जाति के नाम पर वोट जुगाड़

सूबे में दलित और महादलित के मुद्दे पर तो राजनीति पहले से ही सरगर्म रहती थी, लेकिन अब विभिन्न पार्टियां की ओर से जातियों की गोलबंदी भी तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल विभिन्न जातियों पर पकड़ रखने वाले नेताओं को अपनी ओर लाने में जुटे हैं। इस बात को इससे समझा जा सकता है कि सूबे में जाति-सम्मेलनों का दौर बदस्तूर जारी है।

प्रदीप सिंह
बिहार में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सियासी पारा चढऩे लगा है। हालांकि अभी चुनाव होने में कुछ महीने शेष हैं, लेकिन सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों को अंजाम देने में जुट गए हैं। ज्ञात हो कि बिहार की राजनीति हमेशा पेचीदगियों से भरी रही है। तकरीबन अब तक हुए हर चुनाव में जातिगत समीकरणों की एक अहम भूमिका रही है। यूं कहें कि जाति के नाम पर सियासी दलों ने वोट बैंक को पक्का करने की हर जुगत की और इन दलों को काफी हद तक कामयाबी भी मिली।

मगर बीते लोकसभा चुनाव के बाद सूबे की राजनीति ने कुछ ऐसी करवट ली कि पक्के दोस्त दुश्मन बन गए और पक्के दुश्मन अब दोस्त बन बैठे हैं। जाहिर है कि इस गठबंधन के पीछे जातिगत समीकरण भी एक अहम वजह है। हालांकि, बिहार में बीते लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में एनडीए को तगड़ी कामयाबी हाथ लगी लेकिन अब विधानसभा चुनावों में अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने आपस में हाथ मिलाकर एनडीए को मजबूत चुनौती दी है। इसमें जातिगत वोट बैंक भी अहम कारक है। सितंबर-अक्टूबर महीने में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। सूबे के सभी समीकरणों के मद्देनजर बीजेपी ने अभी तक अपना उम्मीदवार भी घोषित नहीं किया है। भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे कर के विकास के नाम पर ही वोट लेने की राजनीति में मशगूल है।

साल में 1989 में मंडल राजनीति के बाद बिहार में पिछड़ी जातियों का खासा उदय हुआ और उसके बाद से सत्?ता की बागडोर इनके राजनीतिक नेतृत्व के हाथों में चला गया। साल 1990 से 2005 तक लालू-राबड़ी और इसके बाद से नीतीश कुमार का शासन अभी तक चलता चला आ रहा है। ज्ञात हो कि दोनों ही नेता पिछड़ी जाति से आते हैं। हालांकि, इन नेताओं के आने के बाद पिछड़ी जातियों के वोट भी बंटे। लालू ने जहां यादव-मुसलमान तो नीतीश ने उच्च जातियों, अन्य-पिछड़ी जातियों के कुर्मी-कोइरी और दलितों का एक सामाजिक गठबंधन बना लिया। करीब ढाई दशक से बिहार की राजनीति इसी सामाजिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूम रही है।

अब राजनीतिक चुनाव की आहट के बाद सभी राजनीतिक दल फिर से जातीय समीकरण को साधाने में जुट गए हैं। सूबे में चुनाव पहले से ही जातीय आधार पर लड़े जाते रहे हैं। हालांकि, साल 2005 और 2010 के विधानसभा चुनावों के दौरान जाति-कार्ड के बजाय विकास को मुख्य मुद्दा बनते लोगों ने देखा था। इस दौरान यह लगा था कि बिहार के लोग जातीय भावना से अब ऊपर उठ गए हैं, उन्होंने इसी में बदलाव के तहत नीतीश कुमार के हाथों में सत्ता सौंपी थी। हालांकि, उस समय नीतीश की पार्टी जेडीयू एनडीए का अहम हिस्सा थी। एक सकारात्मक दिशा की ओर बढऩे को लेकर लोगों में उम्मीद जगी। लालू राज से निकलने की जद्दोजहद के बीच सूबे के मतदाताओं ने नीतीश के नाम पर वोट किया और उन्हें सत्ता की बागडोर सौंपी। परंतु इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन चुनावों में भी वोटों को अपने अपने तरीके से जाति के नाम पर साधा गया। एक बार तो लगा था कि जातिगत मुद्दे थोड़ा कमजोर पड़ेंगे लेकिन जाति कार्ड खूब चला। साल 2015 आते-आते अब सभी दलों का जोर फिर से जातीय समीकरण बिठाने पर है। ‘मोदी बयार’ अब उतने सशक्त तरीके से बहती नजर भी नहीं आ रही है। इसी के तहत बीजेपी ने एलजेपी प्रमुख रामविलास पासवान और आरएलएसपी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा को साथ लेकर इन वोट बैंक को पक्का करने की पूरी रणनीति बनाई। यह जातिगत वोट ही है जो बीजेपी को मांझी के साथ आने के लिए मजबूर कर रहा है। इस सबके बावजूद बीजेपी का यह कहना है कि पार्टी बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक छवि के आधार पर लड़ेगी और इसमें जीत हासिल करेगी। यह चुनाव जाति या धर्म के आधार पर नहीं लड़ा जाएगा।

सूबे में दलित और महादलित के मुद्दे पर तो राजनीति पहले से ही सरगर्म रहती थी, लेकिन अब विभिन्न पार्टियां की ओर से जातियों की गोलबंदी भी तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल विभिन्न जातियों पर पकड़ रखने वाले नेताओं को अपनी ओर लाने में जुटे हैं। इस बात को इससे समझा जा सकता है कि सूबे में जाति-सम्मेलनों का दौर बदस्तूर जारी है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि नीतीश की अगुवाई वाली सरकार ने तेली, बढ़ई, चौरसिया जाति को अति पिछड़ा वर्ग में और लोहार जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने का निर्णय कर चुकी है।

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