तपन बढऩे के साथ ही गर्मी ने रंग दिखाना कर दिया शुरू

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। समूचे उत्तर भारत में इस समय जबर्दस्त गर्मी पड़ रही है। प्रदेश के सभी प्रमुख शहरो में दिन का तापमान तैंतालीस डिग्री पार कर गया है। कानपुर, बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी, मेरठ सबका बुरा हाल है। राजधानी लखनऊ में दिन चढ़ते ही तापमान बढऩे के साथ गर्मी अपना असर दिखाने लगती है। ऐसे में सबसे बुरा हाल उन छोटे स्कूली बच्चों का है जिन्हें तपती दुपहरी में स्कूल छूटने के बाद घर लौटना पड़ता है। अभी जिला प्रशासन ने आठवीं तक के स्कूलों के बंद होने की कोई नोटिस नहीं जारी की है। आम तौर पर गर्मी बढऩे के साथ ही डीएम के आदेश के बाद छोटे बच्चों के स्कूल कालेज बंद हो जाते हैं।
दुपहरी में सडक़ों पर वीरानगी बढ़ गयी है। बहुत जरूरी काम हो तभी लोग निकलना पसंद कर रहे हैं। तपन और लू ने एयरकंडीशनरों की ठंडी हवा तक लोगों को समेटना शुरू कर दिया है। पंखे और कूलर बेकार साबित हो रहे हैं। गर्मी का मौसम आते ही मौसमी फल व सब्जियों की खपत और आपूर्ति बदलती जा रही है। खीरा, ककड़ी और तरबूज नजर आने लगे हैं। कोल्ड ड्रिंक वैसे तो अब हर मौसम का पेय बन चुके हैं लेकिन गर्मी के बढऩे के साथ ही इनकी खपत अचानक बढ़ गयी है। लखनऊ की मशहूर कुल्फी और ठंडाई के शौकीनों का भी अपना पसंदीदा वर्ग है। जलजीरा और आम का पना भी धड़ल्ले से बिक रहा है। इसके अपने अलग शौकीन हैं। इनकी अपनी पसंद है।
गर्मी और सहालग की वजह से दूध दही की मांग बढ़ गयी है। पराग के मठ्ठे के शौकीन अपनी तलब मिटाने के साथ साथ यह फतवा देते दिखाई देने लगे हैं कि इससे पेट दुरुस्त रहता है। शिकंजी और रूह आफजा की बिक्री में उछाल आया है। इन तमाम पेय पदार्थों की लिस्ट ठंडे पानी की बोतल की मांग बढ़ गयी है। पानी की प्यास सिर्फ पानी से ही बुझ सकती है। यह मुहावरा हर एक के लिए मुफीद साबित हो रहा है।

स्कूलों का खौफ, जुबान नहीं खोलते अभिभावक
लखनऊ। स्कूलों से आते ही बच्चों के साथ घर आती हैं अक्सर एक नयी फरमाइशें। यह फरमाइशें बच्चों की चॉकलेट या खिलौनों की नहीं बल्कि स्कूल से डिमांड की गयी चीजों की होती है। जिसे अगले दिन न ले जाने पर बच्चों को सजा पाने का डर होता है। ज्यादातर इंग्लिश मीडियम स्कूलों में आए दिन इस प्रकार की मांग की जाती है। जिससे अभिभावकों पर काफी दबाव होता है। राजधानी में ऐसे ही कुछ नामी स्कूल हैं जो कभी एक्टिविटी के नाम पर तो कभी फीस कन्वेंस, स्कूल ड्रेस के नाम पर इनकी कमीशनखोरी बिना किसी डर के जारी है।
राजधानी में ऐसे कई नामी ग्रामी स्कूल हैं जो अभिभावकों को अपनी मांग के चलते परेशानी में डालते रहते हैं। विपुल खण्ड स्थित किड्ïस कैंपस मे एक्टिविटी के नाम पर अभिभावकों को आए दिन अपनी जेबें ढीली करनी पड़ती हैं तो डीपीएस की एक ब्रांच में प्रवेश लेने पर एक छात्र के पिता ने बताया कि ढाई हजार रुपये यहां केवल स्कूल बैग के हैं। वहीं रेड रोज सीनियर सेकेंडरी स्कूल का फरमान था कि यूनीफार्म की बटन पर स्कूल का नाम होना चाहिए जिसके लिए उन्होंने दुकान का पता भी अभिभावकों को बताया। इस स्कूल ने नये सत्र शुरू होने पर अभिभावकों को दुविधा मेें डाल दिया कि अब सभी छात्रों को हाउस रंग के जूते पहनने होंगे। एसे कई अनोखी मांगें और बदलाव यह स्कूल करते रहते हैं।
अभिभावकों को अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए न ही इन स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए आवाज उठा पाते हैं और न ही उनकी इस बदसलूकी के खिलाफ कम्पलेन ही कर पाते हैं। स्कूल अभिभवकों की इसी कमजोरी का फायदा उठा कर अपनी तिजोरिया भर रहे हैं। अभिभावक परेशान हैं और अपनी जुबां भी नहीं खोलते। उनको डर रहता है कि कहीं स्कूल उनके बच्चों को कोई सजा न दे दें। डरते-डरते अपने बयान देते हैं।

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