जम्मू व कश्मीर में चुनौतियां बरकरार

भाजपा जम्मू व कश्मीर सरकार में भले ही शामिल हो लेकिन सभी बड़े फैसले मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी पार्टी ही कर रही है। भाजपा के मंत्री मूकदर्शक बने हुए हैं। इससे उसकी जगहंसाई हो रही है। तमाम छोटे बड़े मसलों पर अपनी राय जताने वाले प्रधानमंत्री जम्मू व कश्मीर के बड़े सवालों पर खामोश हैं। जम्मू व कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का रवैया जग जाहिर है।

 

SANJAY SHARMA - EDITOR

संजय शर्मा – संपादक

जम्मू व कश्मीर में बेमेल राजनीतिक पार्टियों पीडीपी और भाजपा की सरकार के सामने चुनौतियां बरकरार हैं। पीडीपी पर एक जमाने से आतंकवादियों के प्रति नरम रवैया अख्तियार करने का आरोप लगता रहा है। जम्मू व कश्मीर की मुफ्ती सरकार ने मसर्रत आलम को जिस तरह से रिहा किया और बाद में चौतरफ ा दबाव पडऩे पर दुबारा गिरफ्तार किया उससे इस सरकार का इकबाल घटा है। गिलानी के प्रति भी मुफ्ती सरकार का रवैया कुछ खास स्पष्ट नहीं है। जम्मू व कश्मीर में अमरनाथ यात्रा होने वाली है। इसे आतंकवादी गुटों की ओर से खुली चुनौती मिल रही है। कश्मीरी पंडितों के पलायन का मुद्दा अनसुलझा पड़ा है। केंद्र और प्रदेश दोनों में भाजपा की सरकार है। इसके बावजूद कश्मीरी पंडितों को भरोसा नहीं हो पा रहा है। वे शरणार्थी गृहों में नारकीय परिस्थितियों में जीने पर मजबूर हैं लेकिन दुबारा अपने मुल्क लौट जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। यह मोदी और मुफ्ती सरकारों के मुंह पर करारा तमाचा है।
भाजपा जम्मू व कश्मीर सरकार में भले ही शामिल हो लेकिन सभी बड़े फैसले मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी पार्टी ही कर रही है। भाजपा के मंत्री मूकदर्शक बने हुए हैं। इससे उसकी जगहंसाई हो रही है। तमाम छोटे बड़े मसलों पर अपनी राय जताने वाले प्रधानमंत्री जम्मू व कश्मीर के बड़े सवालों पर खामोश हैं। जम्मू व कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का रवैया जग जाहिर है। वह हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इस मुद्दे को उठाता रहा है। मुम्बई दंगों के मास्टर माइंड जकी उर्रहमान लखवी का मामला संयुक्त राष्ट्र की अगली बैठक में उठाया जाना है। जम्मू व कश्मीर खासकर घाटी पिछले साल बाढ़ की विभीषिका के वजह से तबाह हो गया था। यहां विकास कार्य कराया जाना है।
जम्मू व कश्मीर में आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सेना ने सराहनीय कार्रवाई की है। वहां सेना के खिलाफ विरोध के स्वर भी उठते रहे हैं। पीडीपी इस बात की प्रबल पैरोकार रही है कि सशस्त्र बल अधिनियम हटाया जाए। पीडीपी के नेता और अलगाववादी गुट चाहते हैं कि सेना बैरकों में वापस चली जाये। सीमापार से आतंकवादी गुटों के घुसपैठ की आशंका भी जतायी जा रही है। मोदी और मुफ्ती दोनों के सामने गंभीर चुनौती है। दोनों की राजनैतिक सोच और शख्सियत जुदा है। अगर इनका राजनैतिक गठजोड़ विफल रहा तो देश के समक्ष एक और चुनौती खड़ी हो सकती है। धारा 370 की समाप्ति का मुद्दा और कश्मीरी पंडितों की वापसी का सवाल भले ही भाजपा तथा पीडीपी ने ठंडे बस्ते में डाल दिया हो लेकिन इन सवालों को ज्यादा दिनों तक टाला नहीं जा सकता है। अमरनाथ यात्रा को सकुशल निपटाना केंद्र व राज्य सरकार दोनों की चुनौती है।

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