छप्पन इंच की छाती बातचीत पर भारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच हुई मुलाकात और समझौते में राष्टï्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच बातचीत का फैसला हुआ था। वास्तव में यह दो पड़ोसी देशों के बीच बातचीत का पिछले साल से रुका सिलसिला दोबारा शुरू करने का फैसला था। इस सिलसिले की अगली कडिय़ों के तौर पर डीजीएमओ, सीमा सुरक्षा प्रमुखों आदि के स्तर पर वार्ताएं होनी थीं। वार्ताओं का स्तर उत्तरोत्तर ऊपर उठाते हुए, इस सिलसिले को अगले साल सार्क के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान जाने के स्तर तक ले जाया जाना था।

राजेंद्र शर्मा
आखिरकार, वही हुआ जिसकी आशंका थी। भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद की गाड़ी स्टेशन से छूटने से पहले ही कैंसल हो गयी। इस्लामाबाद के हवाई अड्डों पर नई-दिल्ली के लिए उड़ान भरने की प्रतीक्षा कर रहा विशेष विमान प्रतीक्षा ही करता रह गया। दिन भर चली रस्साकशी के बाद, शनिवार को देर शाम पाकिस्तान के विदेश विभाग की ओर से यह ऐलान कर दिया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, सरताज अजीज अपने भारतीय समकक्ष अजीत डोभाल के साथ सोमवार को होने वाली बातचीत के लिए नई-दिल्ली नहीं जा रहे हैंं। बहरहाल, इस बयान में बातचीत होते-होते आखिरी वक्त पर रद्द हो जाने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए, यह भी कहा गया कि पाकिस्तान को यह फैसला इसलिए लेना पड़ा है कि भारत की विदेश मंत्री, सुषमा स्वराज द्वारा लगायी गयी शर्तों के आधार पर ‘बातचीत करने का कोई अर्थ ही नहीं था।’
और जैसा कि आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था, पाकिस्तान के उक्त निर्णय पर अपनी प्रतिक्रिया में भारत के विदेश विभाग के प्रवक्ता न सिर्फ जवाब में यह दावा किया कि बातचीत के लिए ‘भारत ने कोई पूर्व शर्त नहीं लगायी थी’ बल्कि वह यह कहना भी नहीं भूले कि, ‘पाकिस्तान का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है।’ दोनों देशों के विदेश विभाग के प्रवक्ताओं के दावों ने उसी सच्चाई की पुष्टिï की है, जिसकी ओर इस बातचीत को लेकर करीब हफ्तेभर से जारी खींचतान के बीच, दोनों देशों के रिश्तों के कई जानकार पहले ही इशारा कर चुके थे। इन जानकारों के अनुसार, यह ऐसी बातचीत थी, जिससे अपने-अपने कारणों से, भारत और पाकिस्तान, दोनों की ही सरकारें बचना चाहती थीं। दोनों को अगर तलाश थी तो ऐसे बहाने की, जिससे बातचीत रद्द होने के फैसले की जिम्मेदारी दूसरे के सिर पर डाली जा सके। लेकिन क्यों? पड़ोसी के साथ समस्याओं पर बातचीत करना ही कॉमनसेंस का तकाजा है। फिर यह तो दो नाभिकीय पड़ोसियों के बीच बातचीत शुरू होते-होते फिर रुक जाने का मामला है। बाकी दुनिया को सफाई भी तो देनी पड़ेगी।
चंद महीने पहले रूस में उफा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच हुई मुलाकात और समझौते में, राष्टï्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच बातचीत का फैसला हुआ था। वास्तव में यह दो पड़ौसी देशों के बीच बातचीत का पिछले साल से रुका सिलसिला दोबारा शुरू करने का फैसला था। इस सिलसिले की अगली कडिय़ों के तौर पर डीजीएमओ, सीमा सुरक्षा प्रमुखों आदि के स्तर पर वार्ताएं होनी थीं। वार्ताओं का स्तर उत्तरोत्तर ऊपर उठाते हुए, इस सिलसिले को अगले साल सार्क के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान जाने के स्तर तक ले जाया जाना था। लेकिन, फिलहाल तो यह प्रक्रिया रुक गयी है, हालांकि डीजीएमओ स्तर की प्रस्तावित वार्ताओं के सिलसिले में अब तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। बहरहाल, जिस तरह यह बातचीत टूटी है और उसके लिए दोनों ओर से एक-दूसरे को दोषी ठहराने की कोशिशें की जा रही हैं, उसे देखते हुए जल्दी से बातचीत की गाड़ी चलने की संभावनाएं नजर नहीं आ रही हैं। यह दूसरी बात है कि जैसा कि कुछ टिप्पणीकारों का कहना है, मीडिया की नजरों से दूर, अगले महीने की संयुक्त राष्ट्र संघ के अपने दौरे के हाशिए पर, उफा की तरह दोनों प्रधानमंत्री एक बार फिर भी मिल सकते हैं।
दोनों प्रधानमंत्रियों की उफा की बैठक और उसमें बनी सहमति, इस पहलू से तो तार्किक भी थी और प्रत्याशित भी कि, दोनों देशों की बातचीत पिछले साल से बंद थी। याद रहे कि पिछले साल भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की वार्ता इसी तरह ठीक आखिरी वक्त पर भारत ने, पाकिस्तान केे विदेश सचिव के हुर्रियत नेताओं के साथ मुलाकात करने के ठीक उसी मुद्दे पर रद्द की थी, जो इस बार भी बातचीत रद्द होने का कारण बना है। अंतर सिर्फ इतना है कि इस बार, बातचीत से हटने का ऐलान औपचारिक रूप से पाकिस्तान की ओर से आया है। वास्तव में यह मुद्दा एक बार फिर बातचीत की गाड़ी पटरी से उतार सकता है, यह तो तभी साफ हो गया था जब बाद में आए ख्याल के तौर पर, भारत की ओर से यह दोहराना शुरू हुआ था कि भारत, इस बतचीत के मौके पर अजीज़ का अलगाववादी हुर्रियत कान्फ्रेंस आदि जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों से मुलाकात करना पसंद नहीं करेगा। लेकिन, दूसरी ओर सरकार की ओर से ही खासतौर पर सीमा पर तनाव के संदर्भ में यह कहा जा रहा था कि ऐसी घटनाओं को बातचीत के फैसले के आड़े नहीं आने दिया जाएगा। इससे व्यापक रूप से यह संदेश गया कि संभवत: इस बार विदेश सचिवों के बीच बातचीत का नाटक नहीं दोहराया जाएगा।

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