चीन की मेक इन चाईना फॉर इंडिया रणनीति

यहां पर दो सवाल उठते हैं, पहला सवाल, क्या चीन भारत से द्विपक्षीय व्यापार में अपना बाजार भारतीय निर्मित उत्पादों के लिए सुगम बनाकर बढ़े व्यापार घाटा को कम करने में सचमुच सहयोग देगा? दूसरा सवाल, क्या चीन के उद्योगपति भारत को अपना निर्मित माल निर्यात करने की बजाय भारत में उद्योग स्थापित करके यहां मैन्युफैक्चरिंग करेंगे?

 डॉ. हनुमंत यादव
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत के विदेशी व्यापार में निर्यात से आयात अधिक होने के कारण व्यापार घाटा बड़ी समस्या सही है। व्यापार घाटा के कारण भुगतान संतुलन की स्थिति ऋणात्मक रही है तथा चालू लेखा घाटा कम नहीं हो पा रहा है। इस कारण से आयातित वस्तु के भुगतान हेतु विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। भारत अपनी घरेलू जरूरत की पूर्ति के लिए न केवल खनिज तेल, हाईटेक मशीनें व साज सामान, आधुनिक सैन्य सामग्री हथियार बल्कि समय-समय पर खाद्य तेल, दलहन, चीनी व खाद्यान्न व सोने का विदेशों से आयात कर रहा है।
1960 तक विदेशी व्यापार में ग्रेट ब्रिटेन भारत का सबसे बड़ा भागीदार था, इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका भारत का प्रमुख भागीदार बन गया। पहले कुछ वर्षों से अमेरिका के स्थान पर चीन भारत का प्रमुख भागीदार बन गया है। सन् 2000 में भारत-चीन का व्यापार मात्र 2.9 बिलियन डॉलर का था, वह 2012 में बढक़र 80 बिलियन डॉलर का हो गया। कुल विदेशी व्यापार में चीन का हिस्सा बढक़र 13.6 फीसदी हो गया है। दूसरी ओर, चीन को भारत से जितने मूल्य का निर्यात किया जाता है, उससे चार गुना मूल्य का आयात होता है। इससे भुगतान संतुलन चीन के पक्ष में रहता है, तथा भुगतान के रूप में भारत का डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। भारत प्रमुख रूप से कच्चा माल चीन को निर्यात करता है और वहां से निर्मित माल मंगाता है। 2013 में चीन से 3993 अरब मूल्य रुपये सामान का आयात हुआ था, जबकि निर्यात मात्र 1039 अरब रुपये का ही हो पाया था। सरकार के प्रयासों के बावजूद चीन को निर्यात में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पा रही है। चिन्ता की सबसे बड़ी बात यह है कि चीन से जितने मूल्य का अधिकृत व्यापार होता है, लगभग उतना ही सामान तस्करी के रूप में चोरी-छिपे आ रहा है।
यहां पर दो सवाल उठते हैं, पहला सवाल, क्या चीन भारत से द्विपक्षीय व्यापार में अपना बाजार भारतीय निर्मित उत्पादों के लिए सुगम बनाकर बढ़े व्यापार घाटा को कम करने में सचमुच सहयोग देगा? दूसरा सवाल, क्या चीन के उद्योगपति भारत को अपना निर्मित माल निर्यात करने की बजाय भारत में उद्योग स्थापित करके यहां मैन्युफैक्चरिंग करेंगे? इन सवालों का उत्तर पाने के लिए चीन की औद्योगिक एवं विदेशी व्यापार की नीति एवं रणनीति पर नकार डालना जरूरी है। दरअसल चीन ने अपनी दीर्घकालीन रणनीति के तहत विदेशी व्यापार में भारत के प्रमुख भागीदार के रूप में अमेरिका को अपदस्थ कर स्वयं को स्थापित किया है। दीर्घकालीन योजना के तहत उसने बिना किसी शोर-शराबे के भारतीय बाजार के लिए- मेक इन चाईना फॉर इंडिया- मुहिम प्रारम्भ कर सफलता प्राप्त की है।
16 मई को चीनी कम्पनियों के साथ भारत में 21 हजार करोड़ डॉलर के निवेश के 22 समझौतों में से कितने मूर्तरूप हो पाएंगे, यह कहना कठिन है। भारत की तुलना में चीन में अनेक कारणों से औद्योगिक उत्पादन लागत कम आती है? इन्हीं कारणों से चीनी औद्योगिक एवं घरेलू माल विदेशों में कम कीमत पर उपलब्ध हो जाता है। यही सब देखकर पिछले साल भारतीय उद्योगपतियों का चीन में उद्योग लगाने हेतु आह्वान किया था। अनेक चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी नेता भारत को उद्योग व्यवसाय क्षेत्र में अपना प्रतिस्पर्धी मानते हैं, इसलिए वे कभी नहीं चाहेंगे कि भारत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मजबूत होकर चीन को बाजार में चुनौती देने की स्थिति में खड़ा हो सके। इसलिए यह भी हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ मिशन का मान रखने के लिए चीनी व्यवसायी चीन में निर्मित उत्पादों का आयात करके उस पर मेड इन इंडिया का लेबल लगाकर, जरूरी उत्पाद शुल्क का भुगतान करके भारत के बाजारों में बेचे और मुनाफा कमाए।

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