जन्माष्टमी के बहाने

 अशोक वानखेड़े

स्वर्ग से विचरण करते हुए अचानक एक दुसरे के सामने आ गए विचलित से कृष्ण और प्रसन्नचित सी राधा। कृष्ण सकपकाए, राधा मुस्काई। इससे पहले कृष्ण कुछ कहते राधा बोल उठीं- ‘कैसे हो द्वारिकाधीश‘? जो राधा उन्हें ‘कान्हा कान्हा’ कह के बुलाती थी, अब उसके मुख से द्वारिकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया। फिर भी कृष्ण ने अपने आप को किसी तरह संभाल लिया और बोले- ‘राधा, मैं तो आज भी तुम्हारे लिए कान्हा ही हूं। तुम तो द्वारिकाधीश मत कहो। आओ बैठते हैं। मैं कुछ अपनी कहता हूं। कुछ तुम अपनी कहो। सच कहूं राधा, जब-जब तुम्हारी याद आती थी इन आंखों से आंसुओं की बूंदें निकल आती थीं।’
इस पर राधा ने कहा, ‘मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। न मुझे तुम्हारी याद आई न कोई आसूं बहा, क्योंकि हम तुम्हें कभी भूले ही कहां थे जो तुम याद आते। इन आंखों मे तुम सदा रहते थे। कहीं आंसुओं के साथ तुम निकल ना जाओ इसलिए हम रोते भी नहीं थे। प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया इसका एक आइना दिखाउं तुमको? कुछ कड़वे सच और प्रश्न सुन पाओ तो सुनाउं तुमको? कभी सोचा है इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए? यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुंदर के खारे पानी तक पहुंच गए? एक उंगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्र पर भरोसा कर लिया और दस उंगलियों से चलने वाली बांसुरी को भुल गए? कान्हा, जब तुम प्रेम से जुड़े थे, तब तुम्हारी एक उंगली गोवर्धन पवर्त को उठाकर लोगो को विनाश से बचाती थी। प्रेम से अलग होने पर वही उंगली क्या क्या रंग दिखाने लगी? सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी। कान्हा और द्वारिकाधीश में क्या फर्क होता है बताउं? कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते, सुदामा तुम्हारे घर नही आता। युद्ध और प्रेम में यही तो फर्क होता है, यु़द्ध में आप मिटाकर जीतते हैं और प्रेम में मिटकर जीतते हैं। कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी दुखी तो रह सकता है, लेकिन किसी को दुखी नहीं कर सकता। आप तो कई कलाओं के स्वामी हो, दूर दृष्टा हो, गीता जैसे ग्रंथ के दाता हो, पर आपने क्या निर्णय किया? अपनी पूरी सेना कौरवों को सौप दीं और अपने आप को पांडवों के साथ कर लिया। सेना तो आप की प्रजा थी, राजा तो प्रजा का पालक होता है, उसका रक्षक होता है। फिर कैसे आप के जैसा ज्ञानी उस रथ को चला रहा था, जिस पर बैठा अर्जुन आपकी ही प्रजा को मार रहा था? अपनी प्रजा को मरते देख आप में करुणा नहीं जागी? यह इसलिए हुआ क्यो की आप प्रेम से शून्य हो चूके थे। आज भी धरती पर जाकर देखो, अपनी द्वारिकाधीश वाली छवि को ढूंढते रह जाओगे। हर घर, हर मंदिर में मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे। आज भी मैं मानती हूं कि लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं। उसके महत्व की बात करते है। लेकिन धरती के लोग युद्ध वाले द्वारिकाधीश पर नही, प्रेम करने वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं। गीता में भले ही मेरा दूर-दूर तक नाम नहीं, पर आज भी लोग उस के समापन पर ‘राधे-राधे ‘कहते हैं।’
जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में किसी विचारक ने मुझे यह कहानी सुनाई। मै अतीत और वर्तमान के बीच वैचारिक द्वंद में फंस गया। सोचा कि बात तो पौराणिक है, लेकिन आज के मौजूदा दौर में भी लागू होती है। मानो आज हमारे द्वारिकाधीश हमारे प्रधानमंत्री हैं और उन्हें सिंहासन पर बिठाने वाली जनता राधा। चुनाव के दौरान जो रूप हमारे प्रधानमंत्री का था, वह वही कान्हा का रूप है, जिसे राधा यानी जनता असीम प्रेम करती है। लेकिन अकसर देखा जाता है कि चुनावी वादों को हमारे नेता चुनाव के खत्म होते ही भूल जाते हैं या उन वादो को चुनावी जुमले बताए जाते हैं। और मायूस राधा यानी जनता उन चुनावी वादों को अपने यादों में संजोकर रखती है। उसी के सहारे आने वाले पांच साल बिताती है कि कभी तो मेरा कान्हा वापस आएगा। कभी तो अच्छे दिन आएंगे। द्वापर युग के कृष्ण को हम आज भी युगपुरुष मानते हैं, परंतु उस युगपुरुष को भी उसकी गलतियों का अहसास दिलाने वाली राधा को भी समझना होगा।
कोशिश करेंगे तो उस गलती को नहीं दोहराएंगे, जो कृष्ण ने राधा की नजरो में कीं। प्रधानमंत्री मोदी का स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से दिया भाषण दिल को छूने वाला था, द्वारिकाधीश का राधा से सीधा संवाद था। लेकिन बात संवाद से नहीं बनती। राधा को महंगाई की मार से रक्षण करने के लिए गोवर्धन पर्वत उठाने वाला कान्हा चाहिए। विकास की बातें और योजनाओं की घोषणाओं का सुदर्शन नहीं, बासुरी के सुर जैसा सुरीला विकास चाहिए। सत्य असत्स के बीच अपनी सेना की बलि देने वाला द्वारिकाधीश नहीं, अपने मित्रों के लिए कालियामर्दन करने वाला कान्हा चाहिए। साबरमती जैसा जमुना और गंगा को निर्मल करने वाला कान्हा चाहिए। सुदामा को अपने महल में नहीं, स्वयं सुदामा के घर जाने वाला कान्हा चाहिए। वह तो द्वापर युग था, जहा संबंधों की घनिष्ठता इतनी थी कि कितनी भी दुखी हो राधा, कान्हा को उसने कभी दुखी नहीं किया। उसे अपनी यादों में ऐसा संभलकर रखा कि आज भी कृष्ण के पहले राधा का नाम लिया जाता है। वर्तमान में कलियुग है, यहा संबंध यूं ही बनते और बिगड़ते रहते हैं। अगर पांच सालों में द्वारिकाधीश ने कान्हा से दूरी बनाए रखी तो कलियुगी राधा भी दूसरे कान्हा को ढूंढने निकल पड़ती है।

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