जाट समाज के आरक्षण की मांग

हाल में उठा गुजरात का पटेल आंदोलन भी समाज को एक बड़ी सीख देता है। पटेल समाज हमारे समाज की मुख्यधारा में काफी आगे है। हां किसी समाज के कुछ लोग यदि पीछे हैं तो उन्हें आगे लाने की कवायद की जानी चाहिए। इसके लिए आरक्षण का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता।

sanjay sharma editor5जाट आरक्षण फिर से चर्चा का केंद्र बना हुआ है। हरियाणा में आंदोलन कर रहे जाट समाज के इस आंदोलन ने फिर से हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है। इससे रेल और दूसरी व्यवस्थाओं को भारी नुकसान पहुंच रहा है। सरकार की पेशकस ठुकरा चुके जाट नेताओं ने आंदोलन खत्म करने से इनकार भी कर दिया। आरक्षण हमारी व्यवस्था में कमजोर वर्ग को मुख्यधारा में लाने का जरिया रहा है। जाट समाज हमारी मुख्यधारा में उचित प्रतिनिधित्व रखता है। ऐसे में इस वर्ग की आरक्षण की मांग जायज नहीं दिखती।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछली बार मार्च 2015 में जाटों को ओबीसी कोटा के तहत आरक्षण देने के केंद्र के फैसले को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि केंद्र का फैसला दशकों पुराने आंकड़ों पर आधारित रहा और आरक्षण के लिए पिछड़ेपन का आधार सामाजिक होना चाहिए, न कि आर्थिक या शैक्षणिक। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह ने कहा था कि हम जाट आरक्षण का समर्थन करते हैं। कोई कमी रह गई हो तो उसे दूर करेंगे, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच में अपील करेंगे और अपनी बात रखेंगे। कुछ इसी तरह की बात हरियाणा के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा ने भी कही थी। हुड्डा ने कहा था कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए, क्योंकि एनडीए ने भी इसका समर्थन किया था। कांग्रेस और भाजपा शुरू से ही जाट समाज को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। ऐसे में वह जाट समाज को आरक्षण का झुनझुना थमाकर अपना वोट बैंक सुरक्षित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की बात जाट आरक्षण के मामले में अक्षर सह सही है। हाल में उठा गुजरात का पटेल आंदोलन भी समाज को एक बड़ी सीख देता है। पटेल समाज हमारे समाज की मुख्यधारा में काफी आगे है। हां किसी समाज के कुछ लोग यदि पीछे हैं तो उन्हें आगे लाने की कवायद की जानी चाहिए। इसके लिए आरक्षण का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने जाटों के आरक्षण संबंधी मामले पर कहा कि हालांकि जाति एक प्रमुख कारक है, लेकिन पिछड़ेपन के निर्धारण के लिए यह एकमात्र कारक नहीं हो सकती है और जाट जैसी राजनीतिक रूप से संगठित जातियों को ओबीसी सूची में शामिल करना अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सही नहीं है। कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने नौ राज्यों के जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी लिस्ट में शामिल किया था। इसके आधार पर जाट भी नौकरी और उच्च शिक्षा में ओबीसी वर्ग को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण के हकदार बन गए थे। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार भी वोट बैंक के चलते इस फैसले के साथ थी। पर सुप्रीम कोर्ट के इनकार के बाद मामला खटाई में पड़ गया।
एक बार फिर जाटों ने अपने आरक्षण की मांग उठाकर मामले को गरमाने का प्रयास किया है। रेल, रोड और सार्वजनिक संपत्तियों को निशाना बनाया जा रहा है। यह सरकार और प्रशासन का ध्यान खींचने का जरिया है। पर असल सवाल यह है कि क्या जाट समाज को आरक्षण की जरूरत है?

Pin It