खाड़ी की चकाचौंध का सच

खाड़ी के देशों में काम करने गए हमारे मेहनतकशों को खराब मौसम, पोषणयुक्त आहार की कमी, रहने के लिए पर्याप्त जगह के अभाव वगैरह के चलते बहुत कठिनाइयों में काम करना पड़ता है। इनके पासपोर्ट कई बार कंपनियां अपने पास रख लेती हैं। जिसके चलते इन्हें बंधुआ मजदूर के रूप में ही काम करना होता है। बेहतर होगा मोदी सरकार उन देशों की सरकारों से बात करे जिधर हमारे मजदूर काम कर रहे हैं।

 विवेक शुक्ला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई की यात्रा से क्या वहां पर काम करने वाले करीब 25 लाख भारतीय कुशल-अकुशल श्रमिकों की जिंदगी में सुधार आएगा? दरअसल, खाड़ी के देशों में बेहद खराब हालातों में भारतीय श्रमिक काम कर रहे हैं। आप दुबई या अबूधाबी एयरपोर्ट पर जैसे ही उतरते हैं तो आपको समझ आ जाता है कि इधर कितनी अधिक तादाद में ये हैं। ये चप्पे-चप्पे पर काम कर रहे होते हैं। ये इस बात से त्रस्त हैं कि उन्हें खाड़ी के देशों में लाया तो गया पर वहां पर न्यूनतम वेतन और दूसरी सुविधाएं भी नहीं मिलीं। मोदी ने अबूधाबी और दुबई के दौरे के दौरान बहुत से भारतीय श्रमिकों से बात की होगी। उन्हें पता चल गया होगा खाड़ी की चकाचौंध दुनिया के पीछे का सच।

खाड़ी के देशों में काम करने गए हमारे मेहनतकशों को खराब मौसम, पोषणयुक्त आहार की कमी, रहने के लिए पर्याप्त जगह के अभाव वगैरह के चलते बहुत कठिनाइयों में काम करना पड़ता है। इनके पासपोर्ट कई बार कंपनियां अपने पास रख लेती हैं। जिसके चलते इन्हें बंधुआ मजदूर के रूप में ही काम करना होता है। बेहतर होगा मोदी सरकार उन देशों की सरकारों से बात करे जिधर हमारे मजदूर काम कर रहे हैं। सरकार को इनके हितों का ख्याल करना होगा।

सबसे गौरतलब तथ्य ये है कि विदेशों में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों और श्रमिकों से मिलने वाले धन के मामले में भारत शीर्ष पर बना हुआ है और इसे 2014 में अपने वैश्विक प्रवासी कार्यबल से 70 अरब डॉलर प्राप्त हुए हैं। चीन को 64 अरब डॉलर, फिलीपींस को 28 अरब डॉलर की राशि मिली। नई सोच के साथ इस धन का प्रयोग वित्तीय विकास और ढांचागत परियोजनाओं में किया जा सकता है। यानी भारत को यह श्रम शक्ति प्रतिवर्ष बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा आय भी भेज रही है और यह लगातार बढ़ रहा है। इस योगादन को कम करके नहीं आंका जा सकता है।

यूपीए सरकार के दौर में विदेश राज्य मंत्री ई अहमद से खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों के शोषण के संबंध में संसद में एक बार सवाल पूछा गया। पूर्व मंत्री जी का जरा जवाब सुन लीजिए। इसे पढक़र कोई भी समझ सकता है कि पूर्व सरकार खाड़ी में काम करने वाले श्रमिकों के हितों को लेकर कितनी चिंतित थी। मंत्री जी ने बताया, अनुमान है कि लगभग 6 मिलियन भारतीय खाड़ी क्षेत्र में रहते हैं एवं वहां पर कार्य करते हैं। भारत सरकार को खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों द्वारा सामना की जा रही समस्याओं से संबंधित शिकायतें प्राप्त होती हैं। भारत सरकार ने खाड़ी देशों में अपने मिशनों के माध्यम से भारतीय कामगारों के अधिकारों की रक्षा करने एवं कामगारों के शोषण संबंधी समस्याओं का निराकरण करने हेतु कई उपाय एवं पहल की हैं। जब भी शिकायतें प्राप्त होती हैं, तो स्थानीय प्राधिकारियों के साथ इस मुद्दे को उठाया जाता है। कुल मिलाकर इतने सरकारी उत्तर को पढक़र आपको समझ आ जाएगा कि सरकार की तरफ से क्या पहल होती रही है खाड़ी में बसे भारतीयों के लिए।

अब बात मलेशिया की कर लीजिए। मलेशिया में करीब 25 लाख भारतीय बसे हुए हैं। मलेशिया में भारतवंशी भी खासी तादाद में हैं। इनके अलावा भारत से गए र्शमिक भी कम नहीं हैं। इन देशों में हालत खराब है। वहां पर उनके साथ दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में व्यवहार किया जा रहा है। मलेशिया के एक प्रमुख भारतीय मूल के नेता सेम वेल्लू ने एक बार इस लेखक को बताया था कि उनके देश में चीनी मूल के लोगों के साथ सरकार किसी तरह की भेदभावपूर्ण नीति अपनाती है, तो चीन सरकार तुरंत सक्रिय हो जाती है। चीन कड़े शब्दों में मलेशिया सरकार को धमका देता है।

कतर श्रम कानूनों की घोर अनदेखी कर रहा है, जिसका फायदा निर्माण कार्य में लगी कंपनियां उठा रही हैं और वे भारत से आए मजदूरों का शोषण कर रही हैं। वहां बहुत तंग हालात में गुजर बसर कर रहे मजदूर बेबस हो जाते हैं क्योंकि उनके पासपोर्ट भी कंपनियां ही रख लेती हैं और उन्हें पहचान पत्र भी नहीं दिया जाता है। विदेशी कामगारों में सबसे ज्यादा संख्या कतर में भारतीयों की है और ये छह लाख से ज्यादा हैं। क्या अपने नागरिकों के साथ देश से बाहर हो रहे इस तरह के व्यवहार को हमें सहन करना चाहिए? क्या बयानबाजी से ही बात बन जाएगी? क्या हमारी इस तरह की कमजोर विदेश नीति के चलते हमें अपने को यह कहने का अधिकार बचता है कि हम उभरती हुई विश्व महाशक्ति है?

परदेसों में रहने वाले भारतीयों के साथ अनेक देशों में दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है। पर मजाल है कि भारत सरकार का कोई बड़ा नुमाइंदा उन्हें कार्रवाई का भरोसा दे। मंत्री से लेकर अफसर सात समंदर पार बसे भारतीयों से अपने देश में और निवेश करने की ही मांग करते रहते हैं। निस्संदेह हम अपने नागरिकों के हकों के लिए किसी देश पर आक्रमण नहीं कर सकते, पर उनके हक में खड़े तो हो ही सकते हैं। आखिर भारत की ताकत तो भारतीयों से ही बनती है। मोदी की संयुक्त अरब अमीरत की यात्रा शुरुआत होनी चाहिए सात समंदर पार काम करने वाले भारतीयों की हालत सुधारने की दिशा में। इस तरफ सघन कोशिशें जारी रहनी चाहिए।

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