जेएनयू में लगे नारों पर चिदंबरम की राय बेतुकी

 राजनाथ सिंह ‘सूर्य’ 

केंद्रीय सरकार में विभिन्न मंत्रालयों का दायित्व संभालने वाले जाने माने कानूनविद पी. चिदम्बरम की राय मानी जाये तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लगाए गए ‘आजादी के नारे’ और लोकमान्य तिलक द्वारा घोषित ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ में कोई अंतर नहीं है। आजकल देशभक्ति और देशद्रोह के संदर्भ में चल रही बहस के संदर्भ में पी. चिदम्बरम ने जो साम्य जेएनयू परिसर के नारे और लोकमान्य तिलक की हुंकार में किया है, उसे परावर्तन मानसिकता की निकृष्टतम अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। जो लोग देशद्रोह की परिभाषा करने में लगे हैं संभवत: उनमें से वे भी जो अलगाव और पृथकतावादी अभिव्यक्तियों को तब तक देशद्रोह मानने के लिए तैयार नहीं हैं जब तक कि उसके लिए सशस्त्र हिंसा न हो, चिदम्बरम की व्याख्या से शायद ही सहमत हों।
जिस कांग्रेस पार्टी के वे सदस्य हैं, वह भी ऐसी तुलना करने का साहस नहीं कर सकती। लेकिन लोकतांत्रिक भारत में कुतर्क के द्वारा विघटनयुक्त अनास्था के विस्तार का जो अभियान चल रहा है, वह अब केवल कश्मीर घाटी या वनीय इलाकों में शस्त्र उठाये नक्सलियों तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि बौद्धिक प्रगल्मता का प्रमाण बनकर ‘इंटलेक्चुअल्स’ का मापदंड निर्धारित करने वाला माना जा रहा है। देश के एक जाने-माने विधि विशेषज्ञ नरीमन ने कहा है कि जेएनयू में लगाए गए आजादी के नारे या पाकिस्तान जिंदाबाद अथवा इंडिया गो बैक या फिर भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की अभिव्यक्ति और संसद पर हमला करने वालों को भगत सिंह जैसा शहीद बताने वाली अभिव्यक्ति देशद्रोह नहीं है क्योंकि इसके लिए शस्त्र तो उठाया नहीं गया। यदि इन विद्वान लोगों की बात मान ली जाये तो अब भारत माता की जय, वन्दे मातरम का उद्घोष, राष्ट्रध्वज के सम्मान का आग्रह ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। इस प्रकार का आग्रह करने वालों को ‘फासिस्ट’ करार देने के साम्यवादी अभियान को अब जो समर्थन मिल रहा है वैसा पहले शायद ही कभी मिला है।
आज की स्थिति में यदि विधि विशेषज्ञ या प्रबुद्ध होने का दावा करने वालों की समीक्षा स्वीकार कर ली जाये तो यही निष्कर्ष निकलता है कि भारत माता की जय, वन्देमातरम और तिरंगे का सम्मान राष्ट्रभक्ति का प्रतीक नहीं है और न ही पाकिस्तान जिन्दाबाद, भारत के खण्ड-खण्ड करने का आह्वान, आजादी के नारे या आतंकी हमलावरों को महात्मा बताना देशद्रोह है। कुछ मु_ीभर लोगों द्वारा भारतीय अस्मिता विरोधी अभियान की कार्यवाही इतनी अखर गई कि बहस का मुद्दा मोडक़र विश्वविद्यालयों का भगवाकरण, अभिव्यक्ति की आजादी के छीनने और साम्राज्यवादी देशद्रोह के कानून की चर्चा के रूप में ढालकर विषयान्तर कर दिया गया। वे लोग भी इस विषयान्तर में बढ़-चढक़र भागीदारी कर रहे हैं जिन्होंने संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर लटकाने का काम कर देशवासियों की प्रशंसा हासिल की थी। अब उनके लिए अफजाल ‘गुरुजी’ हो गए हैं। यह वैसा ही है जैसे कुछ वर्ष पूर्व दिग्विजय सिंह के लिए ओसामा बिन लादिन ‘ओसामाजी’ हो गए थे जिन्हें ऐसी पुस्तक का विमोचन करने में शर्मिंदगी भी नहीं आई जिसमें लिखा गया था कि मुंबई में 26/11 का हमला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साजिश थी। जिस बेशर्मी और बदजुबानी के साथ देशद्रोह को अपराध की परिधि से बाहर निकालने के लिए विचारवान माने जाने वाले लोग मुखरित हो रहे हैं और मीडिया में टीआरपी के लोभ में बहस को उछाला जा रहा है, उससे एक बात बहुत स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए देश के जनमत की बदलाव की अपेक्षा पूरी होने के मार्ग में बाधा डालने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपतियों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को परिसर में प्रमुखता से फहराने के निर्णय पर तरह-तरह से प्रश्नचिन्ह न लगाया जाता। अनावश्यक से लेकर अव्यवहारिक तक का तर्क देने के पीछे मानसिकता क्या यह नहीं दर्शाती कि चाहे मोदी सरकार हो या कुलपतियों का सम्मेलन, जो भी निर्णय करे उसका आंख मूंदकर विरोध किया जायेगा। विश्वविद्यालयों के प्रांगण में तिरंगा फहराने के संकल्प पर की जा रही प्रतिक्रिया हास्यास्पद तो है ही, घातक भी है। शिक्षा संस्थाओं राष्ट्रगान के आग्रह का विरोध तो पहले से ही हो रहा है और दुनियाभर को पहली बार भारत की सबसे बड़ी देन योग, जिसे उसने स्वीकारा है, साम्प्रदायिक या मजहबी आचरण को थोपने के अभियान से वर्गीय तनाव बढ़ाने का काम हो चुका है।
किसी घटना या अभिव्यक्ति से कितना विद्वेष बढ़ाया जा सकता है इसके लिए घात लगाकर सन्नद्ध लोगों की सक्रियता बढ़ती जा रही है। भारतीय जनमानस को संवैधानिक आस्था, राष्ट्रीय प्रतिबद्धता तथा कानून की मान्यता से विपरीत दिशा में ढकेलने के इस प्रयास का जैसा उफान इस समय आया है, उससे देश पर किसी विदेशी हमले से ज्यादा संकट छा रहा है। प्रगल्मता युक्त अभिव्यक्तियों को प्रमुखता देने में मुद्दे से भटककर मीडिया का बड़ा भाग पक्षपातपूर्ण प्रचार का शिकार हो गया है। उसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक छात्र की गिरफ्तारी में जन्मकुंडली तक को उजागर करने में पूरा दमखम लगा देने से गुरेज नहीं है लेकिन केरल में किसी युवक की उसके बूढ़े माता पिता के समक्ष घर में घुसकर हत्या कर डालने का संज्ञान भी लेने की सुधि नहीं है। एक हत्या सुर्खियों में बनी रहती और दूसरी संज्ञानविहीन, ऐसा क्यों?

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