जाति-धर्म, सियासत और सुप्रीम कोर्ट

क्या नेताओं को चुनाव की प्रक्रिया और इसकी शुचिता का स्वयं ध्यान नहीं रखना चाहिए? क्या जब तक सुप्रीम कोर्ट निर्देश न जारी करे तब तक ऐसी कोई पहल जनप्रतिनिधि नहीं कर सकते हैं? भारतीय लोकतंत्र की यही विडंबना है। यहां चुनाव के लिए हर तरीके के हथकंडे अपनाए जाते हैं। छोटे से छोटे चुनाव में बाहुबल और धनबल का इस्तेमाल किया जाता है।

sajnaysharmaअब चुनाव में जाति, धर्म और भाषा के नाम किसी भी पार्टी का कोई भी उम्मीदवार अपने पक्ष में वोट की अपील नहीं कर सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी किसी प्रकार की अपील को गैरकानूनी घोषित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धर्म, जाति और भाषा का इस्तेमाल वोट मांगने के लिए नहीं किया जा सकता है। हिंदुत्व मामले में दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने ये फैसला सुनाया है। फैसले में साफ कर दिया गया है कि यदि किसी पार्टी का उम्मीदवार ऐसा करता है तो इसे जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत भ्रष्टï आचरण माना जाएगा। कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है इसलिए किसी भी उम्मीदवार के क्रिया-कलाप धर्मनिरपेक्ष होने चाहिए। कोर्ट का यह फैसला उस वक्त आया है जब देश के कई राज्यों में चुनाव होने हैं। सवाल यह है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को इस तरह का फैसला क्यों लेना पड़ा? क्या जनप्रतिनिधि खुद ऐसा नहीं कर सकते थे? क्या नेताओं को चुनाव की प्रक्रिया और इसकी शुचिता का स्वयं ध्यान नहीं रखना चाहिए? क्या जब तक सुप्रीम कोर्ट निर्देश न जारी करे तब तक ऐसी कोई पहल जनप्रतिनिधि नहीं कर सकते हैं? भारतीय लोकतंत्र की यही विडंबना है। यहां चुनाव के लिए हर तरीके के हथकंडे अपनाए जाते हैं। छोटे से छोटे चुनाव में बाहुबल और धनबल का इस्तेमाल किया जाता है। हकीकत यह है कि देश की चुनाव प्रक्रिया भले ही धर्मनिरपेक्ष रही है लेकिन चुनाव मैदान में ताल ठोंकने वाले अधिकांश उम्मीदवार धर्म, जाति और भाषा का इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए करते हैं। इन चुनावों में क्षेत्रीयता भी प्रमुख तत्व होती है। जाहिर है क्षेत्रीयता कई बार भाषा के आधार पर निर्धारित होती है। यही नहीं कई पार्टियां तो चुनाव जीतने के लिए सांप्रदायिक भावनाओं को भडक़ाती हैं। दंगे-फसाद तक कराए जाते हैं। वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए तमाम तरीके के असंवैधानिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। अधिकांश चुनावों में जातीय समीकरण तैयार किए जाते हैं। सियासी दल हिंदू, मुस्लिम और अन्य जातियों के आधार पर प्रत्याशियों का चयन करती हैं। ऐसे में उनसे धर्मनिरपेक्ष होने की उम्मीद करना ही बेमानी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से इस पर निश्चित रूप से दूरगामी असर पड़ेगा। उम्मीद है जनप्रतिनिधि इस मामले पर गौर करेंगे। यह एक ऐतिहासिक फैसला है और इससे निश्चित रूप से भारत में लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत और गहरी होंगी।

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