जनतांत्रिक राजनीति में दलबदल: गलत कब और क्यों ?

इसके पूर्व कांग्रेस के भीतर समाजवादी धड़े के नेताओं के पार्टी छोडऩे व नई पार्टी बनाकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लडऩे के उदाहरण भी हमारे सम्मुख हैं। पं. नेहरू के प्रिय पात्र रफी अहमद किदवई ने पार्टी छोड़ी और फिर कुछ समय बाद कांग्रेस में यह कहते हुए लौट आए कि वहां जी नहीं लगता। यह स्पष्ट है कि किसी राजनैतिक कार्यकर्ता या नेता ने कभी वैचारिक मतभेदों के कारण पार्टी छोड़ी तो कभी व्यक्तिगत कारणों से।

ललित सुरजन
मेरा मानना है कि जनतांत्रिक राजनीति में दलबदल अपने आप में कोई बुराई नहीं है। एक समाज में हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है और वह उसे कभी भी बदलने का अधिकार रखता है। अगर विचारों में परिवर्तन को प्रारंभ से ही बुराई मान लिया जाए तो यह उस व्यक्ति के अधिकार का हनन या उसमें हस्तक्षेप करना होगा। स्वतंत्र भारत की राजनीति में दलबदल के दर्जनों उदाहरण हमारे सामने हैं, जो इस अधिकार की पुष्टि करते हैं। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी याने राजाजी भारत के शीर्ष राजनेता थे। वे लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे। कांग्रेस ने ही उन्हें देश का प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल बनाया तथा बाद में मद्रास प्रांत का मुख्यमंत्री भी। ऐसे उद्भट विद्वान व विचारशील नेता ने भी एक दिन अपनी मातृसंस्था छोडक़र स्वतंत्र पार्टी की स्थापना कर ली। एक अन्य विद्वान राजनेता तथा पुराने कांग्रेसी मीनू मसानी उनके सबसे विश्वस्त एवं प्रमुख सहयोगी के रूप में इस पार्टी में आए।
इसके पूर्व कांग्रेस के भीतर समाजवादी धड़े के नेताओं के पार्टी छोडऩे व नई पार्टी बनाकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लडऩे के उदाहरण भी हमारे सम्मुख हैं। पं. नेहरू के प्रिय पात्र रफी अहमद किदवई ने पार्टी छोड़ी और फिर कुछ समय बाद कांग्रेस में यह कहते हुए लौट आए कि वहां जी नहीं लगता। यह स्पष्ट है कि किसी राजनैतिक कार्यकर्ता या नेता ने कभी वैचारिक मतभेदों के कारण पार्टी छोड़ी तो कभी व्यक्तिगत कारणों से। देखा जाए तो सन् 1967 के आम चुनावों तक दलबदल को राजनीतिक प्रक्रिया का एक सामान्य अंग ही माना जाता था। वह एक रोग या अनिवार्य बुराई है, यह धारणा उस वर्ष विधानसभा चुनावों के बाद जो कुछ हुआ, उसके कारण विकसित हुई, जो आज एक भयावह व चिंताजनक रूप में देश के सामने दिखाई दे रही है।
हमने चूंकि ब्रिटेन संसदीय जनतांत्रिक प्रणाली को काफी हद तक अपनाया है, इसलिए अपने राजनैतिक क्रियाकलापों में हमारे अध्येता अक्सर ब्रिटिश संसद की नकाीरें पेश करते हैं। इनमें से एक है कि कोई निर्वाचित सदस्य सदन में पार्टी के रुख से अपनी स्पष्ट असहमति व्यक्त कर सकता है, वह पार्टी के खिलाफ जाकर वोट भी दे सकता है; लेकिन दो मौकों पर उसे पार्टी व्हिप का पालन करना अनिवार्य होता है, पहिला अविश्वास प्रस्ताव के समय और दूसरा- वित्तीय विधेयक (मनी बिल) के दौरान। इसमें अगर सदस्य ने पार्टी अनुशासन का पालन नहीं किया तो उसकी सदस्यता खारिज हो जाएगी। कारण यह है कि उपरोक्त दो मौके ही हैं जब शक्ति परीक्षण में हारने पर सरकार गिर जाती है अन्यथा नहीं। आज भी ब्रिटिश संसद में गाहे-बगाहे सदस्य अपनी पार्टी के खिलाफ वोट देते हैं, पार्टी बदल भी लेते हैं, लेकिन उनकी सदस्यता बरकरार रहती है।
भारत में इसी तर्ज पर स्वस्थ परंपराएं विकसित होने की उम्मीद की जाती थी। किंतु 1967 में जो राजनैतिक पाखंड घटित हुआ उसने निर्वाचित सदनों की पवित्रता नष्ट कर उन्हें सदस्यों के नीलामीघर में बदलने में कोई कसर बाकी न रखी। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने कांग्रेस आलाकमान से अनुमति मांगी थी कि 37 विधायकों द्वारा थोक में दलबदल करने के कारण वे राज्यपाल से विधानसभा भंग कर नए चुनाव की सिफारिश कर सकें। अगर श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें यह अनुमति दे दी होती तो मध्यप्रदेश के बाद बाकी प्रदेशों में भी इसका अनुकरण होता तथा अपनी महत्वाकांक्षा के चलते दलबदल कर सत्तासुख चाहने वालों के मंसूबों पर एक सिरे से पानी फिर जाता। किंतु तब इंदिराजी को यशवंतराव चव्हाण ने यह भरोसा दिला दिया था कि इसी तरह दलबदल करवाकर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन सकती है और इस धोखे में उन्होंने मिश्रजी की बात नहीं मानी। देश में तब से गयाराम-आयाराम का जो खेल चल रहा है, उसे सब देख रहे हैं।
राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्री काल में इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार किया, तब संसदीय जनतंत्र में जड़ें जमा चुके दलबदल के रोग को समाप्त करने के लिए दलबदल विरोधी कानून संसद से पारित हुआ। इस कानून में सबसे बड़ी कमजोरी या विसंगति यह थी कि व्यक्तिगत दलबदल पर तो रोक लगाई गई किंतु थोक में ऐसा करने को कानूनी मान्यता दे दी गई।
मेरा दलबदल के संबंध में मानना है कि अंतत: ब्रिटिश संसदीय परंपरा का पालन करने से ही हम इस बुराई से छुटकारा पा सकेंगे। फिलहाल दलबदल कानून में एक अंतिम संशोधन की तजवीज मैं करना चाहूंगा कि जो भी विधायक/ सांसद दलबदल करे वह अपनी सीट से तुरंत इस्तीफा देकर नई पार्टी के चिन्ह पर चुनाव लड़ कर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करे। इसके सिवाय कानून में वर्तमान में जो भी प्रावधान हैं, वे सारे के सारे निरस्त कर दिए जाएं। जिस जनता ने आपको एक बार चुनकर भेजा है, उसी के सामने दुबारा जाइए और अपनी सफाई पेश कीजिए। वह मान जाए तो जीत, न माने तो हार।

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