चुनावी तैयारियों से नहीं, फजीहतों को लेकर उप्र भाजपा चर्चा में

लखनऊ-उन्न्नाव से भाजपा प्रत्याशी अनिरुद्ध चंदेल, मेरठ-गाजियाबाद से वीरेंद्र सिंह और बांदा-हमीरपुर से प्रत्याशी आनंद ajay kumarत्रिपाठी ने सियायत में मौकापरस्ती की एक नई मिसाल पेश करते हुए अंतिम समय में सपा उम्मीदवारों के समर्थन में पर्चा वापस ले लिया। तीनों प्रत्याशियों के धोबीपाट से भाजपा आलाकमान को साफ-साफ संकेत मिल गया कि उसने (भाजपा) बाजार से ‘लंगड़े घोड़े’ खरीद कर चुनावी दंगल में दांव लगा दिया था। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधान परिषद की स्थानीय निकाय कोटे की 36 सीटों पर चुनाव होना था। अगले साल विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा विधान परिषद का चुनाव जीत कर जनता के बीच यह संकेत देना चाहती थी कि प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बन रहा है। प्रत्याशी वजनदार हों इसके लिये पार्टी ने अपनों से अधिक बाहरियों पर भरोसा किया और दूसरी पार्टियों से रातों-रात भारी भरकम प्रत्याशी ले लाई। इन प्रत्याशियों से भाजपा को जीत की उम्मीद थी लेकिन इस उम्मीद के टूटने में कुछ घंटे ही लगे। आयातित प्रत्याशियों ने ऐन वक्त पर भाजपा की जमकर फजीहत करवा दी। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ के एक स्थाीनय भाजपा विधायक की सिफारिश पर लखनऊ-उन्नाव सीट पर टिकट पाए अनिरुद्ध चंदेल ने नामांकन खत्म होने से तीन मिनट पहले नाम वापस ले लिया। इससे लखनऊ-उन्नाव सीट से सपा के सुनील सिंह निर्विरोध जीत गए। भाजपा के लखनऊ जिलाध्यक्ष राम निवास यादव ने आरोप लगाने में देरी नहीं की कि सपा ने तीन करोड़ रुपये देकर उनके प्रत्याशी को खरीदा है।

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। उसे कई मोर्चों पर एक साथ संकट से गुजरना पड़ रहा है। पार्टी के जिलाध्यक्षों और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर पार्टी के भीतर मची महाभारत सब देख रहे हैं। यही नहीं उत्तर प्रदेश के नये भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव का मामला भी अब तक अनसुलझा है और इसी बीच विधान परिषद में स्थानीय निकाय कोटे की 36 सीटों के लिये होने वाले चुनाव भी भाजपा नेतृत्व के लिये फजीहत का नया कारण बन गये। फजीहत भी ऐसी-वैसी नहीं, यह उन क्षेत्रों में हुई जो भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेताओं राजनाथ सिंह, साध्वी उमा भारती और पूर्व सेनाध्यक्ष और भाजपा नेता वीके सिंह का गढ़ माने जाते हैं। इन तीनों दिग्गजों के संसदीय क्षेत्र के विधान परिषद प्रत्याशियों ने ऐन वक्त पर अपना नाम वापस लेकर भाजपा को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। एमएलसी चुनाव में सपा को टक्कर देने के लिये जिन सूरमाओं को भाजपा बड़े अरमानों के साथ दूसरी पार्टियों से लाई थी, उन्होंने भाजपा की ही साख पर बट्टा लगा दिया।
लखनऊ-उन्न्नाव से भाजपा प्रत्याशी अनिरुद्ध चंदेल, मेरठ-गाजियाबाद से वीरेंद्र सिंह और बांदा-हमीरपुर से प्रत्याशी आनंद त्रिपाठी ने सियायत में मौकापरस्ती की एक नई मिसाल पेश करते हुए अंतिम समय में सपा उम्मीदवारों के समर्थन में पर्चा वापस ले लिया। तीनों प्रत्याशियों के धोबीपाट से भाजपा आलाकमान को साफ-साफ संकेत मिल गया कि उसने (भाजपा) बाजार से ‘लंगड़े घोड़े’ खरीद कर चुनावी दंगल में दांव लगा दिया था।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधान परिषद की स्थानीय निकाय कोटे की 36 सीटों पर चुनाव होना था। अगले साल विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा विधान परिषद का चुनाव जीत कर जनता के बीच यह संकेत देना चाहती थी कि प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बन रहा है। प्रत्याशी वजनदार हों इसके लिये पार्टी ने अपनों से अधिक बाहरियों पर भरोसा किया और दूसरी पार्टियों से रातों-रात भारी भरकम प्रत्याशी ले लाई। इन प्रत्याशियों से भाजपा को जीत की उम्मीद थी लेकिन इस उम्मीद के टूटने में कुछ घंटे ही लगे। आयातित प्रत्याशियों ने ऐन वक्त पर भाजपा की जमकर फजीहत करवा दी। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र लखनऊ के एक स्थाीनय भाजपा विधायक की सिफारिश पर लखनऊ-उन्नाव सीट पर टिकट पाए अनिरुद्ध चंदेल ने नामांकन खत्म होने से तीन मिनट पहले नाम वापस ले लिया। इससे लखनऊ-उन्नाव सीट से सपा के सुनील सिंह निर्विरोध जीत गए। भाजपा के लखनऊ जिलाध्यक्ष राम निवास यादव ने आरोप लगाने में देरी नहीं की कि सपा ने तीन करोड़ रुपये देकर उनके प्रत्याशी को खरीदा है। वहीं चंदेल ने इस पूरे घटनाक्रम पर न तो कोई बयान दिया न ही सफाई।
इसी प्रकार केंद्रीय मंत्री उमा भारती के संसदीय क्षेत्र की बांदा-हमीरपुर सीट पर भाजपा ने सपा से विधान परिषद का चुनाव लड़ चुके आनन्द त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया था। त्रिपाठी कब भाजपा में आये और कैसे उन्हें आनन-फानन में टिकट थमा दिया गया यह बात भाजपा के चंद चेहरों के अलावा कोई नहीं जानता था। त्रिपाठी ने भी अंतिम दिन सपा प्रत्याशी के समर्थन में नाम वापस ले लिया। इसके साथ ही बांदा-हमीरपुर से सपा के रमेश मिश्रा जीत गए। इस घटनाक्रम के तुरंत बाद भाजपा ने चंदेल और त्रिपाठी को पार्टी से बाहर का रास्ता जरूर दिखा दिया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।
उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह की राजनीति के गढ़ मेरठ-गाजियाबाद में भाजपा प्रत्याशी वीरेन्द्र सिंह का तो कहना ही क्या। वह एक दिन के लिये भाजपा में आये, प्रत्याशी बने और दूसरे दिन पर्चा वापस करके फिर समाजवादी पार्टी में वापस चले गये। भाजपा के प्रत्याशी अनिरुद्ध सिंह चुपचाप पर्चा वापस लेने आए और गुपचुप चले गए। पार्टी के समर्थक उन्हें खोजते रहे गए और उनका पर्चा वापस हो गया। यह बात जब भाजपा के कुछ नेताओं को पता चली तो उन्होंने पार्टी के कुछ चहेतों को कलेक्ट्रेट भेजा। यहां न तो अनिरुद्ध सिंह मिले न ही उनके साथी। भाजपाई हाथ मलते रह गये।
नाम वापसी की प्रक्रिया खत्म होने के साथ ही लखनऊ-उन्नाव सीट से सुनील सिंह साजन, बांदा-हमीरपुर से रमेश मिश्रा, मेरठ-गाजियाबाद से राकेश यादव, प्रतापगढ़ से अक्षय प्रताप सिंह, सीतापुर से आनंद भदौरिया, आगरा-फिरोजाबाद से दिलीप यादव, एटा-मथुरा-मैनपुरी उदयवीर सिंह और अरविंद यादव निर्विरोध विधान परिषद सदस्य बन गये। अब केवल 28 सीटों पर चुनाव होगा। इनमें 21 सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार हैं। पूरे घटनाक्रम पर उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी का कहना था कि जिला-क्षेत्र संगठन की राय से उम्मीदवार तय किए गए थे। पता करेंगे कहां चूक रही जिससे भविष्य में गड़बड़ी नहीं हो। वहीं आम भाजपाई कह रहा है कि खून-पसीना हम बहायें और मलाई कोई और मारे यह सही तरीका नहीं है। इस रास्ते पर भाजपा आलाकमान चलता रहा तो पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा। गौरतलब है कि विधानसभा उपचुनावों में एक सीट समाजवादी पार्टी से छीनने वाली भाजपा के नेता यही कह रहे हैं कि प्रदेश में पार्टी के पक्ष में लहर है लेकिन पार्टी संगठन का क्या हाल है यह सब जनता के सामने आ रहा है।

 

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