जलवायु परिवर्तन की चिंता

नेताओं का चिंता जताना जायज है लेकिन सिर्फ चिंता जताने से काम नहीं चलने वाला। पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रहा है। प्रत्येक देश इस समस्या से परेशान है लेकिन उससे निपटने के उपाय पर जोर नहीं दिया जा रहा है। किन देशों की वजह से यह समस्या बढ़ रही है इससे सभी वाकिफ हैं।

sanjay sharma editor5पिछली कुछ सदियों से हमारी जलवायु में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है। दुनिया के विभिन्न देशों में सैकड़ों सालों से जो औसत तापमान बना हुआ था, वह अब बदल रहा है। गर्मी की अवधि लंबी होती जा रही है तो ठंड की छोटी। यह बहुत बड़ी समस्या है। आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन की वजह से मनुष्य के साथ-साथ वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पेड़ पौधों पर फूल और फल समय से पहले लग सकते हैं और जानवर अपने क्षेत्रों से पलायन कर दूसरी जगह जा सकते हैं। वर्तमान में पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है, हालांकि भूगर्भीय प्रमाण बताते हैं कि पूर्व में ये बहुत अधिक या कम रहा है लेकिन अब पिछले कुछ वर्षों में अचानक तेजी से बदलाव हो रहा है। इसी को देखते हुए फ्रांस की राजधानी पेरिस में दुनिया भर के नेताओं ने जलवायु परिवर्तन पर चिंता व्यक्त की। सम्मेलन में एक सुर में सभी नेताओं ने धरती के बढ़ते तापमान को बढऩे से रोके जाने पर जोर दिया।
नेताओं का चिंता जताना जायज है लेकिन सिर्फ चिंता जताने से काम नहीं चलने वाला। पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रहा है। प्रत्येक देश इस समस्या से परेशान है लेकिन उससे निपटने के उपाय पर जोर नहीं दिया जा रहा है। किन देशों की वजह से यह समस्या बढ़ रही है इससे सभी वाकिफ हैं। ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का बड़ा कारण उद्योग और कृषि है। यह भी मालूम है कि किन देशों में उद्योग धंधे ज्यादा हैं। उद्योग और कृषि के जरिए जो गैसें वातावरण में छोड़ रहे हैं, उससे ग्रीन हाउस गैसों की परत मोटी होती जा रही है। इस परत के मोटे होने की वजह से ही पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। जिस गति से कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है वह बहुत ही खतरनाक है। कार्बन डाइआक्साइड के उत्सर्जन पर कई बार चिंता जतायी गई है, लेकिन जो देश ज्यादा कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जित कर रहे हैं, उन्हें अपने यहां प्रतिबंध लगाने की जरूरत है। पश्चिमी देश ग्लोबल वार्मिंग के नाम पर विकासशील देशों पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं। ग्रीन हाउस को नुकसान हो रहा है। यह भी सच है कि विकास के लिए उद्योग धंधों को बंद नहीं किया जा सकता है लेकिन इससे निपटने के लिए रास्ता तलाशना जरूरी है। 1750 में औद्योगिक क्रांति के बाद कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 30 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। मीथेन का स्तर 140 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर आठ लाख वर्षों के सर्वोच्च स्तर पर है। यह बहुत खतरनाक स्थिति है। इससे निपटने के लिए सम्मेलनों में चिंता जताने से काम नहीं चलने वाला बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है। क्योंकि प्रकृति के साथ खिलवाड़ हमें ही भारी पड़ता है।

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