खून का सौदा

राजधानी लखनऊ की एक पैथालॉजी में खून की कालाबाजारी करने वाले पकड़े गये। ये लोग मासूम बच्चों का खून निकाल कर दो चार सौ पकड़ा देते हैं और खुद वही खून हजारों में बेचते हैं। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं है कि ये मासूम बच्चे खून देने के योग्य हैं या नहीं।

sanjay sharma editor5खिर हमारे भीतर कानून-व्यवस्था का डर क्यों नहीं है? हमारी व्यवस्था में कालाबाजारी और भ्रष्टïाचार की जड़ें इतनी गहराई तक फैल चुकी हैं कि उस पर किसी का नियंत्रण नहीं बचा है। किसी को गलत काम करने में डर नहीं लगता। अब तो कालाबाजारियों का हौसला इतना बुलंद हो गया है कि बच्चों की जान से भी खेलने लगे हैं। राजधानी लखनऊ की एक पैथालॉजी में खून की कालाबाजारी करने वाले पकड़े गये। ये लोग मासूम बच्चों का खून निकाल कर दो चार सौ पकड़ा देते हैं और खुद वही खून हजारों में बेचते हैं। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं है कि ये मासूम बच्चे खून देने के योग्य हैं या नहीं। उनके निशाने पर वो सभी जरूरतमंद हैं जिन्हें पैसे की जरूरत है। यह काला धंधा राजधानी में दिन-प्रतिदिन फैलता जा रहा है। यहां खून की कालाबाजारी कोई नई घटना नहीं है। जरूरतमंदों से खून की मनमानी कीमत वसूली जाती है।
अमूमन 600-700 रुपये में मिलने वाले एक यूनिट खून की कीमत निजी पैशलॉजी वाले 3000 हजार तक वसूलते हैं। उनकी मनमानी से सभी वाकिफ हैं पर कोई कार्रवाई न होने से मनमानी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ब्लड बैंक किसी का खून नहीं ले सकती। खून लेने से पहले कई जांचें की जाती हैं। एक उम्र निर्धारित है, जिसके पहले या बाद में खून नहीं दिया जा सकता। लेकिन अपराधियों को पैसे के अलावा कुछ नहीं दिखता। उन्हें लोगों की जिंदगी से कोई सरोकार नहीं। जिस तरीके से यह कारोबार चल रहा है उससे तो मरीजों की जान का भी जोखिम है।
यह मामला एक निजी पैथालॉजी तक सीमित नहीं है। कई पैथालॉजी इस धंधे में लिप्त हैं। निजी पैथालॉजी में ऐसे धंधों के फलने-फूलने में चिकित्सकों का भी अहम योगदान है। वर्तमान में चिकित्सक मरीज को जांच के लिये निजी पैथालॉजी भेजते हैं। खून की जरूरत है तो चिकित्सक मरीजों को बकायदा पैथालॉजी का नाम बताकर भेजते हैं। मरीज बेचारे डर की वजह से वहीं जाते हैं जहां चिकित्सक भेजते हैं। सारा मामला कमीशनखोरी का है। इसके अलावा हमारे शासन-प्रशासन की लचर व्यवस्था की वजह से भी यह धंधा फल-फूल रहा है।
निजी पैथालॉजी पर कार्रवाई की जाती है लेकिन कुछ दिनों बाद वही पैथालॉजी दोबारा खुल जाती है और धड़ल्ले से फिर वही कृत्य चलने लगते हैं। वर्तमान में हम इतने संवेदनहीन हो गये हैं कि हमें किसी की जिंदगी से भी कोई सरोकार नहीं रह गया है। हमें पता है कि गलत हो रहा है फिर भी हम मौन साधे देख रहे हैं। यदि समय रहते इन पर अंकुश नहीं लगाया गया तो आज कोई और इसका शिकार है तो कल हम खुद होंंगे।

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