जीएसटी लागू होने के झटके भी

राजीव रंजन झा

मानसून सत्र में संसद में सबसे ठोस कार्य वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक को पारित कराना है। हालांकि, राजनीतिक शोर-शराबे वाले मुद्दे अक्सर ही ठोस कार्य को दबा देते हैं, फिर भी उम्मीद है कि मोदी सरकार इस सत्र में जीएसटी पारित कराने में सफल हो सकती है।
क्षेत्रीय दलों ने जीएसटी को समर्थन देने की घोषणा करके इस उम्मीद को संबल दिया है। तृणमूल कांग्रेस ने पहले ही इसकी घोषणा कर रखी थी। अब नीतीश कुमार ने भी घोषणा कर दी है। लगता है कि जीएसटी के विरोध में कांग्रेस अकेली पड़ रही है। कांग्रेस सैद्धांतिक रूप से इस पर कोई विरोध नहीं कर रही है, मगर ऐसी शर्तें रख रही है, जिन्हें मानना केंद्र सरकार के लिए मुश्किल हो। इनमें से एक अहम शर्त यह है कि 18 प्रतिशत की एक ऊपरी सीमा जीएसटी कानून के अंदर डाल दी जाये, यानी भविष्य में कोई भी सरकार जीएसटी की दर 18 प्रतिशत से अधिक नहीं रख सके।
अगर यह सीमा कानून के अंदर रहेगी, तो इससे अधिक दर लागू करने के लिए भविष्य की किसी सरकार को फिर से बिल्कुल वैसी ही प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिस प्रक्रिया से गुजर कर अभी यह कानून बनाया जा रहा है। इसीलिए भाजपा इसके विरुद्ध है। उसका तर्क यह भी है कि किसी भी तरह के कर की दर को संविधान में डालने की परंपरा नहीं रही है।
जीएसटी को देश में कर कानूनों को सरल बनाने की दिशा में एक युगांतकारी सुधार माना जा रहा है। इस बारे में दो आशंकाएं हैं। पहली- शुरुआती वर्षों में नयी व्यवस्था के अनुरूप ढलने में अर्थव्यवस्था को समय लग सकता है और संक्रमण अवधि में इसे थोड़े झटके लग सकते हैं। दूसरी- जीएसटी लागू होने से तात्कालिक रूप से कई क्षेत्रों में दाम बढऩे के आसार रहेंगे। जीएसटी लागू होने पर इसकी दर कितनी रहेगी, इसे लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है। लेकिन विभिन्न विश्लेषकों और रिपोर्टों के आधार पर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार इसे 20-22 प्रतिशत पर रख सकती है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस इससे कम, 18 प्रतिशत की ऊपरी सीमा वाली शर्त रख रही है, ताकि सरकार के लिए इसे मानना मुश्किल हो।
हालांकि, शुरू में जब जीएसटी की चर्चा चली थी, तो जीएसटी दर 20-22 प्रतिशत जितनी ऊंची होने की बात नहीं थी। जीएसटी लागू करने की पहल वाजपेयी सरकार के समय ही शुरू हो गयी थी और यूपीए-1 की सरकार ने भी इस विचार को आगे बढ़ाया। तब चर्चा थी कि जीएसटी लगभग 12 प्रतिशत रखा जा सकता है। इंडिया रेटिंग्स के मुताबिक, एक दशक पहले वित्त मंत्रालय की एक समिति ने दरों के पहलू का अध्ययन करके ऐसी उदासीन दर पर पहुंचने का प्रयास किया था, जिस पर राज्यों को कोई वित्तीय नुकसान नहीं हो। उस समिति का निष्कर्ष था कि ऐसी उदासीन दर 14-15 प्रतिशत हो सकती है।
उस समय सेवा कर या सर्विस टैक्स 10 प्रतिशत पर था, जिसको बढ़ा कर पहले 12 प्रतिशत किया गया। उत्पाद शुल्क या एक्साइज ड्यूटी कुछ सामानों पर 20 प्रतिशत, या 24 प्रतिशत जितनी ऊंची थी, तो कुछ सामानों पर 10 प्रतिशत थी। तब यह विचार बना था कि धीरे-धीरे सेवा कर और उत्पाद शुल्क दोनों को 16 प्रतिशत की ओर ले जाया जाये। इसमें से आधा हिस्सा केंद्र और आधा हिस्सा राज्यों के बीच बांटने की बात थी। जब जीएसटी पर चर्चा बढ़ी, तो इसके मूल विचार से काफी भटकाव आये। जीएसटी का मतलब है कि सारे सामानों और सारी सेवाओं पर एक बराबर दर से कर (टैक्स) लगाया जाये और पूरे देश को एकल बाजार बना दिया जाये। मगर विभिन्न हितों को ध्यान रखते हुए अलग-अलग वस्तुओं को इसके दायरे से बाहर रखने की मांगें उठने लगीं। राज्यों की ओर से कई तरह के दबाव बनने लगे। उत्पादक राज्यों और खपत वाले राज्यों के बीच के मतभेद उभरे।
सवाल उठा कि सेवा कर से हासिल पैसा तो अभी केवल केंद्र सरकार के पास रहता है, तो क्या राज्यों को भी सेवाओं पर कर लगाने का अधिकार दिया जाये। एक दशक से ज्यादा समय तक चली बहसों और बातचीत के बाद जीएसटी किस रूप में लागू हो, इसका एक मोटा खाका बन गया है। इसमें जीएसटी की मूल धारणा के मुकाबले कई विसंगतियां हैं। लेकिन सवाल यह कि बिल्कुल सुलझा हुआ जीएसटी लागू करने के लिए अनंत समय तक प्रतीक्षा की जाये, या थोड़े-बहुत अनसुलझे सवालों के साथ इस समय जिन बातों पर सहमति बन पा रही है, उनके साथ आगे बढ़ा जाये।
बहरहाल, इस समय जीएसटी के दायरे से पेट्रोलियम उत्पादों और शराब जैसी कुछ चीजों को बाहर रखने का फैसला किया गया है। ये चीजें केंद्र और राज्य सरकारों को भारी आय देती हैं। सुनील सिन्हा जैसे अर्थशास्त्री मानते हैं कि इन चीजों को जीएसटी से अलग रखने की वजह से जीएसटी की उदासीन दर बढ़ कर अब 20-22 प्रतिशत पर पहुंच रही है। इतनी ऊंची जीएसटी दर का परिणाम क्या होगा?
वैसे तो जीएसटी एक सक्षम कर प्रणाली है, लेकिन यह बात मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के लिए ज्यादा सही है। सेवा क्षेत्र में आम तौर पर उत्पादन के इतने चरण नहीं होते। बहुत सी सेवाएं सीधे सेवा प्रदाता और सेवा हासिल करनेवाले के बीच का लेन-देन हैं। ऐसे मामलों में अभी अगर 15 प्रतिशत सेवा कर है। यदि जीएसटी लागू होने पर 22 प्रतिशत हो जाये, तो ग्राहक पर एकदम से अतिरिक्त बोझ पड़ जायेगा।
निर्मित (मैन्युफैक्चर्ड) वस्तुओं में भी जीएसटी तभी तक अतिरिक्त बोझ नहीं डालता, जब तक उसकी शृंखला बगैर टूटे चलती रहे। लेकिन आज भी खुदरा दुकानों पर किसी सामान के लिए बिल बनाने को बोलें, तो दुकानदार कहता है कि वैट का पैसा ऊपर से देना होगा।
हम यह भी जानते हैं कि किसी भी सामान या सेवा पर जब कर में राहत मिलती है, तो उसका फायदा उपभोक्ता को नहीं दिया जाता, लेकिन कर में वृद्धि होते ही उसका असर तुरंत ग्राहक के सिर पर डाल दिया जाता है। ऐसे में जीएसटी की ऊंची दर के नाम पर तमाम सामानों और सेवाओं के खुदरा मूल्य में वृद्धि होना बहुत स्वाभाविक होगा। यानी जीएसटी लागू होने के साथ ही महंगाई में तेज बढ़त का झटका लग सकता है।

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