चुनौतीपूर्ण है शाह की दूसरी पारी

अमित शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती है पार्टी और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बिठाना। लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी जैसे कई भाजपा के वरिष्ठï नेताओं की नाराजगी समय-समय पर दिख जाती है। शाह की ताजपोशी के अवसर पर भी ये लोग मौजूद नहीं थे। पार्टी के वरिष्ठï नेताओं की नाराजगी निश्चित ही पार्टी के हित में नहीं है। इससे यही संदेश जाता है कि पार्टी अंतर्कलह की समस्या से जूझ रही है।

sanjay sharma editor5 बार फिर भाजपा ने अमित शाह पर भरोसा जताते हुए भाजपा अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंप दी। पिछले तीन साल यानी अगले चुनावों तक भाजपा की कमान अमित शाह के हाथ में रहेगी। दिल्ली और बिहार चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार के बाद उनके अध्यक्ष पद पर दोबारा चयन को लेकर शंका जतायी जा रही थी लेकिन शाह की ताजपोशी से इन खबरों पर विराम लग गया। लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली जीत की वजह से ही उनका कद बढ़ा था और उन्हें भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था। फिलहाल वर्तमान में अमित शाह के सामने अनेक चुनौतियां मौजूद हैं। बिहार चुनाव में मिली करारी हार के बाद से उनके ऊपर दबाव बढ़ गया है। अब जबकि आगे कई राज्यों में चुनाव होने हैं तो निश्चित ही भाजपा के साथ-साथ शाह के लिए भी अग्नि परीक्षा होगी, क्योंकि उनकी रणनीतिक कुशलता और प्रबंधन की वजह से ही उन्हें भाजपा का राष्टï्रीय अध्यक्ष बनाया गया। यदि वह इन चुनौतियों से पार पाते हैं तो नि:संदेह भाजपा का आधार और मजबूत होगा।
अमित शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती है पार्टी और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बिठाना। लालकृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी जैसे कई भाजपा के वरिष्ठï नेताओं की नाराजगी समय-समय पर दिख जाती है। शाह की ताजपोशी के अवसर पर भी ये लोग मौजूद नहीं थे। पार्टी के वरिष्ठï नेताओं की नाराजगी निश्चित ही पार्टी के हित में नहीं है। इससे यही संदेश जाता है कि पार्टी अंतर्कलह की समस्या से जूझ रही है। बिहार में जिस तरीके से वरिष्ठï नेताओं को हाशिए पर डाल दिया गया था उससे पार्टी कार्यकर्ताओं में रोष था और उसका परिणाम चुनाव में दिखा। कुछ खास लोगों पर विश्वास कर चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती। भाजपा के लिए तो बेहद जरूरी है कि पार्टी के लोग अनुशासन और पार्टी की नीतियों के हिसाब से बर्ताव करें, क्योंकि वह केन्द्र में सत्तासीन है। इसके अलावा भी कई चुनौतियां पार्टी के समक्ष मौजूद है। जिस मोदी लहर और वादों के बलबूते भाजपा ने लोकसभा और चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में जीत का स्वाद चखा था, वह लहर समाप्त हो चुकी है। जनता पीएम मोदी द्वारा किए गए वादों को धरातल पर देखना चाहती है। भले ही केंद्र सरकार लगातार नई योजनाओं की घोषणा कर रही हो, प्रधानमंत्री विदेश यात्राओं के जरिए रोज नई दोस्ती के समीकरण रच रहे हैं, मगर जमीनी हकीकत यह है कि आम लोगों में सरकार के कामकाज को लेकर उत्साह नहीं दिखता। अब देखना दिलचस्प होगा कि अपनी दूसरी पारी में अमित शाह इन चुनौतियों से निपट पाते हैं या फिर…

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