गायत्री जैसे मंत्री को साथ रखकर कैसे अच्छी टीम बनाएंगे सीएम साहब

सीएम अब संदेश देना चाहते हैं कि अब वही होगा जो वह चाहेंगे

अखिलेश के इस फैसले से सपा में भूचाल, किसी को नहीं थी उम्मीद
मगर गायत्री प्रजापति के अभी भी मंत्री बने रहने से उठे सवाल
विपक्ष ने कहा- हुजूर फैसला लेते-लेते बहुत देर कर दी

 संजय शर्मा
F1लखनऊ। सरकार बनने के बाद समाजवादी पार्टी का यह अब तक का सबसे बड़ा फैसला था। यादव परिवार में चार दिन पहले हुई बैठक में चर्चा हुई थी कि जनता में अभी भी फील गुड का मैसेज नहीं जा रहा। यह बात तो सभी ने मान ली कि अखिलेश यादव का कोई विरोध नहीं है। सभी कहते हैं कि अखिलेश काम तो अच्छा कर रहे हैं मगर उनके परिवार का ही दबाव उन पर है, जिसके चलते वह सरकार बेहतर ढंग से नहीं चला पा रहे हैं। तब पूरे परिवार ने तय किया कि अब जनता के बीच यह संदेश जाना चाहिए कि सीएम अब सरकार अपने मन से ही चलाएंगे। नेताजी या परिवार के किसी सदस्य का दबाव वह नहीं मान रहे। ऐसा मैसेज जनता तक जाने के बाद यह संदेश जाएगा कि अब सरकार पूरी तरह से अखिलेश यादव के नियंत्रण में है और अगले साल आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे और मेट्रो जैसी योजनाएं साकार रूप ले लेंगी, तब लोगों को लगेगा कि सूबे में अपने मन से विकास की सरकार चलाने वाला एक नौजवान मुख्यमंत्री है, जिसका फायदा समाजवादी पार्टी को मिलेगा। इसी के पहले चरण में आठ मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला किया गया। इनमें अधिकांश मंत्री वह थे जो नेताजी के करीबी माने जाते हैं। जाहिर है कल पूरे प्रदेश में संदेश चला गया कि अब सीएम फॉर्म में आ गए हैं और अब टीम अपने मन से बनायेंगे। मगर सीएम के लाख चाहने पर भी गायत्री प्रजापति जैसे बदनाम नाम मंत्रिमंडल में रह गए। बाकी लोगों ने कहा कि आठ मंत्री तो हट ही रहे हैं एक गायत्री को छोड़ दो। मगर किसी को अंदाजा नहीं था कि यह सारी कवायद सिर्फ गायत्री को मंत्री मंडल में रखने से बेकार हो जाएगी क्योंकि मंत्रिमंडल में अवैध वसूली में सबसे बड़ा नाम गायत्री प्रजापति का ही है और ऐसा हुआ भी। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने गायत्री प्रजापति को लेकर सरकार को घेरने में जरा भी देरी नहीं लगाई।
कुछ दिनों पहले ही नेताजी के करीबी कहे जाने वाले मधुकर जेटली को हटाकर अखिलेश यादव ने संदेश दिया था कि अब परिवर्तन की शुरूआत हो चुकी है। मगर सीएम अपने कड़े रूख से ऐसा फैसला ले सकते हैं इसका किसी को अंदाजा नहीं था।
हटाए गए मंत्रियों को अंदाजा भी नहीं था कि मुख्यमंत्री पलक झपकते ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देंगे। दरअसल लंबे समय से यह मंत्री अपने व्यवहार से संदेश दे रहे थे कि वह नेताजी के आदमी हैं। ऐसा करने से एक संदेश जा रहा था कि मंत्रिमंडल के कुछ मंत्री अपनी मर्जी के मालिक हैं और वह सीएम के मुकाबले नेताजी की ज्यादा सुनते हैं।
सपा मुखिया भी यह नहीं चाहते कि बहुत करीब आ चुके चुनाव से पहले अखिलेश यादव के कमजोर होने का कोई संदेश जनता के बीच जाए। एक रणनीति के तहत उन्होंने सार्वजनिक रूप से सीएम को कहना शुरू किया कि मंत्रियों को सुधारो वरना कई मंत्री चुनाव हार जाएंगे। हर बार नेताजी के इस बयान की अलग-अलग तरीके से चर्चा की गई और आखिर में सीएम से कहा गया कि अब वह बड़ा संदेश दे दें, मगर गायत्री प्रजापति को मंत्रिमंडल में बनाए रखने की मजबूरी अभी भी सीएम के सपनों को पूरा नहीं कर पा रही है। अवैध खनन को लेकर गायत्री पर जमकर आरोप लगते रहे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी का कहना है कि गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाला व्यक्ति आखिर कैसे हजारों करोड़ का मालिक बन गया। यह शोध का विषय है। जाहिर है अगर गायत्री
जैसे लोग मंत्रिमंडल में रहेंगे तो सीएम जनता को अच्छा संदेश नहीं दे पाऐंगे।

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