घूसखोरी में कमी का कारण सूचना का अधिकार

मानवेंद्र कुमार

सभी मानते हैं कि इस देश में कोई भी सरकारी योजना ऐसी नहीं है जहां भ्रष्टाचार न हो, मगर इसके विपरीत एक रिपोर्ट कहती है कि पहले के मुकाबले अब घूसखोरी में कमी आई है। जहां पहले 56 फीसदी परिवारों ने कहा था कि उन्हें घूस देनी पड़ती है, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 28 फीसदी रह गया है। 2005 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जहां एक साल में 11 सरकारी महकमों में 21 हजार करोड़ से ज्यादा का घूस के रूप में लेन-देन हुआ था वहीं 2007 की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश का कोई ऐसा महकमा नहीं है, जहां घूसखोरी न पनप रही हो। वह रिपोर्ट दस हजार ग्रामीण परिवारों के बीच 12 राज्यों- आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश और प. बंगाल में अध्ययन करने के बाद तैयार की गई है।
यदि घूसखोरी में कुछ हद तक कमी आई है तो उसका मुख्य कारण सूचना का अधिकार जैसे कानून हैं। सूचना के अधिकार कानून के डर से अब अधिकारी भी कुछ गलत करने से पहले एक बार जरूर सोच लेते हैं। वैसे यही बात येल विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र के दो शोधार्थी लोनीद वी पैसाखीन और पॉल पिंटो द्वारा दिल्ली की झुग्गी झोंपड़ी में किए एक शोध में सामने आई है। अपने अभियान के तहत इन शोधार्थियों ने उन गरीब परिवारों को चुना, जिनके पास राशन कार्ड नहीं थे मगर वे राशन कार्ड बनवाने की इच्छा रखते थे। इसके बाद इन परिवारों को चार भागों में बांटा गया। पहले ग्रुप ने सामान्य तरीके से आवेदन किया। दूसरे ग्रुप में ऐसे आवेदन पत्र दाखिल किए गए जिसमें एनजीओ के सिफारिशी पत्र साथ में संलग्न थे। तीसरे ग्रुप में आवेदन-पत्र के साथ रिश्वत का सहारा लिया गया था और चौथे ग्रुप में आवेदन पत्र देने के बाद सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई थी कि उनके आवेदन की स्थिति क्या है।
पैसाखिन और पिंटो ने पाया कि पहले ग्रुप के आवेदन के संबंध में किसी प्रकार की जानकारी नहीं मिली। दूसरे ग्रुप के आवेदन पर भी हीलाहवाली देखने को मिली। लेकिन रोचक बात यह है कि जिस ग्रुप ने सूचना के अधिकार द्वारा जानकारी मांगी थी, उसके आवेदन पर उतनी ही तेजी से काम हुआ जितनी कि रिश्वत देने वाले ग्रुप के आवेदन पर। इस शोध के बाद पैसाखिन और पिंटो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सूचना के अधिकार से अभावग्रस्त लोगों को उतना ही लाभ हो रहा है जितना मध्यवर्ग के लोग सुविधा शुल्क देकर अपने काम करवाते हैं। पैसाखिन इस बारे में कहते हैं कि सूचना का अधिकार ने अभावग्रस्त लोगों को काफी ताकत दी है और इतनी ताकत रिश्वत का पैसा भी नहीं दे सकता है।
बहरहाल, विशेष तौर से चार क्षेत्रों सार्वजनिक वितरण प्रणाली, स्वास्थ्य सेवा, जलापूर्ति और विद्यालयों को केंद्र में रखकर अध्ययन किया तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। इन क्षेत्रों में बीते सालों की तुलना में भ्रष्टाचार के मामलों में बढ़ोत्तरी दर्ज हुई। पिछले साल के मुकाबले सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 11.5 फीसदी, अस्पतालों में नौ फीसदी, विद्यालयों में 5.8 फीसदी और जलापूर्ति में 4.5 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसके बावजूद घूस मांगने के बावजूद नहीं देने का आंकड़ा इस प्रकार है- सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 6.2 फीसदी, विद्यालयों में 5.1 फीसदी, अस्पतालों में 4.8 फीसदी और जलापूर्ति में 4.1 फीसदी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कानून सम्मत सेवा लेने के लिए भी परिवारों को पांच रूपए से लेकर आठ सौ रुपए तक घूस देनी पड़ रही है। आवेदन पत्र लेने के लिए रुपये देने पड़ते हैं, वहीं जो सामान्य अर्हता भी नहीं रखते हों, वे भी 800 रुपए की घूस तक देकर बीपीएल कार्ड बनवा सकते हैं। दरअसल सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे क्षेत्रों में घूस की काफी गुंजाइश होती है। जहां जनता का जुड़ाव सीधे होता है, वहां भ्रष्टाचार के मामला ज्यादा आते हैं। इसका समाधान ऑनलाइन सुविधा ही है। जनता को स्मार्ट कार्ड देना चाहिए, जिससे गुणवत्ता और मात्रा का भी ख्याल रखा जा सकता है। आज भी ऐसी मान्यता है कि सरकारी कर्मचारी बिना घूस लिए कोई काम नहीं करते हैं। एक गरीब आदमी अपना राशन कार्ड भी बनवाने जाता है तो उसे बाबुओं को घूस खिलानी ही पड़ती है और गरीब यह सब करता भी है, क्योंकि यदि वह रिश्वत नहीं देगा तो उससे अधिक पैसा उसका दफ्तर के चक्कर काटने में ही खचज़् हो जाएगा।
वैसे 12 राज्यों के सर्वे से यह भी साफ हो गया है कि महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है। सौ दिन काम देने की गारंटी देने वाली इस योजना में भी बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार है। विगत एक साल में घूस के तौर पर इस योजना में 471.8 करोड़ रुपए इस्तेमाल हुए हैं। जहां तक विद्यालय में बच्चों के एडमिशन की बात है तो ग्रामीण परिवारों को यहां भी दस रुपए से आठ सौ रुपए तक घूस देना पड़ती है। ऐसा ही कुछ जलापूर्ति में है। यहां एक ही काम के लिए 15 रुपए से लेकर 950 रुपए तक घूस देना पड़ती है। हालांकि यह देखा गया है कि अगर ऑनलाइन किसी भी विभाग को कर दिया जाता है तो वहां भ्रष्टाचार का औसत गिर जाता है। जैसे सरकार स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय बीमा योजना लागू कर रही है तो इसके लिए स्मार्ट कार्ड बनवा सकते हैं, जिसमें कैशलेस की सुविधा होगी, इसलिए यहां भ्रष्टाचार की संभावना कम रहती है।

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