खुद को बेकसूर सिद्ध करने का हर मौका मिला याकूब को

नीरज कुमार दुबे
मुंबई में वर्ष 1993 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के लिए दोषी ठहराये गये याकूब मेमन की फांसी पर हो रही राजनीति बेहद शर्मनाक है। जब हम यह कहते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म या जाति नहीं होती तो उस पर राजनीति भी नहीं होनी चाहिए। आतंकवाद मामलों के दोषी पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी ही चाहिए क्योंकि निरपराध लोगों की नृशंस हत्या करने वालों से नरमी बरती गयी या उनके समर्थन में उतरा गया तो इससे सही संदेश नहीं जाएगा। हम आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता का आह्वान भर करते हैं जबकि इस मुद्दे पर हमारे देश में ही विचार बंटे हुए हैं।

याकूब मेमन को दी गयी सजा की आलोचना करना सही नहीं दिखता क्योंकि उसे अपने बचाव में तर्क पेश करने के जितने मौके बनते थे, उससे ज्यादा दे दिये गये। अभूतपूर्व रूप से आधी रात को उच्चतम न्यायालय ने उसकी अर्जी पर सुनवाई की साथ ही राष्ट्रपति ने दूसरी बार उसकी दया याचिका पर गौर फरमाया। फांसी के बाद उसके घरवाले भी प्रशासन की बात मानते हुए अंतिम संस्कार से जुड़े सभी काम शांतिपूर्वक कर रहे थे। यही नहीं जो लोग मुंबई बम धमाकों में मारे गये थे, उनके परिजनों ने भी शांतिपूर्वक सब कुछ होते देखा लेकिन एकाएक कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इस मुद्दे पर राजनीति की शुरुआत कर दी।

दिग्जिवजय सिंह ने ट्वीट किया- ‘‘याकूब मेमन को फांसी दी गयी। सरकार और न्यायपालिका ने आतंक के एक आरोपी को सजा देने में अनुकरणीय तत्परता और प्रतिबद्धता दिखाई।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुझे उम्मीद है कि इसी तरह की प्रतिबद्धता सरकार और न्यायपालिका जाति और धर्म का ध्यान रखे बिना सभी मामलों में दिखाएगी।’’ सिंह यहीं नहीं रुके, उन्होंने आगे लिखा- ‘‘आतंकवाद के अन्य आरोपियों पर जिस तरह मामला चल रहा है उसको लेकर मेरे मन में संदेह है। आइये देखते हैं क्या होता है। सरकार और न्यायपालिका की साख दांव पर है।’’
इसमें कोई दो राय नहीं कि दिग्विजय ने अपनी टिप्पणी से उस उच्चतम न्यायालय की साख पर सवाल उठाया है जिसके दो दर्जन से ज्यादा न्यायाधीशों ने याकूब मेमन मामले पर गौर फरमाया और सभी ने मौत की सजा के फैसले को बरकरार रखा। साथ ही दिग्विजय ने न्यायालय की साख दांव पर कहकर पड़ोसी देश के उन लोगों को हमारी न्यायपालिका पर सवाल उठाने का मौका दे दिया है जो ऐसे मौके ढूंढते रहते हैं। दिग्विजय सिंह पूर्व में भी आतंकवाद से जुड़े विषयों पर विवादित टिप्पणी करते रहे हैं। एक बार तो उन्होंने अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामाजी’ कहकर संबोधित किया था। बात उन्हीं तक सीमित रहती तो भी ठीक रहता लेकिन कांग्रेस के एक और नेता शशि थरूर जोकि विवाद पैदा करते रहने के लिए मशहूर हैं, ने इसे ‘स्टेट स्पॉन्सर्ड किलिंग’ करार दे दिया। उन्होंने यह कहने से पहले यह नहीं सोचा कि सजा सरकार ने नहीं बल्कि न्यायालय ने दी है।

जहां याकूब को फांसी देने के विरोध में बयान आ रहे थे तो फांसी का समर्थन करने को लेकर भी विवादित बयान आने ही थे। विहिप नेता प्रवीण तोगडिया ने कह दिया कि जो लोग फांसी का विरोध कर रहे हैं वह पाकिस्तान चले जाएं। भाजपा नेता रहे और वर्तमान में त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत राय ने कह दिया कि खुफिया एजेंसियों को उन लोगों पर नजर रखनी चाहिए जो लोग मेमन के शव को सुपुर्द ए खाक करते वक्त वहां आए क्योंकि उन लोगों में कई संभावित आतंकवादी हो सकते हैं। भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा याकूब मेमन को फांसी की सजा देने के विरोध में उतरे तो वरूण गांधी ने सवाल उठाया कि क्या अल्पसंख्यक वर्ग से जुड़े लोगों को ज्यादा फांसी दी गयी?
गृहमंत्री राजनाथ सिंह लोकसभा में गुरदासपुर हमले पर बयान देते हुए संप्रग सरकार की ओर से गढ़ी गयी संज्ञा ‘हिन्दू आतंकवाद’ का जिक्र कर एक नया विवाद छेड़ बैठे। उन्होंने कहा कि तत्कालीन गृहमंत्री के इस शब्द की आतंकवादी हाफिज सईद ने सराहना की थी। राजनाथ सिंह के बयान का प्रतिवाद करते हुए कांग्रेस की ओर से कहा गया कि आतंकवाद के मुद्दे पर हमें वह दल सीख देने की कोशिश ना करे जिसके नेता आतंकवादी को जहाज में लेकर कंधार गये थे। साफ है कि आतंकवाद मुद्दे पर राजनीति करते हुए एक दूसरे पर कीचड़ उछालना जारी रहेगा।

बहरहाल, आतंकवाद मुद्दे पर राजनेताओं की विवादित टिप्पणियां उन लोगों का ‘अपमान’ है, जो आतंकवाद से छुटकारा पाना चाहते हैं। इस मुद्दे पर किसी भी तरह की राजनीति खेदजनक है। न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाने की कोशिश करना ठीक नहीं है। जो लोग आज सवाल उठा रहे हैं उन्हें तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब मामलों की सुनवाई हो रही होती है। ऐसे समय पर किसी मुद्दे पर बहस नहीं करनी चाहिए, जब कि उसका निपटान हो चुका है। याकूब मामले में तो सरकार ने थोड़ी उदारता भी दिखाई क्योंकि अफजल गुरु की तरह उसका शव जेल परिसर में ही नहीं दफनाकर उसे उसके परिवार वालों को सौंप दिया गया। आतंकवाद मुद्दे पर राजनीति की जगह बहस इस मुद्दे पर होनी चाहिए कि फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए या नहीं, इस पर नहीं कि इसको फांसी होनी चाहिए और उसको नहीं।

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