खेती किसानी की चिंता

sanjay sharma editor5हाल के दिनों में एक सर्वेक्षण से खुलासा हुआ है कि 98.2 प्रतिशत किसानों के बच्चों को खेती किसानी में कोई रुचि नहीं है। चूंकि भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित रही है। इसलिए सरकार के लिए निश्चित ही यह चिन्ता का विषय है। आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2001 में देश में 12 करोड़ 73 लाख किसान थे। यह संख्या 2011 में घटकर 11 करोड़ 87 लाख रह गई।
विकास की अंधी दौड़ में सबसे अधिक नुकसान किसका हुआ है, तो वह है खेती। किसान अपनी उपज के मूल्य से खेती की लागत तक नहीं निकाल पा रहा है। इस वजह से भारत में किसानों का खेती से मोहभंग होता जा रहा है। यह किसी भी कृषि प्रधान देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
केन्द्रीय कृषि मंत्रालय की स्थाई समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत में किसानों का खेती से मोहभंग हो रहा है। इस बात को गंभीरता से लेकर मंत्रालय ने कृषि कार्य में लगे लोगों को जागरूक करने और उन्नति कृषि के लिए प्रोत्साहित करने की योजना बनाने का काम शुरू कर दिया है लेकिन किसानों में योजना से मिलने वाले लाभ और बेहतर भविष्य का सपना साकार होने को लेकर संदेह की स्थिति बनी हुई है। हाल के दिनों में एक सर्वेक्षण से खुलासा हुआ है कि 98.2 प्रतिशत किसानों के बच्चों को खेती किसानी में कोई रुचि नहीं है। चूंकि भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित रही है। इसलिए सरकार के लिए निश्चित ही यह चिन्ता का विषय है। आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2001 में देश में 12 करोड़ 73 लाख किसान थे। यह संख्या 2011 में घटकर 11 करोड़ 87 लाख रह गई। यह आंकड़े खेती-किसानी से मोहभंग होने वालों की स्थिति को दर्शाते हैं। यदि देखा जाए तो किसान हर प्रदेश में खेती-किसानी का काम छोड़ रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों से महाराष्ट्र में सबसे अधिक सात लाख 56 हजार किसानों ने खेती छोड़ी है। राजस्थान में चार लाख 78 हजार और हिमांचल में एक लाख से अधिक किसान खेती छोड़ चुके हैं। इसके अलावा उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और मेघालय में भी किसानों की संख्या लगातार कम हुई है। इतना ही नहीं पिछले सत्रह वर्षों में देश में करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अधिकतर आत्महत्याओं का कारण कर्ज है, जिसे चुकाने में किसान असमर्थ हैं। इसी वजह से 2007 से 2012 के बीच करीब 3.2 करोड़ किसान अपनी जमीन और घर-बार बेचकर शहरों में आ गये हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हर रोज ढाई हजार किसान खेती छोड़ रहे हैं। इसी प्रकार करीब पचास हजार लोग गांवों से शहर की तरफ कूच कर चुके हैं। इसका मतलब यह है कि किसानों को आर्थिक विकास का लाभ नहीं मिल पा रहा है। अगर आर्थिक विकास का लाभ गांवों तक पहुंचता तो किसान अपना घर-बार छोड़ कर शहरों की तरफ पलायन नहीं करते।
इसलिए केन्द्र सरकार के साथ ही प्रदेश सरकारों को किसान हितों को ध्यान में रखकर आर्थिक विकास की नीति बनाना चाहिए। सरकारी योजनाओं और उन्नत तकनीक का किसानों को अपेक्षित लाभ मिल पा रहा है या नहीं, इस बात की भी मानीटरिंग होनी चाहिए। यदि ऐसा संभव हुआ तो हम अपनी सभ्यता को संजोने और किसानों को आत्महत्या करने से रोकने में सफल हो सकेंगे।

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