गिरगिट की तरह रंग बदलता पाकिस्तान

नवाज शरीफ कुछ भी दावा करें वे एक अत्यन्त ही कमजोर प्रधानमंत्री हैं और उनकी हिम्मत नहीं है कि वे पाकिस्तान की सेना या उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के विरूद्व कोई कदम उठा सकें। इसलिए इस सत्य को स्वीकार करके अब भारत की सरकार को पाकिस्तान के बारे में अपनी नीति तय करनी होगी।

डॉ गौरीशंकर राजहंस
पिछले दिनों जिस प्रकार पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने यह ऐलान किया कि अब भारत और पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता बंद हो गयी है तथा भारत का कोई जांच दल अब पाकिस्तान नहीं जा सकेगा। भारत का जांच दल पठानकोट के गुनहगारों का पता लगाने के लिए पाकिस्तान नहीं जा सकेगा तो यह जानकर न केवल भारत बल्कि सारी दुनिया के लोग हतप्रभ रह गये।
जब से भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ पाकिस्तान की सरकार और उसकी फौज हमेशा भारत के खिलाफ आग उगलती रही। इसके बावजूद तीन स्थानीय युद्वों में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह पराजित कर दिया। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पद संभालते ही पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रवैया अपनाना शुरू कर दिया। अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित कर और उन्हें विशेष आदर का दर्जा देकर यह जताने का प्रयास किया कि भारत पाकिस्तान के साथ हृदय से दोस्ताना रवैया अपनाना चाहता है और यह उम्मीद करता है कि पाकिस्तान भी ऐसा ही करेगा।
पिछले दिनों अफगानिस्तान से अचानक ही पाकिस्तान जाकर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन पर बधाई दी और उनके एक रिश्तेदार के शादी-विवाह समारोह में भी शामिल हुए। आज तक संसार में ऐसा कहीं नहीं हुआ था कि जो देश दुश्मनों के जैसा बर्ताव करता हो, उसके प्रधानमंत्री के घर एकाएक जाकर सौहाद्र्र पूर्ण रवैया स्थापित करने का प्रयास किया गया हो। परन्तु नरेन्द्र मोदी ने सारे प्रोटोकाल को तोडक़र नवाज शरीफ से भाईचारे का रिश्ता अपनाने का प्रयास किया। परन्तु उसके ठीक बाद पठानकोट की घटना हो गयी। जिसमें पाकिस्तान के आतंकवादियों ने हमला करके अनेक भारतीय जवानों को शहीद कर दिया। सारे भारत में नरेन्द्र मोदी की विपक्षी दलों द्वारा आलोचना होने लगी कि नरेन्द्र मोदी की पाकिस्तान नीति पूरी तरह असफल हो गयी है। उनको ऐसे एकाएक नवाज शरीफ के घर नहीं जाना चाहिये था। पठानकोट की घटना के बाद नरेन्द्र मोदी ने नवाज शरीफ से फोन पर अपना रोष प्रकट किया। इसके जवाब ने नवाज शरीफ ने कहा कि इस घटना की जांच के लिए दोनों मुल्कों की एक साझा टीम बनेगी जो भारत और पाकिस्तान जाकर आतंकवादियों की पहचान करेगी और उन्हें सजा दिलाने का प्रयास किया जाएगा। भारत के विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान की जांच टीम को भारत आने दिया। उसने पठानकोट का दौरा किया। परन्तु घर लौटते ही इस टीम ने पलटी मारी और यह वक्तव्य दे दिया कि पठानकोट मामला तो मात्र भारत का नाटक था। पठानकोट का हमला भारत के फौजियों ने ही किया था और पाकिस्तान को तो बेमतलब बदनाम किया गया। पाकिस्तान का यह रवैया देखकर सभी हैरान रह गये। सबसे ज्यादा हैरानी तो इस बात पर हुई जब पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने साफ कह दिया कि अब भारतीय टीम को पाकिस्तान किसी जांच के लिए नहीं जाने दिया जाएगा। लीपापोती करने के ख्याल से पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि अभी उम्मीद बाकी है और शांतिवार्ता देर-सबेर फिर से शुरु हो सकती है। परन्तु इस तरह की लीपापोती का कोई मतलब नहीं है। संसार में कूटनीति का यह इतिहास रहा है कि किसी देश में स्थित राजदूत या उच्चायुक्त जो कहते हैं वही सही है।
सच यह है कि नवाज शरीफ कुछ भी दावा करें वे एक अत्यन्त ही कमजोर प्रधानमंत्री हैं और उनकी हिम्मत नहीं है कि वे पाकिस्तान की सेना या उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के विरूद्व कोई कदम उठा सकें। इसलिए इस सत्य को स्वीकार करके अब भारत की सरकार को पाकिस्तान के बारे में अपनी नीति तय करनी होगी। पहले भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस में भारतीय राजनयिकों और मीडिया के प्रमुख सदस्यों को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच सौहार्द्रपूर्ण संबंध कायम करने के लिए लाहौर गये थे। परन्तु पाकिस्तान ने उसका बदला कारगिल युद्व से लिया जिसमें अनेक भारतीय जांबाज जवान शहीद हो गये। अंत में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटाई। कहने का अर्थ है कि पाकिस्तान का यह इतिहास रहा है कि उसके कहने और करने में बहुत अंतर है और किसी भी हालत में पाकिस्तान भारत के साथ सौहाद्र्रपूर्ण संबंध स्थापित करने को तैयार नहीं है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान में फौज और आईएसआई का ही वर्चस्व है। ये दोनों यह समझते हैं कि यदि भारत के साथ संबंध सामान्य हो गये तो उनकी चलती समाप्त हो जाएगी। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल में अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को कहा था कि भारत को यह डर है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार कहीं आतंकवादियों के हाथ नहीं लग जाएं। सच कहा जाए तो यह डर निर्मूल नहीं है। यह सोचना कि पाकिस्तान सब कुछ भूलकर फिर से भारत के साथ सौहार्द्रपूण संबंध स्थापित करेगा, एक बहुत बड़ी भूल होगी। भारत ने यह भी आशा की थी कि जब भारतीय टीम पाकिस्तान जाएगी तब वह कुख्यात आतंकवादी मौलाना मसूद से भी जवाब-तलब करेगी। परन्तु पाकिस्तान की सरकार और उसकी सेना को यह पता है कि ऐसा होने पर मसूद कह सकता था कि उसने जो कुछ किया वह पाकिस्तान की सरकार और सेना के कहने पर किया। इसी कारण भारत के जांच दल को पाकिस्तान जाने नहीं दिया गया।

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