‘जनता’ के नाम पर मिलते हैं बार-बार बिखरने के लिए

राजनीतिक दल के रूप में जनता शब्द सबसे पहले 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद चंद्रशेखर की अध्यक्षता में बनी जनता पार्टी के रूप में सामने आया। इसमें वे सभी राजनीतिक दल विलीन हो गए थे, जो इंदिरा गांधी के कुशासन के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन में एकजुट हुए थे।

राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
इसी वर्ष बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को सफल होने से रोकने के लिए नीतीश कुमार की अगुआई में मिलकर जनता दल युनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने गठबंधन करने का जो फैसला किया है, उसके सीटों के बंटवारे में बिखर जाने या विषाक्त हो जाने की आशंका जिन्हें नहीं भी है, वे भी ‘जनता’ के नाम पर समय-समय पर एकजुट होने और बिखर जाने की पुनरावृत्ति के प्रति आश्वस्त हैं।

यह गठबंधन कांग्रेस के ‘हस्तक्षेप’ से उसी प्रकार संभव हुआ है, जैसे 1978 में चौधरी चरण सिंह और बाद में देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का अवसर देने के लिए संभव हुआ था। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री बनाकर इन सभी के साथ क्या व्यवहार किया था, इसके विस्स्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है लेकिन जिस सम्भावित ‘जनता परिवार’ की एकजुटता से वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रभावशाली बनते जाने से रोकने की अपेक्षा की जा रही है, उसकी शक्ति और कमजोरी को समझने के लिए आवश्यक है कि इस ‘जनता’ के नाम से बनने और बिखरने की बार-बार पुनरावृत्ति पर दृष्टिगत अवश्य करें जो ‘जनता’ के नाम पर एकजुट होने की कोशिश कर रहे लोगों के स्वभाव का संज्ञान कराता है। यद्यपि मुलायम सिंह यादव ने तटस्थ रहकर तथा देवगौड़ा व अजय चौटाला ने घर बैठकर कुछ संकेत दिए हैं।

राजनीतिक दल के रूप में जनता शब्द सबसे पहले 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद चंद्रशेखर की अध्यक्षता में बनी जनता पार्टी के रूप में सामने आया। इसमें वे सभी राजनीतिक दल विलीन हो गए थे, जो इंदिरा गांधी के कुशासन के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन में एकजुट हुए थे। इनमें जनसंघ, कांग्रेस, संगठन, लोकदल तथा ‘समाजवादी’ नामधारक कई दलों के अलावा स्वतंत्र पार्टी और ठीक चुनाव के पूर्व कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेस फार डेमोक्रेसी संगठन बनाने वाले जगजीवन राम भी शामिल थे। यदि नाम गिनाना हो तो मोरारजी, चौधरी चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, जगजीवन राम, हेमवतीनंदन बहुगुणा, बीजू पटनायक आदि प्रथम पंक्ति के लोगों का उल्लेख किया जा सकता है, जो देशव्यापी राजनीति में दखल रखते थे। इन धुरंधर नेताओं ने राजघाट पर देश की सेवा करने के लिए व्यक्तिगत अहं से ऊपर उठकर काम करने का शपथ ली थी, लेकिन अलग-अलग राजनीतिक दल के रूप में अस्तित्वहीन होने के बावजूद घटकवाद के रूप में उनका अस्तित्व बना रहा। वर्चस्व और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से कलह का ऐसा सैलाब आया जिसने देश को मिली पहली श्रेष्ठ सरकार को ध्वस्त कर दिया। जनसंघ, भारतीय जनता पार्टी बन गया, समाजवादी चौधरी चरण सिंह के लोकदल में सिमट गए। पुरानी कांग्रेस के लोग सभी में बह गए। जगजीवन राम, बहुगुणा सहित कांग्रेस में लौट गए और बीजू पटनायक ने उड़ीसा में क्षेत्रीय दल बना दिया। स्वतंत्र पार्टी समाप्त हो गई। इंदिरा गांधी 1980 में फिर सत्ता में लौट आईं।

जनता परिवार के नाम पर जिन लोगों में एकजुटता की चर्चा है उसमें शामिल सभी ‘व्यक्तियों’ का राजनीतिक प्रशिक्षण कांग्रेस विरोध के आधार पर हुआ है। मेरठ के कांग्रेस अधिवेशन में 1948 में जो समाजवादी अलग हुए थे, उनमें आचार्य नरेंद्र देव, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, अशोक मेहता आदि प्रमुख थे। 1952 के चुनाव के पूर्व आचार्य कृपलानी ने कांग्रेस छोडक़र किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई थी जो चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर प्रजा समाजवादी पार्टी बनी। आंध्र प्रदेश में इस पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनी लेकिन मजदूरों पर गोली चलाने से क्षुब्ध होकर डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने न केवल सरकार गिरा दी अपितु समाजवादी पार्टी को पुनर्जीवित भी किया। 1962 के चुनाव में उत्तर प्रदेश तथा अन्य हिन्दी भाषी राज्यों में जनसंघ की बढ़त ने प्रसोदा और सोपा को मिलकर संयुक्त समाजवादी पार्टी बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जो 1964 के पहले सम्मेलन में फिर से बिखर गई। प्रजा समाजवादी पार्टी के अधिकांश लोग अशोक मेहता के नेतृत्व में कांग्रेस में चले गए। चंद्रशेखर उनमें से एक थे। 1967 के निर्वाचन के बाद से कितनी बार समाजवादी घराना बिखरा और किस किस नाम से एकजुट हुआ, उसकी संख्या का हिसाब रखना कठिन है।

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