क्या हम मोगा सरीखी घटनाओं से कोई सबक लेंगे

-निन्दर घुगियाणवी
चलती बस में मां-बेटी को नीचे फेंक देने वाली मोगा जिले की घटना की गूंज भारत की संसद में भी पहुंची और इसने देश-विदेश में बसे भारतीय लोगों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा। दोनों स्थानों पर इसकी जोरदार निन्दा हुई। विदेशों के बहुत सारे रेडियो प्रोग्रामों और टी.वी. चैनलों ने इस घटना पर जोरदार चर्चा का आयोजन किया।
मृत लडक़ी के परिवार और सरकार के बीच बेशक अब समझौता हो गया है लेकिन अभी भी इस घटना ने लोगों का ध्यान भटकने नहीं दिया है। सरकार ने पीडि़त परिवार को 24 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देते हुए परिवार के एक सदस्य को किसी निगम अथवा बोर्ड में नौकरी देने की बात मान ली है।
इस घटना में जो हुआ, जहां हुआ और जैसे भी हुआ, उसके विवरण में जाने की जरूरत नहीं है। जनता को सब पता लग चुका है। लेकिन इस समय कुछ महत्वपूर्ण प्रश्र ये हैं कि क्या हम इस दिल दहला देने वाली घटना से कोई सबक सीखेंगे या फिर 4-5 दिन के शोर-शराबे के बाद सब कुछ ‘भूल’ जाएंगे और बार-बार ऐसी गलतियां करते, सुनते और देखते रहेंगे?
हमारे देश, खास तौर पर पंजाब में बसों के ड्राइवरों और कंडक्टरों (चाहे वे सरकारी हों या प्राइवेट) का बहुत देर से बुरा हाल है। पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी हरिन्द्र सिंह चहल अपनी पुस्तक ‘मेरे हिस्से दा पंजाब’ में लिखते हैं कि 60 वर्ष पूर्व भी ऐसी घटनाएं होती उन्होंने अपनी आंखों से देखी हैं, लेकिन तब मीडिया आज जैसा तेज नहीं था। एक बस ड्राइवर का प्रारंभिक कत्र्तव्य है कि बस में सवार यात्रियों के साथ-साथ उसने सडक़ों पर चल रहे अन्य लोगों की भी जिन्दगी की रक्षा करनी होती है। एक कंडक्टर का महत्वपूर्ण कत्र्तव्य है कि वह टिकट काटने के बाद बहुत सलीके से यात्री को सीट उपलब्ध करवाए। लेकिन क्या हमारे देश में यह सब कुछ हो रहा है?
इसका उत्तर है ‘बिल्कुल नहीं’। और यह बहुत उपहासजनक-सा लगता है। यह सच्चाई दरकिनार नहीं की जा सकती कि ड्राइवरों और कंडक्टरों (जिनकी अब ठेके पर भर्ती होती है) में बहुत से कोरे अनपढ़ हैं। इसके अलावा यदि पंजाब सरकार प्राइवेट और सरकारी बसों के सभी कर्मियों की जांच करवाए तो उनमें से 85 फीसदी नशेड़ी पाए जाएंगे। भारी मात्रा में नशे का सेवन करके वाहन चलाने वाले लोगों के जीवन के रक्षक कैसे बन सकते हैं? देख-सुनकर तो ऐसा आभास होता है कि सब कुछ ‘रब्ब आसरे’ ही चल रहा है।
परिवहन विभाग के उच्चपदस्थ सूत्रों के अनुसार प्रात: भुक्की, डोडे, अफीम व गोलियां और शाम को शराब के नशे में धुत्त होकर दिन के खाए नशे को हज्म करना इन परिवहन कर्मियों की पुरानी आदत है और लाख यंत्र करने के बावजूद वे इनसे पल्ला नहीं छुड़ा सकते। बस अड्डों पर यात्रियों को आवाजें लगाते और साथ ही जर्दा (तंबाकू) रगड़ते ये आम देखे जा सकते हैं।
बकाया लौटाने के झगड़े में कंडक्टर ने ‘बुजुर्ग की पगड़ी उतारी या दाढ़ी खींची’ जैसी खबरें छापने या पढऩे का अब कोई महत्व नहीं रह गया क्योंकि यह तो रोज का काम बन गया है। बसों में चलते गंदे गीतों या लड़कियों से छेड़छाड़ करने के कारण ‘छित्तर-परेड’ के समाचार भी आम छपते रहते हैं। बस में शरारती तत्वों द्वारा महिलाओं-छात्राओं के साथ होने वाली छेडख़ानी बस ड्राइवर और कंडक्टर ने ही रोकनी होती है, लेकिन जब वे खुद ही ऐसी करतूतों पर आमादा हो जाएं तो देश का क्या बनेगा?
दिल्ली में हुए ‘निर्भया सामूहिक दुष्कर्म’ का कलंक अभी देश के माथे से उतरा भी नहीं कि पंजाब में ‘नया चंद चढ़ गया’ है। यह लिखते हुए मुझे अपनी विदेश यात्राओं दौरान बसों के रमणीक सफर की याद कभी नहीं भूलेगी। उन देशों में आम तौर पर ड्राइवर अकेला ही बस लेकर जाता है। यदि पहले बुकिंग न हुई हो तो टिकट भी ड्राइवर ही देता है। उन देशों के बस ड्राइवरों का सलीका जिन लोगों ने देखा और भोगा है, वे ही इसकी खूबियों का बखान कर सकते हैं। स्नेह और जिम्मेदारी का दामन वे कभी नहीं छोड़ते। सवाल पैदा होता है कि क्या सरकार के परिवहन विभाग ने अपने कर्मियों को नैतिकता का सबक पढ़ाने के लिए कोई सैमीनार या वर्कशाप आयोजित की है? उत्तर नकारात्मक ही होगा। अब मोगा जिले की घटना के बाद उपमुख्यमंत्री ने कुछ दिनों के लिए ‘ऑर्बिट’ कम्पनी की बसें बंद करके 300 बस कर्मियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कैम्प का आयोजन करवाया है और दिल्ली से 11 सदस्यीय विशेषज्ञ दल को उन्हें ‘चंगे बंदे’ बनने का सबक पढ़ाने के लिए बुलाया है।
सब जानते हैं कि मोगा जिले के कस्बा बाघापुराना के निकटवर्ती टोल प्लाजा के समीप हुई बस घटना में मारी गई 13 वर्षीय अर्शदीप कौर की मां शिन्दर कौर भी जीवन-मौत की लड़ाई लड़ रही है। बादल साहब का कहना है कि बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि यह बस उनकी थी और सुखबीर बादल को कहेंगे कि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो। सुखबीर बादल ने बयान दिया है कि दोषी किसी कीमत पर बख्शे नहीं जाएंगे। सभी दोषी पुलिस हिरासत में हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना बादल सरकार के लिए नमोशीपूर्ण होने के साथ-साथ चुनौती भरी भी है। ऐसी घटनाएं हमारे समाज को लगातार गिरावट की ओर ले जा रही हैं। इसलिए हम सभी को इन्हें रोकने के लिए गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि किसी न किसी हद तक हम सभी ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

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