जीवन के हर क्षेत्र में अतुलनीय प्रदर्शन किया मालवीय जी ने

 मृत्युंजय दीक्षित
महामना मदन मोहन मालवीय का व्यक्तित्व बहुत ही अद्भुत था। जीवन को कोई क्षेत्र ऐसा नहीं था जहां उन्होंने अपनी विद्वता का अद्भुत व अतुलनीय प्रदर्शन न किया हो। पत्रकारिता के क्षेत्र में मालवीय जी के व्यक्तित्व का समग्र रूप हमें दिखाई देता है। देश की स्थिति के अनुसार उस समय उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से जो संदेश दिया है। उससे हम आज भी लाभ उठा सकते हैं।
मालवीय जी का पत्रकारिता व लेखन कार्य का शुभारंभ सन् 1907 में हुआ। जब बसंत पंचमी के दिन उन्होंने अपने राजनैतिक और सांस्कृतिक विचारों के प्रसार के लिए ‘अभ्युदय’ नाम का साप्ताहिक पत्र निकालना प्रारंभ किया। उन्होंने दो वर्ष पत्र का स्वयं संपादन किया। उनके संपादकत्व में ‘अभ्युदय’ सदा नि:स्वार्थ निर्भीक और नम्र रहा। अमीर और गरीब सभी के लिए अभ्युदय समान रहा। शिष्टाचार को अभ्युदय ने कभी नहीं छोड़ा। एक सच्चे ब्राह्मण के रूप में जो उपदेश उन्होंने दिये उसमें भारतीय आत्मा और संस्कृति बसती थी।
सन् 1909 में मालवीय जी ने अपने मित्रों के सहयोग से विजयादशमी के दिन 24 अक्टूबर से अंग्रेजी दैनिक लीडर का प्रकाशन प्रारंभ किया। इस कार्य में मोती लाल नेहरू ने भी योगदान दिया। लगभग 10 वर्षों तक लीडर ने नि:स्वार्थ भाव व बड़े लगन से सेवा की।
मालवीय जी के लेखों में सच्ची देशभक्ति स्वदेशी की भावना सच्ची राजभक्ति राष्ट्रीयता, स्वराज्य पर स्पष्ट रूप से विचार परिलक्षित होते हैं। उन्हीं के अथक प्रयासों से ही 1910 में हिंदी पाक्षिक मर्यादा का प्रयाग से निकलना प्रारंभ हुआ। 1933 में उन्होंने हिंदी साप्ताहिक सनातन धर्म की स्थापना की तथा कुछ वर्षों तक इन पत्रों के संपादक रहे। यह मालवीय जी के प्रयासों का ही परिणाम था कि हिंदुस्तान का हिंदी संस्करण भी 1936 में प्रारंभ हो गया। सन 1910 के प्रारंभ में ही मालवीयजी ने डटकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि केवल तीन-चार दिन की सूचना के बाद शीघ्रता से विधेयक को पास कराना अनुचित है। 6 अगस्त 1910 को मालवीय जी ने प्रेस विधेयक के विरोध में भाषण दिया था।
पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने मौलिकता एवं नवीनता के मानदंड स्थापित किये। लेखन में उनकी विशिष्ट भाषा शैली थी। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे। वे विचारों में उदार एवं प्रगतिशील थे। वे गुणग्राही थे। प्रगतिशील नवयुवा विद्वानों का वे आदर करते थे। समाचारपत्रों के माध्यम से प्रगतिशील विचारों का प्रसार ही उनकी पत्रकारिता का ध्येय था। राजा रामपाल सिंह के आग्रह पर हिन्दुस्तान के संपादन का उत्तरदायित्व ग्रहण किया। उनके संपादकत्व में हिंदुस्तान ने काफी लोकप्रियता अर्जित की थी। राजा साहब खाने पीने के बेहद शौकीन थे। अत: मालवीय जी ने कुछ संकोच के बाद इस शर्त पर हिंदुस्तान का सम्पादकत्व स्वीकार किया कि जब राजा साहब खाते-पीते हों तब उन्हें न बुलायें। मालवीय जी की नियुक्ति उस समय 150 रुपये मासिक पर हुई पर बाद में उनका वेतन 200 रुपये दिया गया। उनमें सम्पादकीय शालीनता पर पालन, सत्पथ का समर्थन, राष्ट्रहित की पुष्टि व्यक्तिगत कटाक्ष से निर्मुक्त समालोचना उनकी पत्रकारिता के सद्गुण थे।
तत्कालीन सरकार भी उनके पत्र को लोकोपयोगी स्वीकार करती थी। राजा साहब मालवीय जी के काम से पूरी तरह संतुष्ट थे और उनका बड़ा आदर और सम्मान करते थे।
परंतु लगभग ढाई वर्ष के बाद एक दिन राजा साहब ने उन्हें तब बुला भेजा जब वे नशे में थे। उनका कमरा शराब की गंध से भरा था। इधर उधर की कुछ बातें करने के बाद राजा साहब ने पंडित अयोध्यानाथ के विषय में कुछ ऐसी बातें कह दीं जो मालवीय जी को बहुत बुरी लगीं। उन्होंने उसी समय हिंदुस्तान का सम्पादकत्व छोडऩे का निश्चय कर लिया। उन्होंने राजा साहब से कहा कि आज से मेरा अन्न जल आपके यहां से उठ गया है। आपसे जो शर्त रखी थी वह तोड़ दी। यह कहकर मालवीय जी घर चले गये। राजा साहब ने बहुत मनाया लेकिन मालवीय जी ने हिंदुस्तान का सम्पादकत्व फिर से ग्रहण नहीं किया।
सन् 1889 में कालांकार से प्रयाग लौट आने पर मालवीय जी पंडित अयोध्यानाथ के नेतृत्व में अंग्रेजी दैनिक इंडियन ओपिनियन में सहसम्पादक का काम करने लगे। उनकी मान्यता थी कि किसी भी पत्र की सफलता मुख्यत: उसके सम्पादक की योग्यता, विश्लेषण क्षमता और विषयवस्तु को प्रतिपादित करने की शैली पर निर्भर है। एक संपादक के रूप में वह समाचारों के संकलन, पत्र के गेटअप, करेक्शन, प्रूफरीडिंग में एक-एक बात की स्वयं परख करते थे। कभी-कभी वे मशीन पर चढ़ाई गयी सामग्री को उतरवाकर ठीक करते थे। महामना के समय में पत्रकारिता एक मिशन हुआ करता था। इस रूप में महामना ने अपने मिशन को जो ऊंचाइयां दीं वह आज की पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।

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