क्या सर्जरी करेगी कांग्रेस?

डॉ. गौरीशंकर राजहंस

इसमें कोई संदेह नहीं कि पांच राज्यों में अभी अभी संपन्न हुए विधानसभा के चुनावों के परिणाम अत्यन्त आश्चर्यजनक और सुखद हैं। भाजपा को बिहार और दिल्ली में हार का सामना करने के बाद असम में एक बहुत बड़ी जीत हासिल हुई। पहली बार किसी बड़े पूर्वोत्तर राज्य में कमल खिला। भाजपा ने अन्य राज्यों में भी महत्वपूर्ण जीत हासिल की।
सबसे बड़ी उपलब्धि पश्चिम बंगाल की नेता ममता बनर्जी को हासिल हुई। उन्हें इस चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिला और उन्होंने यह दिखा दिया कि उन्होंने मां, माटी और मानुष का जो नारा दिया था उसे पश्चिम बंगाल की जनता ने शिरोधार्य किया। दो तिहाई सीट जीतकर पश्चिम बंगाल में उन्होंने इतिहास रच डाला। ममता बनर्जी ने 45 दिनों तक कड़ी धूप में लगातार प्रचार किया और प्राय: 200 चुनावी सभाएं की। विपक्षी दलों ने उन पर कई झूठे आरोप लगाए, परन्तु जनता ने सारे आरोपों को बेबुनियाद साबित कर दिया और उन्हें सिर-आंखों पर बिठा लिया।
ममता बनर्जी को मैं बहुत निकट से जानता हूं। सादगी उनके जीवन का अंग है। आठवीं लोकसभा में 1984 से 1989 तक सुनील दत्त, ममता बनर्जी और मैं लोकसभा में एक ही सीट पर पांच साल तक बैठते रहे। हमारे पीछे की कतार में अमिताभ बच्चन बैठते थे। ममता बनर्जी प्राय: प्रतिदिन हर डिबेट में भाग लेती थीं। पार्लियामेंट लाइब्रेरी में विभिन्न विषयों पर गहन अध्ययन करने के बाद वे अपना भाषण देती थी। शुरू के प्राय: एक महीना बीत जाने के बाद मैंने उनसे आग्रह किया कि वे कोलकाता में ऐसे क्षेत्र से आती हैं जहां बिहार और उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी लोग भारी संख्या में रहते हैं।
यहां तक कि काली मंदिर में भी हिंदी भाषी पुजारी हैं। बोलचाल में तो आप हिंदी में बोल ही लेती हैं, लोकसभा में भाषण भी हिंदी में दीजिए। शुरू में उन्हें कुछ संकोच हुआ, परन्तु मैंने उनका उत्साह बढ़ाया और कहा कि इस सदन में अधिकतर सदस्य हिंदी भाषी हैं और जब वे हिंदी में भाषण देंगी तो सारे सदस्य मेज थपथपायेंगे। ठीक वैसा ही हुआ। उसके बाद ममता बनर्जी ने अपने अधिकतर भाषण हिंदी में ही दिए।
जब उन्होंने अपना पहला भाषण हिंदी में दिया था तो दूसरे दिन दिल्ली के सभी हिंदी समाचारपत्रों ने लिखा था कि ममता ‘हिंदी की बिंदी’ हैं। फिर तो यह सिलसिला जारी ही रहा। मैं कोलकाता में ममता बनर्जी के घर पर भी गया हुआ हूं। उनमें सादगी कूट-कूटकर भरी पड़ी है और मुख्यमंत्री होने के बाद भी उनमें घमंड नाममात्र का भी नहीं है। यह अत्यन्त प्रसन्नता की बात है कि केन्द्र और ममता बनर्जी दोनों ने एक दूसरे के साथ सहयोग करने का फैसला किया है। पश्चिम बंगाल ही नहीं पूरे देश की जनता इसका हृदय से स्वागत करेगी।
भाजपा ने असम में जो अभूतपूर्व सफलता पाई है वह सचमुच ऐतिहासिक है। किसी को उम्मीद नहीं थी कि असम में उसे इतनी भारी सफलता मिलेगी। विभिन्न एक्जिट पोल में भी कहा गया था कि शायद कांग्रेस दोबारा से सत्ता में आ जाए, परन्तु 15 साल तक असम में राज करने के बाद कांग्रेस इतनी अलोकप्रिय हो गई थी कि उसका फिर से सत्ता में आना असंभव लगता था। बांग्लादेश घुसपैठियों के मुद्दे ने असम की जनता को बहुत ही बेचैन कर दिया था। असम की मूल जनता के रोजगार बांग्लादेश के घुसपैठिये मार रहे थे।
यह सिलसिला फखरूद्दीन अली अहमद के समय से चलता आ रहा था। लोग परिवर्तन चाहते थे और कांग्रेस के दुष्प्रचार के बावजूद लोगों ने भाजपा को भारी बहुमत से जिता दिया। भाजपा ने अपना खेल बहुत ही चतुराई से खेला। हेमन्त विश्वास शर्मा जो तरुण गोगोई का दाहिना हाथ थे, उन्हें भाजपा ने अपनी ओर मिलाया और भाजपा का सदस्य बना लिया। शर्मा को विश्वास था कि जब कभी तरुण गोगोई को हटाने की बात होगी तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, परन्तु तरुण गोगोई जिनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है, उन्होंने शर्मा के बदले अपने बेटे को आगे बढ़ाया। यह देखकर शर्मा निराश हो गए।
ऐसे में जब उन्हें भाजपा से निमंत्रण मिला तो उन्होंने भाजपा में जाने में कोई देर नहीं लगाई। भाजपा ने जनजाति के नेता सर्वानन्द सोनोवाल को शुरू में ही मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। सोनोवाल जनजाति से आते हैं इसलिए असम की जनजातियों का भी भारी समर्थन भाजपा को मिला। असम के चाय बागानों में बिहार और उत्तर प्रदेश के लाखों मजदूर रहते हैं। उन्होने कई बार गोगोई सरकार से अपनी समस्याओं के बारे में फरियाद की, परंतु गोगोई सरकार के कानों पर जूं तक नहीं करेंगी। असम में जिस तरह भाजपा गाजे बाजे के साथ काबिज हो गई है। इसका असर पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों पर भी पड़ेगा। एक महत्वपूर्ण जीत तमिलनाडु में जयललिता की हुई।
सारे एक्जिट पोल में कहा गया था कि इस बार जयललिता दोबारा सीएम नहीं बन पाएंगी। तमिलनाडु में यह इतिहास रहा है कि एक बार द्रमुक और दूसरी बार अन्नामुद्रक सत्ता में आती है। कहते हैं कि जयललिता ने गरीबों के लिए बहुत काम किया है। उन्होने राशनकार्ड धारकों को बीस किलोग्राम चावल दिया, मिक्सरग्राइंडर, दूधारु गाय और महिलाओं को मंगलसूत्र के लिए चार-चार ग्राम सोना दिया था। चुनावी सभाओं में उन्होने वादा किया था कि सत्ता में आने पर महिलाओं को मंगलसूत्र के सोने के बढ़ाकर आठ ग्राम कर दिया जाएगा और राशनकार्ड धारकों को मुफ्त मोबाइल फोन और कामकाजी महिलाओं को पचास प्रतिशत छूट के साथ स्कूटी दी जाएगी।
तमिलनाडु की गरीब जनता को अम्मा के वादों पर पूरा विश्वास था, इसलिए उन्होने जी जान से अम्मा का साथ दिया। केरल में कांग्रेस की बुरी तरह हार हो गई और एलडीएफ की जीत हुई। लोगों को आश्चर्य हो रहा था कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने लेफ्ट से हाथ मिलाया था और मिलकर ममता बनर्जी की पार्टी के खिलाफ काम करते रहे। इस तरह कांग्रेस के हाथ से दो बड़े राज्य असम और केरल निकल गए। इन विधानसभा चुनावों का संदेश यही जाता है कि भाजपा मजबूत हो रही है और कांग्रेस बुरी तरह सिमट रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने ठीक कहा है कि कांग्रेस में एक बड़ी सर्जरी की आवश्यकता है। देखना यह है कि यह सर्जरी कितनी जल्दी हो पाती है।

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