खटोले पर उडऩे वाले नेता खाट पर बैठने लगे

 बाल मुकुन्द ओझा
खाट ग्रामीण जनजीवन की सांस्कृतिक पहचान है। यह ग्रामीणों का बिछौना और मेहमानों की आवभगत का प्रतीक है। महानगरों में लगभग लुप्प्त हो चुकी खाट की एक बार फिर गरमागरम चर्चा में है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी की खाट महायात्रा से यह सियासत की गर्माहट का कारण बन चुकी है। यात्रा से ज्यादा चर्चा खाट लूट की हुई है। अब खाट की चर्चा तो राजनीति में होना लाजमी है। आज की पीढ़ी के कई युवा खाट को नहीं जानते उनके लिए भी अब खाट चर्चा का विषय बन चुकी है। वास्तव में यह बहुत ही सहज और सरल है। इसे कभी भी कहीं भी लाया जा सकता है। बैठने में सरल है वहीँ लेटने में भी आरामदायक है।
खाट की महिमा अपरंपार है। पहले गलियों-मोहल्लों में चारपाई बीनने वालों की आवाजें आया करती थीं, किंतु अब ये आवाजें सुनाई नहीं देतीं। वर्तमान समय में नायलान की पट्टी से महज आधे घंटे में एक फोल्डिंग पलंग कसकर तैयार कर दिया जाता है। इनका इस्तेमाल आमतौर पर घर की छतों पर होता है। बाजार में आज कई प्रकार के पलंग या चारपाई बेचे जा रहे हैं। बेंत से भी इन्हें बनाया जा रहा है। आधुनिक घरों के हिसाब से इनकी खरीद होती है, लेकिन बाँध से निर्मित चारपाई अब बहुत कम देखने को मिलती है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी चारपाई का चलन है। इस पर बैठकर बड़े बूढ़े-बूढिय़ाँ अहम मसले तय करते थे। इसे मचिया भी कहते हैं। घर-घर में मचिया कहीं भी डाल ली जाती थी। इसे बैठक या चौपाल में भी खास जगह हासिल होती थी। यह भले ही सिंहासन नहीं कहला पाई हो, लेकिन सम्मानजनक आसन रही।
चारपाई नारियल की रस्सियों या बाँध से बुनी जाती थीं। इसे कपड़े की चौड़ी पट्टियों से भी बुना जाता था। बुनी हुई बड़ी-बड़ी चारपाईयाँ घर की आरामगाह से लेकर आँगन, छत, बैठक व दरवाजे की शोभा होती थी। शादी-विवाह में इन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। चारपाई उर्दू शब्द है। माना जाता है कि वर्ष 1845 में चारपाई का चलन शहरों में सामने आया। अँगुलियों के जादू का कमाल चारपाई कैसे कहलाया, इस पर भी कई किस्से हैं, लेकिन चौपाये से इसे जोडक़र देखा जाता है। चारपाई का चलन मुस्लिम शासकों के भारत पर अधिकार के बाद बहुत बढ़ा। चार बाँसों को जोडक़र उन्हें पायों के सहारे खड़ा किया जाता है। इसके बाद बाँध से चारपाई को बीनकर तैयार करते हैं। कीमत में कम और उठाने तथा रखने में आसान होने के कारण चारपाई हर घर की जरूरत थी। खाट के साथ कई किवदंतियां भी जुड़ी हैं। घर में जब किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तब 12 दिनों के लिए इसे घर के बाहर खड़ा कर दिया जाता है और बाद में दान में दी जाती है। बहरहाल कारण चाहे कुछ भी हो मगर खाट की चर्चा देश भर में जोरों से हो रही है। एक कहावत आज याद आ रही है- जाट रे जाट, तेरे सर पर खाट…लोग बोले आठ दुनी सोलह, जाट बोले सोलह दुनी आठ। खाट को लेकर इस तरह की कई बातें चर्चित हुई हैं।
उत्तर प्रदेश में चुनाव निकट आते ही राजनीतिक दल अपने अपने स्तर पर चुनावी तैयारियों में व्यस्त हो गये हैं। कहीं रैली तो कहीं खाट महा यात्रा निकाली जा रही है। खाट लूटने की खबरें भी सुर्खियों में है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने यूपी के देवरिया के रुद्रपुर में खाट सभा की। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार और पीएम नरेंद्र मोदी पर किसानों के मुद्दे को लेकर हमला बोला। राहुल की सभा में खासी भीड़ भी जुटी। लेकिन दिलचस्प ये रहा कि राहुल की सभा खत्म होने के बाद ही यहां खाट की लूट मच गई। गांव के लोग खाट उठाकर अपने-अपने घर की ओर रवाना हो गए। राहुल की सभा के लिए यहां काफी संख्या में खाट लगाई गई थी। लेकिन जैसे ही सभा खत्म हुई और राहुल गांधी वहां से गए तभी लोगों के बीच वहां बिछाई गई खाट को लूटने की होड़ मच गई। कोई सिर पर, तो कोई कंधे पर उठाकर खाट लेकर भागने लगा। कुछ लोग खाट के लिए आपस में हाथापाई भी करते नजर आए। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ग्रामीणों द्वारा खाट ले जाने पर चुटकी लेने वालों को करारा जवाब दिया। राहुल ने कहा कि जब एक किसान चारपाई लेकर चला गया तो उसे मीडिया और भाजपा चोर बोलती है, लेकिन जब विजय माल्या हजारों करोड़ ले कर विदेश भाग जाता है तो उसे डिफॉल्टर बोलते हैं। उन्होंने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि ये क्या है?
खटोले पर उडऩे वाले नेता अब खाट पर बैठने लगे। जमीनी हकीकत आदमी को आसमान से जमीन पर पटक देती है। विपक्षी दलों ने खाट सभा को नौटंकी और तमाशा कह कर खिल्ली उड़ाई है। यह तो आने वाला चुनाव और परिणाम ही बता पायेगा की खाट राजनीति कहाँ तक सफल हो पाती है। बहरहाल खाट चर्चा से देशवासी काफी आनंदित हैं और घर घर में खाट की ही बातें चटकारे लेकर हो रही हैं। युवा और बच्चे बड़े बुजुर्गों से खाट की कहानियां और कहावते चाव से सुन और समझ रहे हैं।

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