गुंडों की मदद के लिए तैयार है पुलिस

कितने दुर्भाग्य की बात है कि गुंडे की जेब में पैसा तो वह कानून को ठेंगे पर रख सकता है। वह जानता है कि पैसे के दम पर वह कुछ भी करवा सकता है। अगर जिलों में तैनात छोटे-मोटे थानेदार पैसों का यह खेल खेलें तब भी यह समझ आता है। मगर जब पुलिस के आला अफसर भी पैसे के आगे दुम हिलाने लगे तो भला कानून की बात कौन करेगा और आम आदमी को न्याय कौन देगा।

 

SANJAY SHARMA - EDITOR

संजय शर्मा – संपादक

मैंने सुना था और आपने भी सुना होगा कि पुलिस गुंडों को पकडऩे, उन्हें जेल भिजवाने के लिए होती है। मगर जब विभाग का मुखिया ही गुंडों की पैरोकारी में उतर जाये तो आम आदमी भला क्या कर सकता है। मैं सूबे के पुलिस के मुखिया का एक गुंडे के पक्ष में रवैया देखकर हैरान हूं। जिस गुंडे को अदालत ने भगोड़ा घोषित कर रखा है। जिसकी तलाश में उसके घर की कुर्की हो चुकी है। सूबे के डीजीपी उसे पकडऩे की जगह अफसरों को निर्देश दे रहे हैं कि न तो इसकी गिरफ्तारी की जाये और न ही इसकी तलाश में छापेमारी की जाये। जब विभाग का मुखिया ही गुंडों की पैरोकारी करेगा तो न्याय की आशा भला किससे की जा सकती है।
यह इस प्रदेश का दुर्भाग्य है कि यहां पुलिस अफसर गुंडों की खुलेआम पैरवी करते हैंं और तब भी उनका कुछ नहीं बिगड़ता। अफसर जानते हैं कि वह राजनेताओं के चरण छूकर अपनी कुर्सी बचा लेंगे लिहाजा उन्हें आम आदमी की कोई चिंता नहीं है। वह खुलेआम गुंडों की हिमायत कर सकते हैं।
कितने दुर्भाग्य की बात है कि गुंडे की जेब में पैसा है तो वह कानून को ठेंगे पर रख सकता है। वह जानता है कि पैसे के दम पर वह कुछ भी करवा सकता है। अगर जिलों में तैनात छोटे-मोटे थानेदार पैसों का यह खेल खेलें तब भी यह समझ आता है। मगर जब पुलिस के आला अफसर भी पैसे के आगे दुम हिलाने लगें तो भला कानून की बात कौन करेगा और आम आदमी को न्याय कौन देगा। यह सबूत है कि हमारी व्यवस्था में घुन लग गया है और इसके इलाज की सख्त जरूरत है।
मुख्यमंत्री को चाहिए कि वह इस घटना की गम्भीरता को देखें। वह डीजीपी से पूछे कि आखिर उन्होंने एक गुंडे की मदद के लिए ऐसी चिट्ठी क्यों लिखी। यह खत पूरे पुलिस विभाग के माथे पर कलंक है। अगर पुलिस अफसर गुंडों की इस तरह पैरवी करेंगे तो फिर आम आदमी कानून को अपने हाथ में लेने के लिए मजबूर होगा। मैं जानता हूं कि डीजीपी साहब राजनैतिक रूप से बहुत मजबूत हैं। वह मायावती के भी इतने ही दुलारे थे जितने मुलायम सिंह के हो गये हैं। यूपी का दुर्भाग्य हैं कि यहां के डीजीपी नेताओं के पैर छूकर ही अपनी कुर्सी बचाते हैं।
बेशक डीजीपी साहब पैर छू-छूकर अपनी कुर्सी बचाते रहें, मगर खुदा की खातिर गुंडों की इस तरह खुलेआम पैरवी तो न करें। अगर डीजीपी इस तरह का काम करेंगे तो लोगों को वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास याद आ ही जायेगा। जिसका शीर्षक था ‘वर्र्दी वाला गुंडा’… उम्मीद है कि डीजीपी साहब खुद को ऐसा बनने से रोकेंगे।

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