चर्चा में अभिव्यक्ति की आजादी

उड़ता-पंजाब फिल्म को लेकर सेंसर बोर्ड के रवैये और बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी के बयानों ने राजनीति को हवा देने का काम किया है। अब इस सवाल पर चर्चा होने लगी है कि क्या वाकई ऐसी फिल्मों पर कैंची चलने लगेगी, जो किसी न किसी तरह से सत्ता विरोध के आसपास घूम रही हो। देखा जाए तो सेंसर बोर्ड लगभग अधिकतर फिल्मों में कुछ सीन पर कैंची चलाने का काम करता है, चाहे वो अश्लीलता से जुड़ा पार्ट हो या कोई अन्य संवदेनशील मुद्दा हो।

sanjay sharma editor5इन दिनों फिल्म उड़ता-पंजाब को लेकर राजनीति से लेकर फिल्मी जगत तक में महमागहमी का माहौल है। भारत में फिल्मों को हरी झंडी देने वाले सेंसर बोर्ड के एतराज से एक बार फिर अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा चर्चा में है, जिसको लेकर सेंसर बोर्ड और फिल्म के निर्माता अनुराग कश्यप आमने-सामने हैं। इसके साथ ही फिल्म रिलीजिंग को लेकर लोगों की उत्सुकता और अधिक बढ़ गई है। हर व्यक्ति पंजाब की पृष्ठभूमि से जुड़ी फिल्म को देखने के लिए बेचैन नजर आ रहा है।
उड़ता-पंजाब फिल्म को लेकर सेंसर बोर्ड के रवैये और बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी के बयानों ने राजनीति को हवा देने का काम किया है। अब इस सवाल पर चर्चा होने लगी है कि क्या वाकई ऐसी फिल्मों पर कैंची चलने लगेगी, जो किसी न किसी तरह से सत्ता विरोध के आसपास घूम रही हों। देखा जाए तो सेंसर बोर्ड लगभग अधिकतर फिल्मों में कुछ सीन पर कैंची चलाने का काम करता है, चाहे वो अश्लीलता से जुड़ा पार्ट हो या कोई अन्य संवदेनशील मुद्दा हो। इसी के तहत उड़ता पंजाब के पर कतरने का काम किया गया है, जिसमें 13 कट्स के साथ फिल्म रिलीज करने की अनुमति दी गई है।
इसी तरह सेंसर बोर्ड ने पहली बार रिलीजिंग की कतार में लगी एक फिल्म को रिलीज करने की अनुमति नहीं देने का निर्णय लिया है। दरअसल यह फिल्म प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से जुड़ी है। यह नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के चुनाव की पृष्ठभूमि पर बनी है। इस फिल्म को दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके कमल स्वरूप ने बनाया है और फिल्म का नाम ‘बैटल फार बनारस’ है। फिल्म अभी भी सेंसर बोर्ड की फाइलों में अटकी हुई है। हाल ही में फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण यानी एफसीएटी ने फिल्म को मंजूरी देने से इनकार कर दिया था। एफसीएटी की दलील है कि फिल्म को रिलीज किए जाने की मंजूरी देने से सांप्रदायिक दुर्भावना पैदा हो सकती है।
दरअसल ऐसा पहली बार नहीं है कि निर्देशक कमल स्वरूप की कई फिल्में विवादित रह चुकी हैं। उन्होंने कई ऐसी फिल्में बनाई हैं, जिनकी काफी तारीफ की गई लेकिन विवादों की वजह से फिल्म रिलीज नहीं की गई। ऐसे में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर फिल्मों का निर्माण करने वाले निर्देशकों और सेंसर बोर्ड दोनों को जनता की भावनाओं और देश की छवि को ध्यान में रखकर काम करना होगा। फिल्म में विवादित मुद्दों को उठाकर दर्शकों की संख्या बटोरने से बचना होगा।

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