चुनावी जोड़-तोड़

“उत्तर प्रदेश में जातिगत आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति के चक्कर में भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्या को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इस फैसले के कुछ ही दिनों बाद सपा मुखिया मुलायम सिंह ने कांग्रेस पार्टी के नेता बेनी प्रसाद वर्मा को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। ठाकुर लॉबी का समर्थन हासिल करने के लिए अमर सिंह की सपा में वापसी करा दी गई। जबकि सपा के दो नेताओं गुड्डू पंडित और उनके भाई को सपा ने बाहर का रास्ता दिखा दिया।”
sanjay sharma editor5उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव का असर राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली से साफ नजर आ रहा है। भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा समेत तमाम राजनीतिक पार्टियों के नेता अपना वोट बैंक मजबूत करने और विपक्षी पार्टियों को तोडऩे की फिराक में लगे हैं। सत्ताधारी पार्टी से जुडऩे को बहुत से नेता बेताब दिख रहे हैं। इसी वजह से बेनी प्रसाद वर्मा से लेकर विजय बहादुर यादव तक को तोडऩे और अपने साथ जोडऩे में सपा सफल रही है। वह आगामी चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देने की पृष्ठभूमि तैयार कर रही है। इस जोड़-तोड़ की राजनीति में जनता की उम्मीदों का क्या होगा? यह सवाल सबकी जुबान पर है लेकिन जवाब किसी के पास नहीं दिख रहा है।
उत्तर प्रदेश में जातिगत आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीति के चक्कर में भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्या को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इस फैसले के कुछ ही दिनों बाद सपा मुखिया मुलायम सिंह ने कांग्रेस पार्टी के नेता बेनी प्रसाद वर्मा को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। ठाकुर लॉबी का समर्थन हासिल करने के लिए अमर सिंह की सपा में वापसी करा दी गई। जबकि सपा के दो नेताओं गुड्डू पंडित और उनके भाई को सपा ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। वहीं भाजपा नेता विजय बहादुर यादव पार्टी के खिलाफ खड़े हो गये। उन्होंने सपा ज्वाइन कर लिया। सपा नेता पूर्वांचल में मुस्लिम वोट बैंक हासिल करने के मकसद से माफिया मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का विलय कराने में जुट गए हैं। यह काम मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सहमति लिए बिना किया गया। इसलिए नाराज अखिलेश को मनाने की कोशिश की जा रही है, मगर हर किसी को मालूम है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव अपने बेटे अखिलेश को मनाना जानते हैं। राजनीतिक गलियारे में सबसे अधिक चर्चित और ताजा मामला स्वामी प्रसाद मौर्या का है। उन्होंने अचानक बसपा सुप्रीमों पर टिकट बेचने समेत कई गंभीर आरोप लगाकर पार्टी छोडऩे का ऐलान कर दिया। इस घोषणा के बाद मौर्या को अपनी पार्टी में मिलाने के लिए सपा और भाजपा नेताओं में होड़ मची है। ऐसा माना जा रहा है कि स्वामी प्रसाद मौर्या आगामी चुनाव के दौरान कुर्मी वोट बैंक हासिल करवाने में अहम किरदार निभा सकते हैं। लेकिन वह किस पार्टी का दामन थामेंगे। यह अभी तक समय के गर्भ में है।
खैर, इतना तो तय है कि आने वाले समय में कुर्सी की लालच में ढेरों नेता पाला बदलेंगे, जो प्रदेश की जनता की उम्मीदों के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में आम जनता को सावधान रहने की जरूरत है। उसे अपने वोट की कीमत और ताकत को पहचानना होगा। वह तभी सही वक्त पर उचित निर्णय लेकर अपनी तकदीर बदल सकेगी।

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