ताक पर नियम, राजधानी में जल संरक्षण के नाम पर हो रही खानापूर्ति

ताक पर नियम, राजधानी में जल संरक्षण के नाम पर हो रही खानापूर्ति

बारिश के पानी को संरक्षित करने के लिए बनाए गए नियमों का नहीं हो रहा पालन
अधिकांश बहुमंजिला इमारतों में शो पीस बने वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम
अंधाधुंध दोहन से लगातार गिर रहा भूमिगत जल स्तर, कई इलाकों की हालत बदतर

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। प्रदेश की राजधानी में एक ओर भूमिगत जल का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर जल संरक्षण के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। बारिश के पानी को संरक्षित करने के लिए बनाए गए नियमों का भी पालन नहीं हो रहा है। हालत यह है कि यहां की अधिकांश बहुमंजिला इमारतों में बनाए गए वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम शो पीस बन गए हंै। यही वजह है कि भूमिगत जल का स्तर बढऩे की बजाय घटना जा रहा है।
राजधानी में भूमिगत जल का स्तर लगातार घट रहा है। जल स्तर बढ़ाने के लिए सरकार ने वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को बनाने और बारिश के पानी का संचय करने के लिए नियम बनाया था। लेकिन इस पर आज तक अमल नहीं हो सका है। राजधानी के दीनदयाल नगर में 10.20, त्रिवेणीनगर में 9.81, महानगर में 9.55, लालबाग में 9.24 मीटर तक भूमिगत जल में गिरावट दर्ज की गई है। गोमती नगर, इंदिरा नगर, लालकुर्ती, आंचलिक विज्ञान नगरी, अलीगंज व चौक के हालात भी काफी चिंताजनक हैं। गौरतलब है कि औद्योगिक क्षेत्र के साथ-साथ निर्माण से लेकर पेयजल तक की जरूरतों को पूरा करने के लिए केवल भूजल का ही इस्तेमाल किया जा रहा है। कहने को तो लखनऊ में गोमती बहती है लेकिन पेयजल के लिए निर्भरता भूमिगत जल भंडारों पर ही है। निर्माण कार्यों के लिए भी भूजल का प्रयोग किया जा रहा है। इससे भूजल में लगातार गिरावट आ रही है। वहीं भूजल संरक्षण की कोशिश हवा-हवाई ही साबित हो रही है। जहां भूजल को संग्रहित करने के लिए पिटें बनाई गई वह खाली पड़ी हैं। सरकारी विभागों में वर्षा के जल को इस्तेमाल करने के लिए बनाये गए कम्पाउंड भी खस्तहाल हो चुके हैं। इस ओर किसी अधिकारी का ध्यान नहीं जा रहा है। केवल लखनऊ ही नहीं नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ आदि शहरों में भी भूजल भंडारण की स्थिति चिंताजनक है। जिन चंद सरकारी भवनों में वर्षा जल संचयन के इंतजाम किए भी गए हैं। वे देखरेख की कमी के चलते बेकार हो चुके हैं।

क्या है आदेश

बारिश का पानी जमीनी जल स्रोतों तक प्राकृतिक रूप से पहुंच सके इसके लिए शासनादेश जारी किया गया है। इसके तहत फुटपाथ व डिवाइडरों को कच्चा रखने या लूज टाइल्स लगाने के निर्देश दिए गए हंै लेकिन इस आदेश का अनुपालन नहीं हो रहा है। ऐसे में बारिश के पानी के रिसकर जमीन में जाने की संभावना नहीं दिख रही है।

जमीन पर नहीं उतरा अधिनियम

भूजल संरक्षण अधिनियम को अक्टूबर 2019 में मंजूरी मिल गई लेकिन इसे अभी भी प्रभावी रूप से लागू नहीं किया जा सका है। नियमों के अनुसार 5000 वर्ग मीटर से अधिक जमीन पर बने आवासों पर 300 वर्ग मीटर का कम्पाउंड बनाना अनिवार्य है। यह नियम सरकारी और प्राइवेट सहित आवासीय क्षेत्रों पर भी लागू होता है लेकिन इसका सख्ती से पालन नहीं कराया जा रहा है।

कराना होगा पंजीकरण

भूजल विभाग द्वारा इस दोहन पर अंकुश लगाने के लिए एक्ट लाने का प्रस्ताव है। इस प्रस्ताव के मुताबिक उद्योगों व बड़ी तादाद में जल दोहन करने वालों को विभाग में पंजीकरण कराना होगा। बगैर पंजीकरण दोहन करने वालों पर जुर्माना लगाया जाएगा। भूजल विभाग के निदेशक वीके उपाध्याय बताते हैं कि एक्ट में घरेलू उपभोक्ताओं को छोड़ अन्य पर नकेल कसने की तैयारी है। यही नहीं जल संचयन के लिए राज्य भूजल संरक्षण मिशन के तहत सभी विभागों को वर्षा जल संचयन संबंधी योजनाओं को एकीकृत तरीके से संकट ग्रस्त क्षेत्रों में लागू कराया जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि इससे भूजल स्तर में सुधार लाया जा सकेगा।

संस्थान प्रत्येक वर्ष दस शहरों में तीन हजार वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का निर्माण वर्षा जल को संरक्षित करने के लिए करता है। विभाग ने हाल में जल संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम चलाया था। अगले वर्ष तक हम वर्षा जल को ्रबड़ी मात्रा में संरक्षित कर पाएंगे।
वीके उपाध्याय, निदेशक, भूजल संरक्षण संस्थान

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