छवि को फिर से उभारने का प्रयास

दिलीप चेरियन 

नरेन्द्र मोदी के बाबू लगातार इस बारे में बात कर रहे हैं। उनके वित्त मंत्री और पार्टी अध्यक्ष भी लगातार उनकी अंक तालिका को लेकर मीडिया के सामने आ रहे हैं और यह डिग्री ड्रामा का ही एक हिस्सा था। इस मामले में लगातार एक-दूसरे पर राजनीतिक हमला किया जा रहा है और निकल कुछ खास नहीं रहा है।
मीडिया और संसद में जिस तरह से लगातार तीखे हमले हो रहे हैं, ऐसे में सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि उसको अपनी कम्युनिकेशन रणनीति पर फिर से विचार करने की जरूरत है। सरकार अब यह धारणा बदलना चाहती है कि वह इन हमलों से घबराकर पिछले पैरों पर चली गई है। सरकार की दूसरी वर्षगांठ से ठीक पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक नई संवाद एवं प्रचार रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है ताकि आम लोगों तक सही ‘संदेश’ पहुंचाया जा सके।
सूत्रों के अनुसार नई योजना पर सूचना एवं प्रसारण सचिव सुनील अरोड़ा ने बीते महीने अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले ही हस्ताक्षर किए थे। अब उनके उत्तराधिकारी अजय मित्तल, जो कि एक सप्ताह पहले ही इस पद पर आए हैं, उन्हें मोदी सरकार की छवि को बेहतर करने का बड़ा काम मिला है और उन्हें तेजी से हालात को समझ कर एक बिगड़ैल घोड़े की सवारी करनी है।
इस नई योजना में मंत्रालय के 4 संयुक्त सचिवों को प्रैस इंफार्मेशन ब्यूरो (पी.आई.बी.) में सूचना अधिकारियों के काम पर निकटता से नजर रखनी है। पी.आई.बी. ही मीडिया में सरकार से संबंधित सूचनाओं को वितरित करती है। इसके साथ ही संयुक्त सचिवों और सूचना अधिकारियों में आपसी संयोजन बढ़ाने के लिए आपस में निरंतर बातचीत करते रहना है।
स्पष्ट है कि अरोड़ा ने सचिवों की समिति के बाद बीते साल ही इस नई रणनीति की योजना को तैयार कर लिया था, पर सूचना मंत्रालय के बाबुओं के विरोध के चलते वह इसे लागू नहीं कर पाए। अपने कार्यक्षेत्र में आई.ए.एस. अधिकारियों के हस्तक्षेप से वह अधिक खुश नहीं थे। पर, हमारी सूचनाओं के अनुसार ऐसे सभी लोगों को चलता कर दिया गया है। अब सरकार की नई छवि सुधार रणनीति कितनी सफल हो पाती है, इसे देखना अभी बाकी है।
संवेदनशील कामों के लिए बेहतरीन लोगों को चुनना एक परफैक्शनिस्ट की पहचान होती है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लगता है कि कुछ-कुछ वैसा ही कर रहे हैं। वर्तमान संकेतों के अनुसार मोदी सरकार लगातार ग्रामीण विकास पर ध्यान केन्द्रित कर रही है लेकिन यह देखकर काफी हैरानी होती है कि सचिव, ग्रामीण विकास का पद जनवरी से खाली पड़ा है और पिछले सचिव जे.के. महापात्रा के सेवानिवृत्त होने के बाद से कोई नया अधिकारी इस पद के लिए चुना नहीं जा सका है।
इस काम को इस समय पहले से काम के बोझ से दबे पंचायती राज सचिवों पर अतिरिक्त कार्यभार के तौर पर लादा गया है। हाल ही में किए गए फेरबदल में भी 12 नए सचिवों की नियुक्ति की गई लेकिन ग्रामीण विकास मंत्रालय को इस बार भी नजरअंदाज कर दिया गया। सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री की नजर में इस पद के अत्यधिक महत्व के बावजूद कुछ ही वरिष्ठ बाबुओं ने इस पद में कुछ सक्रिय दिलचस्पी दिखाई है। जिन लोगों ने दिलचस्पी दिखाई, वे मोदी के उच्च मानकों पर खरा नहीं उतर पाए। यह तो तय है कि आने वाले सालों में यह सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक होगा क्योंकि सरकार गरीबों और ग्रामीणों के विकास के लिए रणनीतियों को लगातार तैयार कर उन पर काम कर रही है। यह रणनीति न सिर्फ मोदी, बल्कि भाजपा के राजनीतिक भविष्य के लिए भी पूरे खेल को बदल सकती है। इससे जुडक़र काम करने वालों के लिए भी यह बेहद उपयोगी रणनीति रहेगी। इस दौरान मोदी लगातार किसी ऐसे अधिकारी का इंतजार कर रहे हैं जो उनकी महत्वाकांक्षी योजनाओं को प्रभावी तौर पर लागू कर पाए।
छत्तीसगढ़ के एक आई.ए.एस. अधिकारी जगदीश सोनकर का एक सरकारी अस्पताल में एक बिस्तर के किनारे पर पैर रखकर मरीज से बातचीत करते हुए फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सोनकर के गले की फांस बना हुआ है। विशेषकर ट्विटर पर इस फोटो के बाद से सोनकर को काफी कुछ सुनना पड़ रहा है। आई.ए.एस. एसोसिएशन ने भी अधिकारी के इस कदम को ‘हैरानीजनक और अस्वीकार्य’ करार दिया। यहां तक कि मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी तुरंत नए अधिकारियों को सामाजिक व्यवहार और आम लोगों से बातचीत के लिए विशेष प्रशिक्षण लेने का निर्देश दिया। सोशल मीडिया के दौर में एक क्लिप भी चीजों को बदल देने की ताकत रखता है!
स्पष्ट है कि हर कोई इस बात पर सहमत है कि शालीनता को बनाए रखने की जरूरत है, पर सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस फोटो को लेकर लोग जिस तरह से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, वह भी उतना ही परेशान करती है। हालांकि सोनकर ने फेसबुक पर बिना किसी शर्त के सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांग ली, पर इससे भी यह मामला अभी इतना दबता नहीं दिख रहा है। एक नए अधिकारी द्वारा शायद एक पल के लिए की गई गलती (जो कि किसी के प्रति इतनी उग्र भी नहीं है), को इतना भी अधिक बढ़ाना-चढ़ाना नहीं चाहिए कि ऐसे युवा आई.ए.एस. अधिकारी पर कुछ गहरा प्रभाव छोड़ जाए जो कि अब पहले ही संस्पैंशन के तहत है।
बल्कि इस मामले में एक तथ्य यह है कि इस अधिकारी ने पूरी ईमानदारी से तुरंत ही प्रतिक्रिया देते हुए बिना शर्त माफी मांग ली और उन्होंने बाबुओं को मिले विशेषाधिकारों के पीछे छिपने का प्रयास भी नहीं किया। ऐसे में यह बाबुओं के लिए भी एक सबक है कि प्रलंयकारी रूप धारण कर चुके सोशल मीडिया में एक छोटी-सी गलती की भी गुंजाइश नहीं है। अफसोस है कि सोनकर को इस बारे में थोड़ा देरी से पता चला।

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