जनहित के लिए चर्चा जरूरी

संसद के पिछले सत्रों की तरह यदि इस सत्र में भी हंगामे का ही दोहराव दिखा, तो संकेत यही जायेगा कि हमारे सांसद इतिहास में हासिल अनुभवों से सबक नहीं लेते। संसद को चलाने में जनता की गाढ़ी कमाई की एक मोटी राशि खर्च होती है। इससे हमारे दोनों पक्षों को संसद में गतिरोध के मौकों पर इसे ध्यान रखना चाहिए।

sanjay sharma editor5संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था है। इसलिए इसके हर सत्र का महत्व है, लेकिन बजट सत्र की अपनी खास अहमियत होती है। जिस पर पूरे देश की निगाह रहती है। इस सत्र में पेश होनेवाले रेल और आम बजट से जनता की बड़ी उम्मीदें जुड़ी होती हैं।
जनता को इसका इंतजार होता है कि सरकार इसमें ऐसी नीतियों और कार्यक्रमों की घोषणा करेगी, जो उनकी तकलीफों को कुछ हद तक आसान बनायेगी। साथ ही विपक्ष सार्थक बहस में हिस्सा लेकर उन नीतियों और कार्यक्रमों की खामियां सामने लाने में अपनी भूमिका निभाएगा। इस लिहाज से बजट सत्र का सुचारु संचालन देशहित में जरूरी माना गया है। सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने अभिभाषण में संसद में चर्चा किए जाने पर जोर दिया। संसद में चर्चा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना सकारात्मक नजरिया दिखाया। राष्ट्रपति ने सही ही कहा कि संसद चर्चा के लिए है, हंगामे के लिए नहीं। सरकार सदन को चलाना चाहती है, विपक्ष को भी इसमें सहयोगी रवैया रखना चाहिए।
प्रधानमंत्री का यह कहना कि आज भारत की दुनिया में जो स्थिति बनी है, उससे पूरी दुनिया का ध्यान हमारे बजट सत्र पर है। यह देश के प्रति उनके सकारात्मक विकास की सोच को दिखाता है। पर इन दोनों बयानों का इशारा भी इस बात की ओर है कि संसद में हंगामे के लिए विपक्ष जिम्मेवार है। ऐसे में सदन के चलने का जिम्मा सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का है।
हालांकि, ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन पर विपक्ष सरकार से जवाब-तलब करेगा। इन मुद्दों पर सत्ता पक्ष का तेवर कैसा रहता है। इस पर ही सदन की कार्यवाही तय हो सकेगी। संसद के पिछले सत्रों की तरह यदि इस सत्र में भी हंगामे का ही दोहराव दिखा, तो संकेत यही जायेगा कि हमारे सांसद इतिहास में हासिल अनुभवों से सबक नहीं लेते। संसद को चलाने में जनता की गाढ़ी कमाई की एक मोटी राशि खर्च होती है। इससे हमारे दोनों पक्षों को संसद में गतिरोध के मौकों पर इसे ध्यान रखना चाहिए। हंगामे से न सिर्फ देश का धन बरबाद होता है, बल्कि इससे देश की प्रगति और छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। फिलहाल देश अपनी संसद और सांसदों की ओर बड़ी उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है।

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