खाना बहुत खा लिया नेताजी: अब काम करिये!

चुनाव पास आते-आते दलितों के वोट पाने के लिए नाटक होने लगते हैं। हर राजनीति के माहिर खिलाड़ी चुनाव से पहले अपना हर पैतरा अजमाने की कोशिश करते हैं। उनको लगता है दलितों को ऐसी लुभावनी बातों के जरिए बहलाया जा सकता है। दलित उनकी बातों में आ जाएंगे।

sanjay sharma editor5यूपी के किसी जिले से भी खबर आई है कि एक मरी हुई गाय के शरीर से खाल उतारने के बाद गौ हत्या के शक में दलितों को पीटा गया। गुजरात से भी खबरें आ रही हैं कि वहां दलितों ने मना कर दिया है कि वह किसी भी जानवर के शरीर की खाल नहीं उतारेंगे। इसके लिए जिस जाति के लोगों को रखना हो रख लिया जाए। मुझे लगता है शुभ संकेत है दलितों की यह बगावत। अगर दलित इस तरह की बगावत नहीं करेंगे तो समाज के चंद लोग उनका इसी तरह उत्पीडन करते रहेंगे। इस व्यवस्था को बदलना होगा।
चुनाव पास आते-आते दलितों के वोट पाने के लिए नाटक होने लगते हैं। हर राजनीति के माहिर खिलाड़ी चुनाव से पहले अपना हर पैतरा अजमाने की कोशिश करते हैं। उनको लगता है दलितों को ऐसी लुभावनी बातों के जरिए बहलाया जा सकता है। दलित उनकी बातों में आ जाएंगे। और फिर उनका इस्तेमाल वह अपने वोट बैंक के लिए कर लेंगे। होता भी यही आया है और राजनेताओं को लगता है कि आगे भी यही होता रहेगा।
विगत कुछ वर्षों से राजनेताओं ने नया चलन शुरू किया है। वह दलितों के घर खाना खाने जाने लगे हैं। दलितों के घर खाने से पहले मीडिया फोटोग्राफर और पत्रकारों को बताया जाता है। इससे फायदा यह होता है कि अगले दिन टीवी चैनलों और अखबारों में उनकी फोटो छपी नजर आती है। अपनी तिकड़मों से वह दलितों को यह संदेश देने में कामयाब भी हो जाते हैं कि वह दलितों के सबसे बड़े हितैषी हैं। कोई एक पार्टी ऐसा नहीं कर रही है। सभी पार्टियों में इस बात की होड़ लगी रहती है कि कौन इस तरह के संदेश ज्यादा सफाई के साथ दे सकता है। यह चलन बढ़ता ही जा रहा है। राजनेता अपने इस हुनर को लगातार धार देने की कोशिशों में जुटे हैं। यह हुनर नए-नए तरीके से उनके काम आता है।
दलितों की जागृति अब इन नेताओं के लिए खतरे की घंटी है। दलितों को अब अच्छी तरह से समझ में आने लगा है कि कौन नेता उनके कितने हित संभाल सकता है। अब समय आने लगा है कि दलित भी अपनी हैसियत पहचानने की कोशिश करने लगे हैं। दलितों में यह चेतना का विस्तार एक नई परंपरा को जन्म देने जैसा है दलितों को अब राजनेताओं से मांग करनी चाहिए कि सिर्फ खाना खाने से काम नहीं चलने वाला है उनके जीवन में उनके साथ की भागीदारी भी चाहिए। इन नेताओं से कहना चाहिए कि वह उन कामों में भी साथ दें जो दलित करते हैं। अगर दलितों से अपेक्षा की जाती है क वह शौचालय साफ करे तो राजनेताओं को भी शौचालय साफ करने में कुछ दिन बिताना चाहिए। पशुओं की खाल उतारने का काम दलित ही क्यों करें दलितों के घर फोटो खिंचवाने वाले नेता भी कुछ दिन यह काम करके देखें। अच्छा हो अब दलित अपने घर खाना खाने आने वाले नेताओं से यहीं मांग रखें… देखिए नेता वैसे ही गायब होंगे जैसे गधे के सिर पर सींग।

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