छोटे राज्यों से संतुलित क्षेत्रीय विकास

डॉ. हनुमंत यादव

2 जून 2014 को तेलंगाना राज्य के गठन के बाद भारत के अनेक बड़े राज्यों के अंचलों से पुन: छोटे राज्य की मांग उठना प्रारम्भ हो गई थी। जिनमें उत्तर प्रदेश में हरितप्रदेश, पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, राजस्थान में मरूप्रदेश तथा महाराष्ट्र में विदर्भ राज्य की मांग मुख्य थी। विदर्भ को छोडक़र अन्य पृथक राज्यों की मांगें धीमी पड़ते हुए ठंडी हो गईं। देवेन्द्र फडऩवीस के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने के बाद पृथक विदर्भ की मांग कमजोर पड़ गई थी। पिछले महीने पृथक विदर्भ की मांग को महाराष्ट्र के महाअधिवक्ता श्रीहरि अणे के त्यागपत्र के बाद विदर्भ राज्य के लिए जनमत संग्रह कराए जाने के बयान से नई चेतना मिली। कानूनविद् श्रीहरि अणे द्वारा सार्वजनिक मंच से पृथक मराठवाड़ा राज्य के संबंध में व्यक्त उद्गार के कारण शिवसेना की अगुवाई में कुछ राजनीतिक दलों द्वारा की गई आलोचना के बाद उन्होंने महाअधिवक्ता पद से त्यागपत्र दे दिया था। गत 14 अप्रैल को विदर्भ के भंडारा में सार्वजनिक मंच से महाराष्ट्र के चार अंचलोंवाला को चित्रित करने वाला केक काटने के चित्र प्रकाशित होते ही वे पुन: चर्चा में आ गए हैं तथा उनके पृथक विदर्भ राज्य आन्दोलन में सक्रिय भूमिका की संभावनाएं बलवती होती दिखाई दे रही हैं।
आकाादी के बाद के समय से ही भाषायी आधार पर राज्यों के निर्माण की मांग उठना प्रारम्भ हो गई थी। किन्तु सबसे जोरदार आन्दोलन 1953 में तेलगु भाषियों द्वारा मद्रास राज्य के तेलगु भाषी जिलों के लिए अलग आन्ध्र प्रदेश बनाने की मांग को लेकर हुआ। केन्द्र सरकार द्वारा तत्कालीन मद्रास राज्य के 16 उत्तरी जिलों को अलग करके आंध्रप्रदेश बनाने के फलस्वरूप आंध्र प्रदेश भाषा के आधार पर स्थापित होनेवाला पहला राज्य बन गया। उस समय देश में भाषा के आधार पर राज्य गठन की मांग इतनी जोरदार थी कि 1955 में केन्द्र सरकार द्वारा गठित राज्य पुनर्गठन आयोग ने भी भाषा के आधार पर राज्य गठन को अपनी सिफारिश का मुख्य आधार बनाया। संयुक्त महाराष्ट्र समिति के आन्दोलन के कारण 1960 में बम्बई राज्य का विभाजन करके मराठी भाषी राज्य महाराष्ट्र तथा महागुजरात आन्दोलन के कारण गुजराती भाषी राज्य गुजरात का गठन हुआ।
1950 के दशक में भाषा के आधार पर राज्य गठन की मांग करने वालों की भावनाएं इतनी प्रबल थीं कि उनका विश्वास था कि अलग राज्य बन जाने पर भाषायी समरसता होने के कारण लोग कंधे से कंधा मिलाकर बुनियादी समस्याएं, क्षेत्रीय पिछड़ापन आदि दूर करके राज्य को विकास की ओर अग्रसर कर सकेंगे। आन्ध्रप्रदेश के तेलंगाना अंचल के निवासियों को यह बात बहुत जल्दी समझ में आ गई कि मात्र तेलगुभाषी राज्य बन जाने से न तो लोगों की बुनियादी समस्याएं हल होने वाली है, न ही पिछड़ापन दूर होनेवाला है । इसलिए तेलंगानावासियों में नए राज्य की इच्छा होने लगी । 2000 में छत्तीसगढ़, झारखंड तथा उत्तरांचल के नए राज्य बनने के बाद तेलंगाना राज्य हेतु आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। केन्द्र सरकार ने दिसम्बर 2009 में पृथक तेलंगाना राज्य का प्रस्ताव सिद्धान्त रूप में स्वीकार कर लिया तथा 2 जून 2014 से यह राज्य अस्तित्व में भी आ गया।
केन्द्र सरकार को भारत के राज्यों में क्षेत्रीय विषमता के बारे में भलीभंाति जानकारी थी। इसलिए 1970 के दशक में भारत सरकार के योजना आयोग ने संतुलित क्षेत्रीय विकास हेतु विभिन्न राज्यों के पिछड़े क्षेत्रों को चिन्हित करके उनके पिछड़ेपन को दूर करने के लिए अनेक योजनाएं बनाईं एवं संबंधित राज्यों को उन योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु फंड उपलब्ध करवाया। सरकार के प्रयासों के बाद भी अनेक राज्यों में पिछड़ापन बरकरार है। गोवा, केरल, गुजरात, पंजाब, हरयाणा आदि राज्यों के विकास को देखते हुए बड़े भौगोलिक क्षेत्रफल वाले राज्यों के पिछड़े अंचलों में रहने वाले निवासियों में यह भावना उपजने लगी कि छोटे राज्यों के गठन छोटे राज्यों में विकास तेजी से होता है, रोजगार तथा आमदनी में वृद्धि के अवसर अधिक होते हैं। राजनीतिक दलों में भाजपा छोटे राज्यों की पक्षधर रही है। इसलिए 1999 में भाजपा के नेतृत्व में जब एनडीए गठबंधन केन्द्र में सतारूढ़ हुआ तो प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने चार अंचलों के नागरिकों की पुरानी मांगों के आधार वहां के लोगों की जनभावनाओं का सम्मान करने के लिए छत्तीसगढ़, झारखंड उत्तरांचल एवं विदर्भ इन चार नए राज्यों के गठन का इरादा किया था। महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना के जोरदार विरोध के कारण उन्हें पृथक विदर्भ राज्य के गठन का इरादा त्यागना पड़ा। नवम्बर 2000 में छत्तीसगढ़, झारखंड तथा उत्तराखंड नए राज्य बन गए किन्तु विदर्भवासी अपने राज्य से वंचित रह गए। जब तक महाराष्ट्र में शिवसेना सरकार में रहेगी तब तक विदर्भ राज्य की मांग कितनी भी न्यायोचित क्यों न हो, महाराष्ट्र से अलग पृथक विदर्भ राज्य बनना संभव नहीं दिखता।
अर्थशास्त्रियों के एक वर्ग का कहना है कि संतुलित क्षेत्रीय विकास छोटे आकार के राज्यों से ही सम्भव है। लेकिन इस छोटा आकार को परिभाषित करना कठिन है। सामान्यतया आम आदमी खासकर कारोबारी लोग जिन्हें किसी न किसी काम से राज्य की राजधानी जाना पड़ता है, उनका कहना रहता है कि राज्यों की राजधानी दूर होने पर उनके समय व पैसे का अपव्यय तो होता ही असुविधा भी बहुत अधिक होती है। राज्यों की राजधानी तक आम आदमी की पहुंच होनी चाहिए। इन लोगों का कहना रहता है कि राज्य के किसी भी कोने से राज्य की राजधानी की दूरी 400 किमी से अधिक नहीं होनी चाहिए जिससे कि एक्सप्रेस रेलगाड़ी से सात घंटे में राजधानी पहुंच सकें। इसलिए भारत का हर वह व्यक्ति जिसे किसी न किसी काम से प्रदेश की राजधानी जाना होता है वह छोटा राज्य चाहता है।

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