चुनावों में धन बल का इस्तेमाल

कानूनी प्रावधानों के अभाव और नियमों में शिथिलता की वजह से निर्वाचन आयोग बहुत कड़ाई से रुपये की हेराफेरी और इस्तेमाल को रोक नहीं पाता है। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि ऐसे कई अध्ययन सामने आ रहे हैं जिसमें बताया गया है कि चुनावों में खर्च के लिहाज से भारत ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है।

sanjay sharma editor5निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में भारी मात्रा में बेनामी नकदी बरामद की है। इन चुनावी राज्यों की सूची में असम, केरल, बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी शामिल है। रिपोर्टों के अनुसार, 30 मार्च तक 41 करोड़ रुपये जब्त हुए हैं। इनमें सिर्फ तमिलनाडु से ही करीब 17 करोड़ रुपये की बरामदगी हुई है। बाकी की राशि असम, केरल, बंगाल और पुडुचेरी से पकड़ी गयी है।
चुनाव हमारे लोकतंत्र का हिस्सा हैं। अक्सर चुनावों में धन बल का खूब इस्तेमाल किया जाता है। स्थानीय निकाय चुनाव से लेकर लोकसभा तक हर चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिए नकदी, शराब, कपड़े, टीवी, लैपटॉप आदि बांटने की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं। इतना ही नहीं कुछ रिपोर्टों में यहां तक कहा गया है कि तमिलनाडु में कई पार्टियां मतदाताओं को खरीदने के लिए छह से नौ हजार करोड़ रुपये तक खर्च कर सकती हैं। निर्वाचन आयोग की कोशिशों और मतदाताओं में बढ़ती लोकतांत्रिक जागरूकता के बावजूद भी इस तरह के मामले खुलेआम हो रहे हैं। पिछले महीने दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को चुनाव में धन बल को रोकने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस समस्या से निजात पाने के लिए ठोस वैधानिक प्रावधान करने की जरूरत को रेखांकित किया। जिसमें विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव सुधारों की बात भी कही है।
हालांकि चुनावों में उम्मीदवारों के द्वारा खर्च की राशि की सीमा तय है। पर इस नियम का खुला उल्लंघन हो रहा है। लेकिन विडंबना यह भी है कि पार्टियों द्वारा खर्च की जाने वाली रकम की कोई कानूनी तय सीमा नहीं है। कानूनी प्रावधानों के अभाव और नियमों में शिथिलता की वजह से निर्वाचन आयोग बहुत कड़ाई से रुपये की हेराफेरी और इस्तेमाल को रोक नहीं पाता है। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि ऐसे कई अध्ययन सामने आ रहे हैं जिसमें बताया गया है कि चुनावों में खर्च के लिहाज से भारत ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है। हमारे जन प्रतिनिधियों की सूची भी इस बात की गवाही देती है जिसमें उनके करोड़ों खर्च की बात है। निश्चित रूप से इससे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की पैठ गहरी हो रही है। यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर रही है। ऐसे में यह जरूरी है कि धन के दुरुपयोग को रोका जाए। इसके लिए जरूरी और ठोस उपाय करने होंगे। इसके लिए लोगों में जागरूकता बढ़ानी होगी, जिससे वह धन बल के गलत इस्तेमाल वाले राजनीतिक दलों का बहिष्कार करें।

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