चुनावों से पहले हिन्दू वोट बैंक को साधने की कोशिश

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक कालखंड ऐसा भी रहा था, जब परस्पर विरोधी भाजपा नेता कल्याण सिंह और समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव की सूबे की सियासत में तूती बोलती थी। भाजपा नेता और मुख्यमंत्री रह चुके कल्याण सिंह को उनके समर्थक हिन्दू हृदय सम्राट की उपाधि देते नहीं थकते थे तो मुलायम सिंह की छवि मुल्ला मुलायम वाली थी। दोनों की ही सियासत को परवान चढ़ाने में अयोध्या से जुड़े एक विवाद (राजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसला) का अहम रोल रहा। कल्याण सिंह ने जहां भगवान श्रीराम के नाम का जाप कर-करके अपनी हिन्दुत्ववादी छवि को चमकाया वहीं मुलायम ने बाबरी मस्जिद के सहारे मुसलमानों के बीच अपना जनाधार बढ़ाया। हाल यह था कि कल्याण सिंह के समर्थक मुलायम का नाम सुनते ही लाल-पीले हो जाते थे तो मुलायम समर्थक कल्याण सिंह का नाम आते ही मु_ी तान लेते थे। टकराव दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच तक ही नहीं सिमटा था, दोनों नेता (कल्याण-मुलायम) भी एक-दूसरे के खिलाफ ‘तलवार’ निकाले रहते थे।

ajay kumarउत्तर प्रदेश की राजनीति में एक कालखंड ऐसा भी रहा था, जब परस्पर विरोधी भाजपा नेता कल्याण सिंह और समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव की सूबे की सियासत में तूती बोलती थी। भाजपा नेता और मुख्यमंत्री रह चुके कल्याण सिंह को उनके समर्थक हिन्दू हृदय सम्राट की उपाधि देते नहीं थकते थे तो मुलायम सिंह की छवि मुल्ला मुलायम वाली थी। दोनों की ही सियासत को परवान चढ़ाने में अयोध्या से जुड़े एक विवाद (राजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसला) का अहम रोल रहा। कल्याण सिंह ने जहां भगवान श्रीराम के नाम का जाप कर-करके अपनी हिन्दुत्ववादी छवि को चमकाया वहीं मुलायम ने बाबरी मस्जिद के सहारे मुसलमानों के बीच अपना जनाधार बढ़ाया। हाल यह था कि कल्याण सिंह के समर्थक मुलायम का नाम सुनते ही लाल-पीले हो जाते थे तो मुलायम समर्थक कल्याण सिंह का नाम आते ही मु_ी तान लेते थे। टकराव दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच तक ही नहीं सिमटा था, दोनों नेता (कल्याण-मुलायम) भी एक-दूसरे के खिलाफ ‘तलवार’ निकाले रहते थे। दोनों ही नेता उनके मंचों और समारोह से भी दूरी बनाकर चलते थे, जहां दोनों का आमना-सामना हो सकता था, लेकिन समय बलवान होता है। जो लोग कल्याण सिंह और मुलायम को नदी के दो पाट मानते थे, उनके जेहन में शायद कभी अमर सिंह का नाम नहीं आया होगा। जो काम सबके लिये असंभव था, उसे अमर सिंह ने कर दिखाया। वर्ष 2009 में समाजवादी पार्टी के आगरा अधिवेशन में अमर सिंह के प्रयास से कल्याण-मुलायम एक मंच पर नजर आये तो यूपी की सियासत में हाहाकार मच गया।
चर्चा यह भी छिड़ी थी की कल्याण सिंह (जो उस समय भाजपा से बाहर चल रहे थे) को समाजवादी पार्टी ज्वाइन कराकर लोकसभा चुनाव लडऩे का आफर तक दिया गया था। कल्याण-मुलायम को एक मंच पर लाने और कल्याण को सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाने के पीछे की सियासी सोच यही थी कि किसी तरह से मुलायम की मुल्ला मुलायम वाली छवि जिसके कारण हिन्दू वोटर सपा से बिदक रहे थे, का रंग थोड़ा फीका किया जा सके। परंतु इस पर बात बनती उससे पहले ही समाजवादी पार्टी में बवाल खड़ा हो गया। आजम खान ही नहीं सपा के अन्य कई मुस्लिम नेताओं ने भी बगावत कर दी। विरोधी हमलावार हो गये तो आम मुसलमान के बीच भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई। मुलायम के करीबी आजम खान ने इस प्रकरण से नाराज होकर समाजवादी पार्टी से किनारा कर लिया। सपा में सब कुछ अप्रत्याशित हो रहा था। मुलायम ने अपना दांव उलटा पड़ते देख, कदम पीछे खींच लिये तो अमर सिंह का पार्टी में रूतबा कम हो गया। कालांतर में इसकी परिणति अमर की समाजवादी पार्टी से विदाई के रूप में हुई। 6 जनवरी 2010 को अमर सिंह ने सपा के सभी पदों से इस्तीफा दिया तो 2 फरवरी 2010 को पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया।
यह वह दौर था जब बड़ी तादाद में लोग यह मानने लगे थे कि समाजवादी पार्टी में अमर सिंह का कद मुलायम से भी बड़ा हो गया है, लेकिन कल्याण प्रकरण के बाद अमर सिंह के लिये समाजवादी पार्टी में रहना मुश्किल हो गया। अमर सिंह जिन्हें बाद में समाजवादी पार्टी से बाहर का रास्ता देखना पड़ा था। अब करीब छह वर्षों के पश्चात एक बार फिर उनकी (अमर सिंह) सपा में वापसी की चर्चा छिड़ी है। भले ही आजम खान यह कहते हुए घूम रहे हों कि अमर सिंह दगा कारतूस हैं, सपा में वापस नहीं आ रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि अमर की वापसी की खबरों ने आजम ही नहीं उनके जैसे तमाम सपा नेताओं की नींद उड़ा रखी है।
खैर, यहां चर्चा अमर सिंह की समाजवादी पार्टी में वापसी की संभावनाओं को लेकर नहीं हो रही है। इस घटना का जिक्र प्रसंगवश किया गया था। दरअसल, तब भी मुलायम पार्टी का वोट बैंक बढ़ाने को लेकर चिंतित थे और आज भी उनकी यही फिक्र है। मुलायम को डर सता रहा है कि कहीं एम-वाई (मुस्लिम-यादव) के सहारे 2017 की वैतरणी पार करने की उनकी तमन्ना अधूरी न रह जाये। इसीलिये मुलायम सिंह यादव मुसलमानों को लुभाने के साथ-साथ हिन्दुत्व के एजेंडे को भी आगे बढ़ाने में जुट गये हैं। एक ओर नेताजी को वह अमर सिंह याद आ रहे हैं जो हिन्दुत्व के प्रतीक कल्याण सिंह को उनके (मुलायम सिंह) करीब लाये थे तो दूसरी तरफ नब्बे के दशक में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने की घटना पर भी मुलायम अफसोस जाहिर कर रहे हैं। बताते चलें, मुलायम उस समय मुख्यमंत्री थे। लाखों की संख्या में कारसेवक रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे के पास जमा हो गये तो उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया, जिसमें 16 कारसेवकों की मौत हो गई थी। तब से लेकर आज तक इस मुद्दे पर शांत रहने वाले मुलायम ने हाल ही में एक न्यूज चैनल को दिये इंटरव्यू में कहा था कि वह एक दर्दनाक फैसला था, लेकिन उस समय मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। मुलायम का हिन्दू प्रेम ऐसे ही नहीं जागा है। इसके पीछे सटीक कारण हैं। राजनीति की पैनी नजर रखने वाले नेताजी जानते हैं कि 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के अलावा भी मुस्लिम वोटों के कई सौदागर मैदान में ताल ठोंकते दिखाई देंगे। चाहें ओवैसी हों या नीतिश-लालू की जोड़ी अथवा बहुजन समाज पार्टी सबकी नजरें मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने की है जबकि हिन्दू वोटरों का सौदागर सिर्फ भाजपा बनी हुई है। ऐसे में मुलायम को हिन्दू वोट बैंक में सेंध लगाना ज्यादा आसान लगा तो उन्होंने हिन्दुत्व के एजेंडे को ही आगे बढ़ा दिया।
अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर का निर्माण ऐसा मसला है जिस पर हमेशा वोट बैंक की सियासत होती रहती है। अयोध्या में पत्थर लाये जाने की घटना पर अखिलेश सरकार ने भले ही (हिन्दुत्व के एजेंडे को धार देने के लिये) चुप्पी साध ली थी, लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने इसके सहारे मुसलमानों को रिझाने का मौका नहीं खोया। मायावती ने अखिलेश सरकार पर पत्थरों को अयोध्या आने से नहीं रोकने के लिये तंज कसते हुए इसे समाजवादी पार्टी और भाजपा की सांठगांठ बता कर राजनैतिक चाल चल दी। बसपा सुप्रीमो मायावती भाजपा-सपा के बीच गठजोड़ की बात करके मुस्लिम वोटरों में संशय पैदा करने का कोई भी मौका छोड़ती नहीं हैं। बहरहाल, तमाम किन्तु-परंतुओं के बीच 2017 में राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, कोई नहीं जानता है।

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