मिलता नजर आ रहा है। सोशल मीडिया पर उनका मजाक उड़ाने वाले पहले भी थे और अभी भी हैं।

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