जीने का अधिकार: स्त्री का पहला अधिकार

कहने को तो दुनिया भर के मौलिक अधिकार संविधान की धारा 21 में समाये हैं। जीवन जीने का अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार, किसी भी धर्म में आस्था रखने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, संगठन बनाने का अधिकार। किन्तु ये अधिकार तो ऐसे हैं, जैसे जौहरी की दूकान में सजे गहने। यदि हममें इल्म होगा, तभी तो हम अपने अधिकारों का स्वरूप पहचानेंगे।

 इंदिरा मिश्र
3 जून 2015 की एक बड़ी खबर यह थी, कि छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के एक ग्रामीण बाप ने अपनी दो बेटियों माधुरी व पूजा (10 व 5 वर्ष) को कुएं में धकेल कर उन्हें मार डाला और प्रचार यह किया, कि बाईक पर सवार बच्चा चोर जैसे कुछ लोग आये और उसकी दोनों बेटियों को पकड़ कर ले गये। उन्होंने उसकी आंखों में लाल मिर्च पाउडर डालकर बच्चों को उनसे छीन लिया था। किन्तु दोनों बेटियों की चप्पलें दूसरे दिन, एक दूरदराज के गांव के कुएं में तैरती मिलीं, जबकि उनके शव निकाल लिए गए थे। बाप का नाम था चन्द्रदेव, और बच्चियों की मां का नाम प्रेमलता है। प्रेमलता से चन्द्रदेव की अनबन थी। इसका एक कारण यह भी था, कि चन्द्रदेव बेटा चाहता था। बच्चियों से मुक्ति पाकर वह प्रेमलता का त्याग करके दूसरा विवाह करना चाहता था।
किन्तु पुलिस द्वारा उसे हिरासत में लेकर पूछताछ करने के दौरान वह सच बताने को मजबूर हो गया। ऐसे सच को सुनने वाले हैरान और अवाक् रह गये। यह सोच कर वे हैरान रह गये, कि इस बाप ने क्षण भर को यह भी नहीं सोचा कि इस जमाने में पुलिस लड़कियों की खोज सरगर्मी से करेंगी। वह उनकी अप्राकृतिक मृत्यु के बारे में पता लगा कर गंभीरता से कातिल के बारे में तहकीकात करेगी! जब उसके जघन्य कृत्य को दुनिया जानेगी और न्यायालय उसे मौत की सजा देगा कि उसने एक समाज-विरोधी, हैवानियत का काम किया है और वह केवल इसलिए कि उसे बेटी नहीं, बेटे की इच्छा थी? इस घटना से ऐसा प्रतीत होता है, कि बेटी-बेटे को बराबर प्यार दो, बेटियों को भी जीने का अधिकार दो, पर शिक्षा केवल शहरों तक सीमित है। गांवों में अभी-भी वही पुराना पूर्वाग्रह चला आ रहा है, जिसमें बेटों पर ही पूरे परिवार की खुशहाली केन्द्रित मानी जाती है।
इस घटना से वह भी विदित होता है कि हमारे आम नागरिक को भारतीय संविधान दंड संहिता, न्यायिक विधि-विधान, पुलिस किसी का न कोई अता-पता है और न ही कोई डर है। वोट डालने सभी जाते हैं, लेकिन इस बात का उनको इल्हाम नहीं है कि भारतीय संविधान स्त्री-पुरुष बेटे-बेटी दोनों को एक समान न्याय देना आदर्श व्यवस्था मानता है। अब इस उच्च आदर्श को धरातल पर लाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। कौन इस चुनौती का सामना करेगा? हमारे प्रबुद्ध पढ़े-लिखे लोग बेटा-बेटी बराबरी की बातों को औपचारिक स्वीकृति तो देते हंै, लेकिन खुद उन पर नहीं चलते। उदाहरण के लिए दहेज लेना और देना एक बहुत कटु सच्चाई है। ऐसे बिरले ही लोग होते हंै, जिन्हें दहेज से परहेज हो।
कहने को तो दुनिया भर के मौलिक अधिकार संविधान की धारा 21 में समाये हैं। जीवन जीने का अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार, किसी भी धर्म में आस्था रखने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, संगठन बनाने का अधिकार। कानून के समक्ष बराबरी का अधिकार और कानून से सम्मान रूप से संरक्षण पाने का अधिकार। किन्तु ये अधिकार तो ऐसे हैं, जैसे जौहरी की दूकान में सजे गहने। यदि हममें इल्म होगा, तभी तो हम अपने अधिकारों का स्वरूप पहचानेंगे। यदि हमारे जेब में वकील की फीस होगी या हमारी मदद के लिए कोई समाज सुधार की संस्था आगे आयेगी। तभी तो हम असमान बर्ताव के खिलाफ न्यायालय का फैसला लायेंगे, उस फैसले पर अमल करने का तरीका पा सकेंगे। सबसे जरूरी अधिकार है जीने का अधिकार। माधुरी और पूजा से यह अधिकार चला गया। उनकी मां प्रेमलता के हृदय पर जो कुठाराघात हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा? अपने पति से प्रेमलता का मनमुटाव यों भी था। अब उसकी तो दुनिया ही उजड़ गई और मुझे डर है कि वह जीते जी मर गई। क्या उसे कोई आशा दिलाने को आगे आयेगा?

 

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