ट्रामा सेंटर में बिना सिफारिश के नहीं मिलता इलाज, तीमारदारों से होती है बदसलूकी

राजधानी के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर सीरियस कंडीशन में मरीज को देखते ही खड़े कर लेते हैं हाथ
आए दिन होता है विवाद, वरिष्ठï चिकित्सकों को करना पड़ता है हस्तक्षेप

captureवीरेंद्र पांडेय
लखनऊ। राजधानी के केजीएमयू स्थित ट्रामा सेन्टर में बिना सोर्स और सिफारिश के मरीजों का इलाज करवाना मुश्किल होता जा रहा है। यहां गंभीर रोगों से पीडि़त मरीजों और दुर्घटना आदि में घायल लोगों को भर्ती करने में आनाकानी और इलाज में लापरवाही बरतने के मामलों में बढ़ोतरी होती जा रही है। ट्रामा सेंटर में रोजाना मरीजों और तीमारदारों के बीच विवाद की घटनाएं सीएमएस और वीसी तक पहुंचती हैं, जिसकी वजह से केजीएमयू की साख पर भी बट्टा लग रहा है। लेकिन जूनियर डॉक्टर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे में मजबूरन वरिष्ठ चिकित्सकों को हस्तक्षेप करना पड़ता है। आलम ये है कि वरिष्ठ चिकित्सकों की सिफारिश न हो तो ट्रामा सेंटर में मरीज को भर्ती करवाना मुश्किल हो जायेगा। ऐसे में गंभीर बीमारी से पीडि़त मरीजों और दुर्घटना में घायल लोगों के लिए वरिष्ठ चिकित्सक ही उम्मीद की किरण बनकर आये हैं।
ट्रामा सेन्टर में इलाज की आस में आने वाले ढेरों मरीज ऐसे मिल जाएंगे, जिन्हें अटेंड किए बिना डांट फटकार कर लौटा दिया जाता है। रात के समय में स्थिति और गंभीर हो जाती है क्योंकि गंभीर बीमारी से पीडि़त मरीजों और एक्सीडेंटल केस को केवल ट्रामा का ही सहारा रह जाता है। सीरियस केस को अपने यहां एडमिट करने में अधिकांश सरकारी अस्पताल आनाकानी करते हैं। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों के आभाव का हवाला देकर मरीज को ट्रामा सेन्टर भेज दिया जाता है। लेकिन ट्रामा के जूनियर डॉक्टर बिना जांच और इलाज के मरीज को भगाने में गुरेज नहीं करते हैं। जिन मरीजों की वरिष्ठï चिकित्सकों से बात हो पाती है, ट्रामा में केवल उन्हीं को इलाज मिल पाता है।
ट्रामा में आने वाले मरीजों के लिए केजीएमयू के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ.वेद प्रकाश कई बार उम्मीद की किरण बनकर सामने आये हैं। केजीएमयू के उपचिकित्सा अधीक्षक मरीजों की समस्याओं का समाधान करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। यदि कोई मरीज रात के दो बजे भी उनको फोन करता है, तो वह उसकी मदद के लिए तैयार हो जाते हैं। पीलिया के मरीज को रात भर स्ट्रेचर पर लिटाए रखा ट्रामा सेन्टर के मेडिसिन विभाग में कुछ दिनों पहले डॉ. सीताराम की लापरवाही के कारण सिद्वार्थ नगर निवासी मंजू यादव (20) की जान पर बन आयी थी। डॉक्टर ने मरीज की पुरानी रिपोर्ट देखते ही कहा कि उसका इलाज यहां नहीं हो सकता है। मरीज को बेहतर इलाज के लिए बलरामपुर या फिर पीजीआई जाना चाहिए। जिसके बाद परिजनों ने डॉक्टर के सामने काफी हाथ पांव जोड़े कि इस हालत में मरीज को कहां लेकर जाये। लेकिन धरती के भगवान से यमराज बने डॉ.सीताराम का दिल नहीं पसीजा। लेकिन जब अस्पताल के उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वेद प्रकाश ने हस्तक्षेप किया, तो मरीज को भर्ती किया गया। इसके बाद मरीज को पूरी रात बिना इलाज के स्ट्रेच पर लिटाए रखा गया। डॉ. वेद प्रकाश अगले दिन सुबह जब राउंड पर निकले और मरीज के साथ बदसलूकी की जानकारी हुई, तो स्टाफ के लोगों को फटकार लगाई और मरीज को दूसरे चिकित्सक के पास भेजकर इलाज शुरू करवाया। प्लास्टर बांधने में लगा दिए तीन दिन फैजाबाद के रुदौली निवासी लक्खा देवी (70) तीन दिनों तक ट्रामा सेन्टर में पड़ी रही। लेकिन जूनियर डॉक्टर इलाज के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति करते रहे। डॉक्टरों ने प्लास्टर बांधने के लिए मरीज और उसके परिजनों को दोपहर तीन बजे से लेकर रात के 12 बजे तक ऑपरेशन थियेटर के सामने खड़ा रखा। तब परिजनों ने डॉ. वेद से मुलाकात की और उनको सारी बात बताई। उप चिकित्सा अधीक्षक ने मामले को गंभीरता से लेकर तत्काल मरीज का इलाज शुरू कराया। इस बात की जानकारी मरीज को घंटों इंतजार करवाने वाले जूनियर डाक्टरों को हुई, तो उन्होंने परिजनों को जमकर लताड़ा और भद्दी गालियां दी। इतने से भी मन नहीं भरा तो मरीज को जान से मारने की धमकी दे डाली। इसकी शिकायत परिजनों ने कुलपति से की तो उन्होंने डॉ. वेद को मामले की जांच कर मामला सुलझाने का निर्देश दिया।

 

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