छह महीने में तीन बार बढ़ा बस का किराया, यात्री सुविधाएं जस की तस

  • आज भी टूटी खिडक़ी, बिना फायर किट और फस्र्टएड बाक्स के यात्रा करने को मजबूर यात्री

कोमल निगम
Captureलखनऊ। परिवहन विभाग ने डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का हवाला देकर रोडवेज बसों का किराया बढ़ा दिया है। रोडवेज बसों के किराये में छह महीनों में तीन बार बढ़ोत्तरी की जा चुकी है लेकिन बसों में मिलने वाली सुविधाओं का हाल जस का तस है। बसों की खिड़कियां टूटी-फूटी हैं। यात्रियों को बैठने के लिए लगी सीटें फटी रहती हैं। अग्निशमन संयंत्र और फस्र्टएड किट तक मौजूद नहीं रहती। अधिकांश बसों में यात्रियों को खड़े होकर यात्रा करनी पड़ती है। इन समस्याओं का निदान करने वाला कोई नहीं है।
रोडवेज बसों का किराया 5-13 पैसे प्रति किलोमीटर बढ़ा दिया गया है। इससे पहले भी रोडवेज बसों क ा किराया बढ़ चुका है लेकिन तब भी बसों की हालत में कोई सुधार नहीं किया गया है। अगर हम रोडवेज बसों के किराये की तुलना ट्रेन के किराया से करें, तो जितना किराया देकर बस से एक आदमी दिल्ली जाएगा उतना ही किराया देकर ट्रेन से तीन आदमी दिल्ली का सफर आसानी से कर सकते हैं, साथ ही ट्रेन मे हमें बसों से ज्यादा सुविधा भी मिलती है। ट्रेन में हम आराम से लेट कर सफर कर सकते हैं लेकिन बस में ऐसी सुविधा नहीं मिलती है। रोडवेज बस से दिल्ली जाने का किराया पहले 489 रुपये था और अब बढ़ कर 507 रुपये हो गया है। यदि हम साधारण बस से सफर करते हैं, तो उसका किराया 700 की जगह 800 रुपये लगता है। जबकि एसी बस का किराया 1300 से बढक़र 1400 रुपये हो गया है, जो कि ट्रेन के किराये से कई गुना ज्यादा है। दिल्ली जाने वाली ट्रेनों का जनरल टिकट का किराया 150 रुपये है, स्लीपर का किराया 270 रुपये है और एसी कोच का किराया 700 से 800 रुपये है।
फायर किट का न होना
रोडवेज की अधिकांश बसों में आग बुझाने के संयंत्र नहीं होते हैं। जबकि बसों में इंजन गर्म होने पर धुआं निकलने और सीएनजी बसों में आग लगने की अनेकों घटनाएं हो चुकी हैं। उसके बाद भी बसों मे फायर किट की व्यवस्था नहीं होती है। जिन बसों में फायर किट होती है, उसमें अमूमन गैस नहीं होती है, इसमें सिलेंडर एक्सपायरी डेट का भी होता है। यदि आग लगती है, तो कंडक्टर जान बचाकर भागते हैं, उन्हें फायर किट का इस्तेमाल करना भी नहीं आता है।
खाली फस्र्टएड बॉक्स
सरकार सालाना यात्रियों की सुविधा के नाम पर करोड़ो रुपये खर्च करती है। इसके बावजूद बसों में यात्रियों की सुविधाओं का ख्याल नहीं रखा जाता है। सरकार की तरफ से किसी भी प्रकार की दुर्घटना होने पर बसों में फस्र्टएड किट रखने की व्यवस्था की गई है लेकिन अधिकांश बसों में फस्र्टएड किट वाला बॉक्स खाली होती है। जिन बसों में फस्र्टएड बाक्स लगा होता है, उसमें ड्राइवर और कंटक्टर अपने इस्तेमाल का सामान रखते हैं। ऐसे में दुर्घटना होने पर यात्रियों को तुरंत उपचार की सुविधा नहीं मिल पाती है।
सफाई व्यवस्था न होना
बसों मे सफाई की व्यवस्था बिल्कुल भी नहीं होती है। यात्रियों को स्वयं सीट साफ करके बैठना पड़ता है। जबकि परिवहन विभाग की तरफ से बसों को साफ-सुथरा रखने और धुलाई रखने के लिए ड्राइवर और कंडक्टर को अलग से भुगतान किया जाता है। बसों में झाड़ू तक नहीं लगती है।

नहीं मिलती है सीट

रोडवेज बसों मे यात्रियों की सबसे बड़ी समस्या सीट मिलने की होती है। इसमें बसों के कंडक्टर यात्रियों का टिकट तो बना देते हैं लेकिन सीट न होने की वजह से बहुत से यात्रियों को खड़े होकर यात्रा करना पड़ती है। कई बार तो सीट खराब होने की वजह से बैठने की जगह नहीं मिल पाती है। इसलिए लोगों को पूरा किराया देने के बाद भी बैठने को जगह नहीं मिलती है, जबकि ट्रेनों में जनरल कोच के अलावा अन्य बोगियों में टिकट कन्फर्म होने पर सीट आसानी से मिल जाती है।

छत से टपकता है पानी

बारिश में अगर आप बस से सफर कर रहे हैं, तो अपने साथ छाता रखना न भूलें। क्योंकि रोडवेज की बहुत सी बसों की छत खराब हैं। बरसात में बस की छतों से पानी टपकता है। इतना ही नहीं बस की टूटी खिड़कियां भी बरसात के पानी के बचाव नहीं कर पाती हैं। ऐसे में बस में यात्रा करने वाला व्यक्ति भीग जाता है। वह चाहकर भी खुद को भीगने से नहीं बचा पाता है। जबकि पिछली बार बसों के किराया में बढ़ोत्तरी होने पर यात्रियों को उम्मीद थी कि बसों की हालत में सुधार किया जाएगा लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ।

बसों की जर्जर हालत

रोडवेज बसों की हालत दिन प्रतिदिन खराब होती चली जा रही है। रोडवेज की सैकड़ों बसों की खिड़कियों का शीशा टूटा हुआ है। बस की सीट खराब है। बस में खड़े होकर यात्रा करने वाले लोगों को पकडऩे के लिए लगा लोहे का रॉड तक नहीं होता। अधिकांश बसें ऐसी हैं, जिन्हें स्टार्ट करने के लिए धक्का लगाना पड़ता है। बरसात में ड्राइवर के सामने लगे शीशे पर आने वाली बूंदें हटाने वाला वाइपर तक नहीं चलता है। बहुत सी बसों में लाइट नहीं होती है। बसों में स्टेपनी और टूल किट तक नहीं होता है। इसके बावजूद ऐसी बसों को लांग रुट पर चलाया जाता है।

बसों के पहुंचने का समय भी निश्चित नहीं

रोडवेज बसों के पहुंचने का समय कभी भी निश्चित नहीं होता है। इतना ही नहीं बस खड़ी करने की जगह भी निश्चित नहीं होती है, जिसकी वजह से यात्रियों को बस पकडऩे के लिए ऊधर से इधर भटकना पड़ता है। साथ ही यात्रियों को बसों के आने-जाने की सही जानकारी देने वाला भी कोई नहीं रहता है। बस ड्राइवर और कंडक्टर अपने मन के मुताबिक कहीं भी बस रोक कर नाश्ता-पानी करना शुरू कर देते हैं। इन्हें यात्रियों का सुविधा का ध्यान नहीं होता है। जबकि नियमों के हिसाब से ड्राइवर को निर्धारित स्टॉप पर ही बस रोकनी चाहिए।
नान स्टाप बसों में लोकल सवारियों को बिठाना
नान स्टाप बसों मे लोकल यात्रियों को बैठाया जाता है। उसके बाद भी बस ड्राइवर अपने फायदे के लिए लोकल सवारियों को बिठा लेते हैं। इसलिए बीच-बीच में बस रोककर लोगों को उतारने और बिठाने में काफी वक्त बर्बाद करते हैं। इससे जल्दी पहुंचने की आस में नान स्टाप बस पकडऩे वालों को अपने गंतव्य तक पहुंचने में विलंब होता है।
महिलाओं की सीट पर पुरुषों का कब्जा
बसों मे महिलाओं के लिए सीट रिजर्व होती है। उसके बाद भी महिलाओं की सीटों पर पुरुषों का कब्जा होता है। इस वजह से कई बार महिलाओं को खड़े होकर यात्रा करनी पड़ती है। बस के कंडक्टर भी पुरुषों से सीट छोडऩे के लिए नहीं बोलते हैं।

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