गांधी का रणनीतिक विज्ञान

कनक तिवारी 

गांधी एक मानव आयाम भी हैं। वैचारिकता के झुरमुटों में उनकी रोशनी अब भी फैलती रहती है। आशीष नंदी, भीखूभाई पारिख, राघवन, निर्मल वर्मा और सुधीरचंद्र जैसे कई हिन्दुस्तानी गवेषणाकारों ने गांधी की प्रसरणशीलता के आत्मबिम्बों का मानवीय सरोकारों के साथ जांच की। इस अर्थ में गांधी के मरने का सवाल ही नहीं है। उनकी मृत्यु के बाद जॉर्ज ऑरवेल और बर्टेण्ड रसेल जैसे चिंतकों ने उन पर गंभीर लेखन किया है। पश्चिम के शोध अध्यापकों ने गांधी को समझने में जीवन का बड़ा हिस्सा व्यतीत किया है।
फिर भी अपनी स्थापनाओं में दृढ़ रहने के बदले जिज्ञासु और वैकल्पिक संभावनाएं लिए तर्क और शोध करते रहते हैं। मसलन अमेरिका के सुसेन और लॉयड डोल्फ दंपत्ति ने एक दशक से ज्यादा वक्त गांधी के राजनीतिक दर्शन और उपलब्धियों को समझने में व्यतीत किया। उनकी महत्वपूर्ण किताब का शीर्षक है मॉडर्निटी ऑफ ट्रेडिशन अर्थात परंपरा की आधुनिकता। वे मकबूल फि दा हुसैन की कूची की तरह गांधी का कायिक व्यक्तित्व भी खड़ा कर देते हैं।
भीखूभाई पारिख के अनुसार गांधी ने भारत के अतीत की आध्यात्मिक समझ को धर्म के वितंडावाद और कर्मकांड से अलग कर पश्चिम की आधुनिक भाषा अंग्रेजी और बाइबिल की शिक्षाओं के अक्स में सानकर नई रसोई का उत्पाद बनाकर परोसा। उसे अंग्रेज ने अपना सांस्कृतिक अवदान समझकर चखा। वस्तुत: भारतीयता का संदेश ही उसके सिर चढक़र बोलता रहा। सपाट भाषा में कहें तो बाइबिल अपनी जुबान में बोलती लगी। लेकिन हुआ वह गीता का संदेश वाचन ही।
आलोचना की जा सकती है कि गांधी ने भीड़ का इस्तेमाल अपनी राजनीति को सर्मथ बनाने के लिए किया। यह सच नहीं है। उनके सामने बड़ी चुनौती थी कि सदियों से दब्बू, पस्तहिम्मत और निर्वीर्य रहे भारतीयों को नए किस्म की सियासी लड़ाई के लिए कैसे साहसी बनाया जाए। गांधी ने पेंच डाला कि साहस या निडरता अहिंसा के लिए जरूरी है। डरा हुआ व्यक्ति हिंसा की ओर खिंच जाता है जैसे लौहकण चुंबक की ओर। हिंसा के खिलाफ अहिंसा को खड़ा करने में उन्होंने कायरता को नपुंसकता माना। इस अर्थ में गांधी ने महाभारत के संदेश को संशोधित और अग्रसर किया।
उनकी नायाब थ्योरी अशिक्षितों, अकिंचनों और मुफ लिसों की समझ की ताबीज बनी। यही उन्हें संसार के इतिहास में मौलिक नायक बनाता है। महारानी विक्टोरिया की प्रशंसा करते गांधी के कुछ उल्लेख खटकते हैं। 1909 में लिखी हिन्द स्वराज में वे अपनी संभावित परिकल्पनाओं को सूत्रबद्ध कर भारत के भविष्य को तराशते हैं। गांधी की राजनीति के अन्यतम पाश्चात्य विचारक अनदेखे पहलुओं की तलाश में संकल्पित होते हैं। इनसे उनके करिश्माई व्यक्तित्व की एक एक परत को प्याज के छिलकों की तरह उतारा जा सके। यह देखने के लिए कि कितना अबूझा गांधी बचता है।
राजनीतिक मनोविज्ञान की नई और मौजू विधा के जरिए औपनिवेशिक शासन की बखिया उधेडऩे वाले जननायक की राजनीति को समझने में मदद मिलती है। सत्य और अहिंसा के आचरण के लिए गांधी ने जनता को अभय का पाठ पढ़ाया। ऐसा किसी राजनेता ने इतिहास निर्देशक की तरह नहीं किया था। महाभारत का अभय भारतीयों की धमनियों में रक्त का उबाल तो नहीं बना, लेकिन उनमें अंग्रेजी खौफ के कारण आता ठंडा पसीना आना बंद हो गया।
अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति भी अपने अक्स, अस्तित्व और स्वाभिमान के लिए सब कुछ बरबाद करने को तैयार होकर आगे बढ़ता रहा। दरिद्रता से आगे बढक़र हर तरह की संपत्तिरहितता के मुकाम पर खड़ा भारतीय अंग्रेजी सल्तनत को गांधी के जुमले में चुनौती दे रहा था। गांधी ने जोखिम उठाया। उन्हें हठवादी अध्यवसायिता और अकूत संवाद शक्ति पर विश्वास था। रगों में फैलता जा रहा अंग्रेजियत का जहर स्वदेशी वृत्तियों के सहकार से दूर करना उनका लक्ष्य था। साम्राज्य केवल खोल था। राजनीति दिखावा थी। पहले मनुष्य और फि र मनुष्यकुल का सदस्य होकर जीने की कला में भारतीयों के लिए स्वराज पाना कठिन रहगुजर का अनुभव था। चरैवेति के सिद्धांत का आश्वासन पाथेय पर जाकर खत्म होता है।
माइकेल मधुसूदन दत्त, बंकिमचंद्र चटर्जी, दयानन्द सरस्वती, विवेकानन्द, सैयद अहमद खान, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक आदि नवजागरण के सपूतों से प्रेरित गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के अपने अनुभव संसार की बिसात को भारतीय संदर्भों में बिछाने की कोशिश की। अंग्रेज भारतीयों को लगभग अश्लील भाषा में गरियाना छोड़ नहीं रहा था। बंगाल के लोगों के प्रति तो उसकी घृणा कम नहीं थी। बंगाल से ही अंग्रेजों ने भारतीयता के मानक घटकों को तहस नहस करना शुरू किया था।
मनोविज्ञान की लड़ाई में गांधी ने अंग्रेजों के क्रोधी मनोवैज्ञानिक हथियारों के मुकाबले हठवादी भारतीय हथियारों पर भरोसा किया। क्रोध और हठ की लड़ाई में राजसी क्रोध को सात्विक हठ ने चित किया। अंग्रेज की ताकत भौतिकवादी होने के साथ साथ सांसारिक तौर पर दिखा था। शतरंज के सधे खिलाड़ी की तरह गांधी ने भारतीयों को सिखाया कि कछुए की तरह अपने नैतिक आक्रमणकारी हथियारों को विनम्रता की देहयष्टि में छुपाकर रखें। भारतीयों ने ऐसा ही किया।
पूरे प्रतिरोध की सामाजिकता को गांधी ने सत्याग्रह का नाम दिया। ऐसी भीड़ को बंदूक की गोलियों से शांत करना अंग्रेजों के लिए संभव नहीं रहा। गांधी को कैसे मालूम था कि मनुष्य में अपरिमित सहनशीलता होती है। उन्होंने गृहिणियों को परिवारों के लिए अकल्पनीय सहनशीलता के प्रतीक के रूप में देखा। आजादी के युद्ध में मदरें को झोंकने के लिए गांधी ने नारी की सहनशीलता के गुण को पौरुषमयता में परिवर्तित किया। वह पौरुष के लिए समूहगत आश्चर्य तथा नया और अपरीक्षित अनुभव था। सत्ताधीश के अत्याचार से प्रताड़ित लोगों ने भी प्रतिकार नहीं किया। जुल्म सात्विक जिद के साथ सहा। प्रतिकार जैसा हथियार भी सहनशीलता के सामने बौना लगने लगा। यह आश्चर्य, संयोग या अन्वेषण है कि गांधी ने सारे मनोवैज्ञानिक और आत्मिक हथियार समकालीन किताबें पढक़र नहीं बल्कि अमूमन भारतीयों के प्राचीन अनुभवों की कहानियों से संकेतित होकर निकाले थे।

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