ठेंगे पर डीजीपी के आदेश, दंडित पुलिस कर्मियों को भी जल्द मिलती है तैनाती

  • यूपी के कई जिलों में चल रहा मनमानी तैनाती का खेल

 आमिर अब्बास
Capture 4लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक के आदेशों को खुद पुलिस विभाग ने ही ठेंगे पर रख दिया है। डीजीपी भले ही तमाम दिशा निर्देश जारी कर पुलिस अफसरों के ज़रिये नियमों का पालन कराने का पाठ पढ़ायें, लेकिन सब कुछ बेकार साबित हो रहा है। सत्ता में पकड़ रखने वालों और जाति विशेष से ताल्लुक रखने वालों को उनकी मर्जी के मुताबिक थानों पर तैनाती दी जा रही है। रायबरेली, सुल्तानपुर और सहारनपुर समेत कई अन्य जिलों में अल्पसंख्यक थानेदारों की तादाद सिफर है। इतना ही नहीं डीजीपी के हुक्म को दरकिनार कर दण्डित पुलिसकर्मी को झांसी में एसओ बना दिया गया।
उत्तर प्रदेश में पुलिस विभाग का सारा सिस्टम मनमानी करने पर आमादा है। प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार के गठन के बाद से खुद मुख्यमंत्री अफसरों पर मनमानी का इल्जाम लगाते रहे हैं। लेकिन अब हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। राजधानी लखनऊ से हर जिले में अफसरों की मनमानी सरकार के कामकाज पर भारी पड़ रही है। प्रदेश भर में नियमानुसार आठ प्रतिशत अल्पसंख्यकों को जिलों में थानेदारी देने का प्रावधान है। लेकिन इस नियम की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यदि हम लखनऊ जोन की बात करें तो शहर के 43 थानों में तीन की जगह सिर्फ एसओ पीजीआई जुबैर अहमद को अल्पसंख्यक थानेदार के तौर पर तैनाती मिली हुई है। रायबरेली में 18 थानों में एक भी अल्पसंख्यक थानेदार नहीं है। इसी तरह का हाल सुल्तानपुर जिले का भी है। जहां 17 थानों में से एक भी थानेदार नहीं है। हालात सीतापुर में भी कुछ ऐसे ही हैं, जहां 25 थानों में दो थानेदारों की जगह सिर्फ इमलिया सुल्तानपुर थाने पर एहतेशाम अहमद को अल्पसंख्यक कोटे से थानाध्यक्ष बनाया गया है। यही हालात प्रदेश में करीब करीब अन्य सभी जिलों की भी है। लखनऊ से लेकर गाजियाबाद और नोएडा से लेकर बनारस तक अल्पसंख्यक थानेदारों / कोतवालों की अनदेखी हो रही हैं। बात सहारनपुर की हो तो यहां पर भी हालात और जगहों की तरह ही हैं। जहां 21 थानों में एक भी अल्पसंख्यक थानेदार नहीं है, कुछ ऐसे ही हालात मुरादाबाद, मेरठ, बिजनौर, वाराणसी, इलाहाबाद के भी हैं। कानपुर के 44 थानों में 3 की जगह सिर्फ 2 अल्पसंख्यक थानेदार है ।
नियम विरुद्ध तैनाती सिर्फ कोटे को लेकर ही नहीं है ,बल्कि डीजीपी के आदेशों को दरकिनार कर दण्ड पाए थानेदारों को भी पोस्टिंग मिल रही है, पूर्व में लखनऊ में तैनात रहे देवेन्द्र दूबे का स्थानांतरण झांसी कर दिया गया था। जहां 31 मई को तत्कालीन एसएसपी मनोज तिवारी ने देवेन्द्र दूबे को एसओ प्रेमनगर की कुर्सी सौंप दी, विवादों से चोली दामन का निभाने वाले देवेन्द्र दूबे को एसएसपी लखनऊ मंजिल सैनी ने एक पुराने मामले में 2 जुलाई 2016 को आदेश संख्या द-771/2015 में मिस कंन्डक्ट दे दिया बावजूद इसके देवेन्द्र दूबे आज भी एसओ प्रेमनगर हैं ये तो सिर्फ एक बानगी भर है। ऐसे न जाने कितने मामलों में पुलिस अफसर अपने चहेतों को बचाने के लिए अपने ही अफसरों के आदेशों को हवा में उड़ा रहे हैं। बावजूद इसके थानों पर तैनात थानेदार अपनी मनमानी पर उतारु है। लेकिन अधिकारियों के चहेतों थानेदारों को न तो किसी अधिकारी का डर है और न किसी बात का खौफ। यही कारण है कि कई थानों में दिग्गज थानेदार लम्बे समय से मौज काट रहे है।

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