जिन्हें अस्पताल में रहना चाहिए, वह निपटा रहे हैं कागजी काम

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे शहर के सरकारी अस्पताल
करीब 124 विशेषज्ञ डॉक्टरों को किया गया है स्वास्थ्य विभाग से संबद्घ

सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टरों की भारी कमी है। विशेषज्ञ डॉक्टरों को अस्पताल में ही रखना उचित होगा ताकि मरीजों को बेहतर ईलाज मिल सके।
-डॉ. आशुतोष दुबे, चिकित्सा अधीक्षक, सिविल अस्पताल

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। लखनऊ के अधिकांश सरकारी अस्पतालों से करीब 125 विशेषज्ञ डाक्टरों को स्वास्थ्य विभाग से संबद्ध कर दिए गया है। जिन डाक्टरों की जरूरत मरीज को है उन्हें कागजी काम में लगा दिया गया है। ऐसा तब है जब शहर के सरकारी अस्पतालों में विश्ेाषज्ञ डॉक्टरों का टोटा है।
गौरतलब है कि प्रदेश सहित राजधानी के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। इसके बाद भी डॉक्टरों को लगातार स्वास्थ्य निदेशालय से लगातार संबद्व किया जा रहा है। अगर इन डॉक्टरों को शहर के सरकारी अस्पतालों में स्थानान्तरित कर दिया जाय तो कम से कम राजधानी के सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा व्यवस्था पटरी पर आ सकती है। कुछ दिनों पहले ही बलरामपुर अस्पताल के गैस्ट्रो विशेषज्ञ डा.आरबी सिंह, ,डफरिन अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मीनू सागर, झलकारीबाई अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.पी.एल. अग्रवाल तथा बलरामपुर अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. आई सरन को स्वास्थ्य निदेशालय से अटैच किया गया है। ये तो कुछ नाम हैं, ऐसे ही करीब 124 विशेषज्ञों को स्वास्थ्य निदेशालय अटैच किया गया है।

स्वास्थ्य महानिदेशालय के पास नहीं है कोई नीति
प्रांतीय चिकित्सा संघ के अध्यक्ष डॉ. अशोक यादव का कहना है कि प्रदेश के अस्पतालों में करीब 33 हजार विशेषज्ञ डॉक्टर की कमी है, जबकि उपलब्धता तीन हजार डॉक्टरों की है। स्वास्थ्य निदेशालय के पास विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को दूर करने की कोई स्पष्टï नीति नहीं है। निदेशालय के पास विशेषज्ञ डॉक्टरों के जरूरत का कोई आंक ड़ा ही नहीं है। पूरे प्रदेश में करीब 1500 विशेषज्ञ डॉक्टर अंडर सीएमओ के पद पर तैनात हैं। उदाहरण के तौर पर तमाम सर्जन और स्त्री रोग विशेषज्ञ की सीएचसी पर पोस्टिंग की गई है, जहां पर उनका विशेष काम नहीं है।

अगर एक सर्जन किसी बड़े अस्पताल में होता तो यह साल में करीब 1200 ऑपरेशन करके देता जिससे मरीजों को सुविधा मिलती। डॉ. यादव का कहना है कि स्वास्थ्य महानिदेशालय में लगभग 40 से 50 विशेषज्ञ डॉक्टर हैं। इन सीनियर डॉक्टरों के अस्पतालों में तबादला होने से कोई खास फर्क नहीं पडऩे वाला। जब डॉक्टरी फील्ड में बहुत ज्यादा अनुभव हो जाता है, ऐसे डॉक्टरों को ही डायरेक्टर, ज्वाइंट डायरेक्टर सहित तमाम उच्च पदों पर बिठाया जा सकता है। ऐसे में मुद्दा ये नहीं हे कि स्वास्थ्य निदेशालय से विशेषज्ञ डॉक्टरों को सम्बद्व किया गया है बल्कि ये है कि स्वास्थ्य निदेशालय के पास कमी को दूर करने के लिए कोई स्पष्टï ढांचा नही है। इस मामले में जब डीजी हेल्थ डॉ. विजयलक्ष्मी से बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनका फोन नहीं उठा।

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