जब आम आदमी दंडित करने पर उतारू हो जाए

 राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
किसी व्यक्ति को ‘अपराध’ करने पर निरूद्ध करने का अधिकार पुलिस को है और दंडित करने का न्यायालय को। लेकिन जब आम आदमी दंडित करने पर उतारू हो जाता है तो कुछ उसी प्रकार का हादसा होता है जैसा दादरी के एक गांव मोहम्मद अखलाक के संदर्भ में हुआ। हमारे संविधान और न्याय संहिता में किसी या किन्हीं व्यक्तियों को यह अधिकार प्राप्त नहीं है कि पुलिस और न्यायालय का काम अपने हाथ में ले ले। अखलाक ने अपराध किया या नहीं और किया तो क्या वह मृत्युदंड की सजा पाने योग्य था, इस तर्क को तब नजरंदाज कर दिया जाता है। जब भीड़ की उत्तेजना प्रगट होती है। तर्कसंगत सोच भीड़ में लुप्त प्राय हो जाती है और वह ऐसी घटना को अंजाम दे बैठती है जो समाज को कलंकित करने वाली होती है।
अखलाक की जिस भीड़ ने हत्या की उसमें से भले ही बहुत से लोग अफवाह के बहाव में बह जाने के लिए पछता रहे हों, लेकिन तब पछताए क्या होत है जब चिडिय़ा चुग गई खेत। यह सुनिश्चित नहीं है कि अखलाक ने गोहत्या की थी लेकिन यह सही भी था तो भी उसे किसी प्रकार का दंड देने का अधिकार गांव वालों को नहीं था। इस घटना ने जो हलचल मचाई है, वह इस बात का सबूत है कि किसी भी हादसे पर अपनी खिचड़ी पकाने के लिए दौड़ पडऩे वालों को यह अहसास नहीं है कि जो अपराध किसला गांव वालों ने किया उससे बड़ा अपराध वे कर रहे हैं। एक गांव के तनाव का देशव्यापी विस्तार करने की होड़ का बार-बार परिणाम भुगतने के बावजूद इन तत्वों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि वे किस ध्रुवीकरण की दिशा में देश को ले जा रहे हैं। अखलाक के परिवार के प्रति सहानुभूति प्रकट करने पहुंचे नेता और ‘तह तक’ जाने की ललक से टीआरपी बढ़ाने की होड़ में मीडिया ऐसे ‘तथ्यों’ का रहस्योद्घाटन कर रहा है जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। जब भीड़ कहीं पर हमलावर होती है जो अचानक उत्पन्न उत्तेजना से ही होती है और जब साजिश के तहत ऐसी कार्यवाही होती है तो वह मुंबई बम विस्फोट की घटनाओं के समान होती है। भीड़ किसी योजना से एकत्रित नहीं की जा सकती लेकिन विस्फोटों को बहुत बारीकी से बनाई गई योजना से अंजाम दिया जा सकता दिया जाता है।
केन्द्रीय पर्यटन मंत्री डॉक्टर महेश शर्मा के इस कथन के बाद यह घटना एक दुखद हादसा है जो शर्मनाक और निंदनीय है, सारे राजनीतिक दल तो भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विरुद्ध लामबंद हो ही गए, ‘तह तक’ पहुंचने में होडऱत मीडिया ने भी वे हादसे पर कायम हैं, का वाक्य बार-बार दोहराकर यह प्रभाव डालने का प्रयास किया है, मानो उन्होंने ऐसा कहकर अपराध पर परदा डालने का प्रयास किया हो।
डॉक्टर महेश शर्मा ने जो कहा और गांव वालों को एकत्रित कर अपराधियों को दंडित करने तथा निरपराध लोगों को रिहा करने के बारे में जो कुछ कहा है उस पर जो एक तरफा प्रतिक्रिया हुई उससे यदि किसी को यह लगता है कि इससे भाजपा, संघ या डॉ. शर्मा की छवि बिगड़ी है तो यही कहा जा सकता है कि अतीत में उनके द्वारा की गई मसलहतन प्रतिक्रियाओं का जो परिणाम हुआ है, उसका संज्ञान लेने में असफल रहे हैं।
मुसलमानों के उभरते नेता असदुद्दीन ओवैसी ने तो इस घटना को साजिश करार दिया है, जो उनके मुख से निकलना स्वाभाविक है उसी तरह जैसे उत्तर प्रदेश के एक मंत्री आजम खां चींटी भी मरने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराने के लिए अवसर की तलाश में रहते हैं। सरकारी तंत्र और साधन को लूटकर जौहर दिखाने वाले इस मंत्री को समझने में तो किसी को भ्रम नहीं है लेकिन जब उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री अराजकता और लूट का पर्याय बने राज्य की शान्ति व्यवस्था कायम रखने की असफलता के लिए प्रधानमंत्री को दोषी ठहराने का प्रयास करे तो यह समझ आना सहज है कि ऐसे आरोपों की पीछे की मानसिकता क्या है।
अखिलेश यादव को यह भी पता नहीं है भारत से गोमांस का निर्यात प्रतिबंधित है। बिसहड़ा की दुर्घटना और गोमांस के निर्यात से क्या सम्बन्ध है? वैसे भी उत्तर प्रदेश में तो गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध है। हत्या के अपराध में जिन लोगों पर कार्यवाही की प्राथमिकता होनी चाहिए उसके खिचड़ी पकाने की इस नियत का परिणाम पकाने वाले कई बार भुगत चुके हैं। लेकिन चाहे कांग्रेस हो या साम्यवादी और उनका सेक्युलर टीम में शामिल ‘जनतावादी’ सभी एक स्वर में ऐसी घटनाओं के लिए ‘हिन्दुत्ववादियों’ को कटघरे में खड़ा करने में पूरा दमखम लगा देते हैं।

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