तकनीकी हस्तांतरण के बिना अधूरा ‘मेक इन इंडिया’

कोकाकोला द्वारा अमेरिका स्थित अपने मुख्यालय से कनसन्ट्रेट का आयात किया जाता है। इसका पेमेंट कोकाकोला इंडिया द्वारा कोकाकोला अमेरिका को किया जाता है। यदि 100 रुपये के कनसन्ट्रेट का भुगतान 1000 रुपये किया जाये तो जाहिर है 900 रुपये को गैर कानूनी तौर से ही भेजा जायेगा। इस रकम पर भारत कोई भी कर नहीं लगाता।

डॉ. भरत झुनझुनवाला
प्रधानमंत्री मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ योजना कुछ रंग लाती दिख रही है। हाल दिनों में कम से कम पांच बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में स्मार्ट फोन बनाने की मंशा व्यक्त की है। इनमें सोनी, लेनोवो, एप्पल जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। यूरोप की हवाई जहाज बनाने वाली प्रमुख कंपनी एयरबस ने भी ऐसी मंशा जताई है। इसके विपरीत माइक्रोसाफ्ट ने फिलहाल हाथ खींच रखे हैं। ध्यान देने की बात यह भी है कि दिलचस्पी लेने वाली कंपनियों में अधिकतर स्मार्ट फोन निर्माता हैं। दूसरे उद्योग जैसे स्टील, मेडिकल सामग्री, इलेक्ट्रिकल स्विचगेयर, दवाएं, चाकलेट आदि के निर्माताओं में उदासी बनी हुई है। विश्व के मैनूफैक्चरिंग बाजार में स्मार्ट फोन का हिस्सा एक प्रतिशत से बहुत कम होने का मेरा अनुमान है। ऐसे में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मेक इन इंडिया में रूचि लेना ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। मैनूफैक्चरिंग के मूल में मेक इन इंडिया में प्रगति होती नहीं दिख रही है। फिर भी संभव है कि स्मार्ट फोन के भारत में बनने शुरू होने के बाद दूसरे उत्पाद भी यहां बनने लगें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन से हमें आधुनिक तकनीकें मिलने लगेंगी। ये तकनीकें भविष्य में हमारे आर्थिक विकास की आधारशिला बन सकती हैं।
इस रणनीति में खतरा दूसरे स्थान पर है। सामान्यत: माना जाता है कि विदेशी कंपनियों के द्वारा आधुनिक तकनीकें लाई जाती हैं जैसे सुजुकी नई पीढ़ी की कारों को भारत में लाई। लेकिन जरूरी नहीं कि इन तकनीकों को हासिल करने के लिए सुजुकी जैसी विदेशी कंपनी का आगमन जरूरी हो। अनेक अध्ययन बताते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा आधुनिक तकनीकों को ट्रांसफर कम ही किया जाता है। यूनिवर्सिटी आफ आक्सर्फोड द्वारा किये गये अध्ययन में पाया गया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तकनीकों का ट्रांसफर स्वत: नहीं होता। विशेष दबाव बनाने पर ही ये तकनीकों का ट्रांसफर करते हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी अंकटाड ने पाया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तकनीकों का ट्रांसफर मुख्यत: विकसित देशों के बीच ही होता है। जैसे अमेरिकी कंपनियों द्वारा फ्रांस में निवेश करने पर तकनीक का ट्रांसफर होता है परन्तु उसी कंपनी द्वारा भारत में निवेश करने पर तकनीक का ट्रांसफर नहीं होता है। विश्व बैंक के अधिकारियों के द्वारा किये गये अध्ययन में पाया गया कि विदेशी निवेश के लाभ हासिल करने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर कुछ प्रतिबंध लगाना जरूरी है। स्पष्ट है कि बिना उचित प्रावधानों के बहुराष्ट्रीय कंपनियां तकनीकी हस्तांतरण नहीं करतीं। यहां समस्या है कि शर्तें लगाने पर शायद बहुराष्ट्रीय कंपनियां आये ही नहीं। दोनों तरफ संकट है। शर्त नहीं लगायेंगे तो तकनीक का हस्तांतरण नहीं होगा और मेक इन इंडिया कार्यक्रम मु_ी भर विदेशी कंपनियों तक सिमट कर रह जाएगा।
यहां चीन के अनुभव को समझने की जरूरत है। सही है कि चीन ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आह्वान किया और विश्व को मैनूफैक्चरिंग हब बन गया। परन्तु चीन की इस सफलता में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के योगदान के विषय में संशय बना हुआ है। चीन में मैनूफैक्चरिंग के विकास में घरेलू कंपनियों का भारी योगदान रहा है। इसके अतिरिक्त वर्तमान में चीन की विकास दर में आ रही गिरावट में इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्राफिट तथा रायल्टी को स्वदेश भेजने की अहम भूमिका दिखती है। अत: चीन के माडल का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।
मेक इन इंडिया कार्यक्रम के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का खुला आह्वान करने पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मेजबान देश में कमाए गये लाभ के बड़े हिस्से को अपने मुख्यालय भेज दिया जाता है। तकनीकों की रायल्टी के मद पर भी रकम भेजी जाती है। मुख्यालय से खरीदे गये सामानों का दाम अनाप-शनाप बढ़ाकर भी रकम को भेज दिया जाता है। जैसे कोकाकोला द्वारा अमेरिका स्थित अपने मुख्यालय से कनसन्ट्रेट का आयात किया जाता है। इसका पेमेंट कोकाकोला इंडिया द्वारा कोकाकोला अमेरिका को किया जाता है। यदि 100 रुपये के कनसन्ट्रेट का भुगतान 1000 रुपये किया जाये तो जाहिर है 900 रुपये को गैर कानूनी तौर से ही भेजा जायेगा। इस रकम पर भारत कोई भी कर नहीं लगाता। इसी कोला का उत्पादन यदि भारतीय कंपनी करती तो कोई भी रकम बाहर नहीं भेजनी पड़ती।
विदेशी कंपनियों को यह बताने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि कौन सी आधुनिक तकनीकें वे लेकर आयेंगी और किस प्रकार भारतीय कंपनियों को उनकी तकनीक हस्तांतरण करेंगी। इन प्रस्तावों को उद्योग मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल देना चाहिए और स्वीकृति देने के पहले जन सुनवाई करनी चाहिए जिससे इनके प्रभाव की जानकारी रखने वाले उद्यमी तथा अर्थशास्त्री अपनी बात कह सकें।

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