डॉक्टरों की कमी

वर्तमान में शहरों में तो स्थिति फिर भी ठीक है लेकिन गांवों की स्थिति बहुत खराब है। देश के गांव डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं और डॉक्टर शहर छोडक़र जाना नहीं चाहते। इसका परिणाम है कि ग्रामीणों को इलाज के लिए शहर आना पड़ता है। जहां दो-चार सौ रुपए में इलाज होना चाहिए वहां इलाज के लिए हजारों रुपए खर्च हो जाते हैं। इसके अलावा परेशानी अलग से। गांवों, कस्बों में सीएचसी, पीएचसी केन्द्र बनाए गए हैं वहां संसाधन न होने के कारण लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता है।

sanjay sharma editor5प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मानते हैं कि देश में डॉक्टरों की कमी है। इसीलिए उन्होंने डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 65 करने की घोषणा की। उनका तर्क है कि हम डॉक्टर तो पैदा नहीं कर सकते लेकिन जो डॉक्टर हैं उनकी सेवा तो ले सकते हैं। प्रधानमंत्री का कहना एकदम जायज है। देश की सवा अरब की आबादी पर लगभग 9 लाख 20 हजार डॉक्टर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में औसतन 1217 लोगों पर मात्र एक डॉक्टर है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की क्या स्थिति है। वर्तमान में शहरों में तो स्थिति फिर भी ठीक है लेकिन गांवों की स्थिति बहुत खराब है। देश के गांव डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं और डॉक्टर शहर छोडक़र जाना नहीं चाहते। इसका परिणाम है कि ग्रामीणों को इलाज के लिए शहर आना पड़ता है। जहां दो-चार सौ रुपए में इलाज होना चाहिए वहां इलाज के लिए हजारों रुपए खर्च हो जाते हैं। इसके अलावा परेशानी अलग से। गांवों, कस्बों में सीएचसी, पीएचसी केन्द्र बनाए गए हैं वहां संसाधन न होने के कारण लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसका नतीजा यह है कि कस्बों में झोलाछाप डॉक्टरों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो समस्याओं को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इलाज के नाम पर पैसे बना रहे हैं और बदले में गंभीर बीमारी दे रहे हैं। अधिकांश झोलाछाप डॉक्टर स्टेरायड देकर इलाज कर रहे हैं। गांवों, कस्बों में स्थापित सीएचसी, पीएचसी पर जिन डॉक्टरों की तैनाती जो वास्तव में डॉक्टर है उन्हें गांवों में जाना नहीं है। सीएचसी, पीएचसी पर जिनकी तैनाती है वह वहां जाते नहीं। अक्सर वहां ताला लटका रहता है। स्वास्थ्य मंत्रालय की मानें तो देश में करीब चार लाख डॉक्टरों की और जरूरत है, ताकि दूर-दराज के गांवों के लोग बुनियादी चिकित्सा सुविधा से वंचित न रह जाएं। फिलहाल सबसे ज्यादा डॉक्टरों की संख्या महाराष्ट्र और तमिलनाडु में है। कहने को तो नौ लाख से ज्यादा डॉक्टर पंजीकृत हैं लेकिन देश में काम करने वाले डॉक्टरों की संख्या छह से साढ़े छह लाख ही है। देश की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इंजीनियरों की तरह डॉक्टर भी विदेश चले जाते हैं। सरकार अक्सर कहती है कि इस तरफ ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन ध्यान देने के बाद सरकार इस दिशा में क्या कर रही है यह जल्दी पता नहीं चल पाता। किसी भी मुल्क की सरकार की प्राथमिकता में स्वास्थ्य प्रथम पायदान पर होता है लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं है। गंभीर बीमारियां बढ़ती जा रही हैं लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या नहीं बढ़ रही है। संसाधन के नाम पर बेड बढ़ा दिए जाते हैं लेकिन मर्ज की दवा कौन लिखेगा इस तरफ ध्यान नहीं दिया जाता। डॉक्टरों की कमी का ही नतीजा है कि ओपीडी में लाइन लगने के बाद भी मरीज डॉक्टर से मिल नहीं पाते और बिना इलाज के लौटना पड़ता है।

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