गोमती को राज्य नदी घोषित करिए

– रूद्र प्रताप दुबे
जल सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार का मूल आधार है। हिंदू दर्शन में तो सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के कमंडल का जल, जगतपालक विष्णु का महासागर में शयन करना और संहारक शिव के जटाजूट से गंगा का प्रवाहित होना स्वयं में जल-दर्शन का उत्कृष्ट उदाहरण है। चूंकि लखनऊ का निवासी हूं इसलिए अगर गोमती से हिंदू माइथोलॉजी का सम्बन्ध जोडू तो ऋग्वेद के अष्टम और दशम मण्डल में गोमती को सदानीरा बताया गया है। सिर्फ यही नहीं शिव महापुराण में भगवान आशुतोष ने नर्मदा और गोमती नदियों को अपनी पुत्रियां स्वीकारा है। गोमती एक ऐसी विशिष्ट नदी है, जो अन्य नदियों की तरह ऊंचाई से नहीं निकली बल्कि ये जमीन के अंदर से निकलती है और जगह-जगह उससे जल लेती हुई ही चलती है। पीलीभीत से थोड़ी दूर बैजनाथ की फुल्हर झील गोमती का उद्गम स्थल है। वहां से लगभग 560 किमी चलकर गोमती लखनऊ पहुंचती है। सई नदी, जो लगभग 560 किमी तक गोमती के समानांतर बहती आती है वो भी जौनपुर से नीचे इसमें मिल जाती है। इस तरह 900 किलोमीटर का सफर तय करती हुई गोमती जौनपुर व बनारस जैसे जिलों से होती हुई गाजीपुर के सैदपुर में गंगा में विलीन हो जाती है। लखनऊ में तो गोमती सूरज के साथ बहती है क्योंकि गोमती के बहाव की दिशा यहां पूरब-पश्चिम है।
आसफुद्दौला जब लखनऊ आए तो गोमती से निकली मछली उनकी गोद में आ गिरी थी। इसे उन्होंने शुभ मानकर राजकीय चिन्ह बनाया, जो आज तक उत्तर प्रदेश शासन का राजकीय चिन्ह है। लेकिन इन सभी तथ्यों के बावजूद आज गोमती मुश्किल में है। गोमती का जलस्तर निरंतर गिरता जा रहा है और जल में प्रदूषण की भी मात्रा बहुत बढ़ चुकी है। दक्षिण भारत में भी नदियां हैं लेकिन वो इतनी प्रदूषित नहीं, जितनी गंगा और गोमती हैं। असल में नदी के किनारे बसी आबादी को बचाने के लिए लखनऊ जैसे नगर में दोनों किनारों पर बांध बनाए जा चुके हैं। जो जल की सतह को ऊंचा करते जा रहे हैं। लखनऊ में गोमती बैराज के पास लगभग हर दिन एक घंटा बैराज खुलता है लेकिन इसके बावजूद पम्पिंग स्टेशन को पर्याप्त मात्रा में कच्चा पानी नहीं मिल पाता। जलापूर्ति के बाद न्यूनतम जलस्तर 346.7 फीट होना चाहिए जो अक्सर यह 344.6 फीट तक ही पहुंच पाता है।
गोमती में मछलियों की संख्या एक तिहाई से भी कम हो गई हैं। कच्छप वाहिन कहलाने वाली गंगा और गोमती में से कछुवे विलुप्त होने के कगार पर हैं। लखनऊ, सुल्तानपुर और जौनपुर जैसे शहरों ने गोमती को जलीय जीवों के लायक ही नहीं छोड़ा है। लेकिन वास्तव में गोमती में प्रदूषण की शुरुआत लखनऊ से 50 किमी पहले सीतापुर जिले के भट्टपुर घाट से ही हो जाती है, जहां सरिया नदी सीतापुर जिले के शक्कर एवं शराब के कारखानों के कचरे को समेटे गोमती से आ कर मिलती है। बेहद मुश्किल तरीके से गोमती लखनऊ तक सरिया के कचरे से मुक्त हो ही पाती है कि करीब 20 लाख आबादी वाले इस शहर का कोई 1,800 टन घरेलू कचरा व 33 करोड़ लीटर गंदा पानी इसमें रोजाना घुलने आ जाता है। इसके अलावा शहर के भीतर स्थित कोई आधा दर्जन बड़े कारखाने भी बगैर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए अपना कचरा गोमती में गिरा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में जहां सन् 2000 में मात्र 22 विकास खंडों को क्रिटिकल घोषित किया गया था, वहीं 2009 आते-आते इनकी संख्या में पांच गुनी वृद्धि दर्ज की गई है। आज उत्तर प्रदेश में कुल 108 ब्लॉक क्रिटिकल श्रेणी में आ चुके हैं। इसका प्रमुख कारण ग्राउंड वाटर रिचार्ज का न होना और बोरवेल से भूजल का निर्बाध दोहन है। गोमती जैसी नदियां जो भूजल पर ही आश्रित रहती हैं, उनके जीवित रहने के लिए भूजल का रीचार्ज ही एकमात्र जरिया है। अगर जलग्रहण क्षेत्र में तालाब, पोखरों और झीलों का निर्माण कराकर बरसाती पानी रोका जाए तो भूगर्भ जलस्रोत साल भर रिचार्ज रहेंगे। इसमें ग्राम प्रधानों और मनरेगा की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। मनरेगा के तहत केवल योजना के चयन में नदी का पहलू भी शामिल करना होगा और इसमें कोई अतिरिक्त खर्च भी नहीं होगा। ।
गोमती के संरक्षण के लिए आज आवश्यकता है कि गोमती नदी के उद्गम व गंगा से मिलन स्थल सहित इसमें मिलने वाली सहायक नदियों के संगम को इको फ्रेजाइल जोन या अति संवेदनशील घोषित किया जाए साथ ही साथ गोमती के आस पास इलाके में सघन वृक्षारोपण किया जाये। गोमती के संरक्षण के लिए आवश्यक है कि गोमती राज्य नदी घोषित हो और चूंकि नदी राज्य का विषय है इसलिए इसके बारे में कोई फैसला लेने में राज्य सरकार को कोई परेशानी भी नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा नदी का क्षेत्र घोषित कर के उसका भूलेखों में स्पष्ट उल्लेख हो। साथ ही साथ नदियों के दोनों ओर 500 मीटर तक पक्के निर्माण को रोकना व वर्तमान निर्माणों को हटवाना सुनिश्चित हो और नदी में कूड़ा डालने से रोकने के लिए 1873 में बने कानून को भी सख्ती से लागू किया जाए। राज्य सरकार को ट्यूबवेल पर भी अब पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना चाहिए और उसके बाद शहरी क्षेत्र में भी नए सबमर्सिबल पम्प लगाने की मनाही कर देनी चाहिए। अंत में अगर हम गंगा और यमुना आरती की ही तरह हर रोज हम ‘गोमती आरती’ की शुरुआत कर सकें तो निश्चित तौर पर हमें एक समय सीमा के भीतर ही प्रभावी परिणाम देखने को मिल सकेंगे।

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