क्या रूप धारण करेंगे जम्मू-कश्मीर में उठे विवाद

बी. के. चम
जम्मू-कश्मीर में आगे क्या होगा? इस प्रश्न का उत्तर बड़ी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि पी.डी.पी.-भाजपा गठबंधन सरकार सत्तासीन होने के बाद उठे विवाद कौन-सा रूप ग्रहण करते हैं। ये विवाद सत्तारूढ़ पार्टियों के आपस में टकराते हितों तथा नरमपंथी हुर्रियत कांफ्रैंस द्वारा राज्य में शिक्षा का इस्लामीकरण करने की मांग के कारण पैदा हुए हैं। एक अन्य विवाद अलगाववादी आतंकी नेता मसरत आलम की पाकिस्तानी झंडा फहराने एवं भीड़ को भारत विरोधी नारे लगाने के लिए उकसाने के आरोप में जन सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत गिरफ्तारी से संबंधित है।

सत्ता की ललक अजीब दोस्तियों का आधार बनती है। सरकार बनाने के लिए दोनों पार्टियों ने धारा 370 तथा सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) के संबंध में अपने मूलभूत पैंतरे को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला कर लिया। भाजपा धारा 370 को रद्द करने के लिए दबाव बना रही थी क्योंकि कश्मीर में हल्के युद्ध जैसी बगावती स्थिति से लडऩे के लिए यह इसके निरस्त्रीकरण को अनिवार्य मानती है।

पी.डी.पी.-भाजपा सरकार का बनना अलगाववाद-आतंकवाद से पीडि़त इस राज्य के लिए शुभ शकुन माना गया था लेकिन 1 मार्च को कार्यभार संभालने वाली गठबंधन सरकार ने 2 माह के अंदर ही अशुभ शकुनों के संकेत देने शुरू कर दिए। बेशक मुफ्ती मोहम्मद सईद नीत सरकार की स्थिरता को निकट भविष्य में कोई खतरा नहीं, फिर भी गठबंधन सहयोगियों के वैचारिक मतभेद और क्रमश: कश्मीर घाटी व जम्मू में अपने-अपने क्षेत्रीय गढ़ों में उनके हितों के टकराव को सत्तारूढ़ गठबंधन सहभागियों तथा मोदी सरकार के लिए ङ्क्षचता का स्रोत बनते देर नहीं लगेगी।
चिंता के बीज दो घटनाक्रमों द्वारा बो दिए गए हैं : (1) कश्मीर घाटी को प्रस्तावित आल इंडिया इंस्टीच्यूट आफ मैडीकल साइंसिस (एम्स) के आबंटन पर उठा विवाद और (2) नरमपंथी हुर्रियत कांफ्रैंस द्वारा इस्लामी अध्ययन को जम्मू व कश्मीर के सरकारी व प्राइवेट शिक्षण संस्थानों के स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम का अंग बनाए जाने की मांग करना। दोनों घटनाक्रमों के कारण संघ परिवार और इसके घटकों को राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। खास तौर पर पी.डी.पी. के साथ गठबंधन के पार्टी के फैसले में केन्द्रीय भूमिका अदा करने वाले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की छवि आहत हो सकती है। पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी द्वारा बड़ी छलांग लगाने की शाह की योजनाएं अभी-अभी वहां हुए स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा को भारी आघात लगने के कारण बुरी तरह विफल हुई हैं। अपनी पार्टी द्वारा भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाए जाने पर टिप्पणी करते हुए मुफ्ती सईद ने गठबंधन को ”उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों का मिलनÓÓ करार दिया है। उनका ऐसा कहना गलत भी नहीं। दोनों पाॢटयों की विचारधाराएं एक-दूसरे के विपरीत हैं। जहां पी.डी.पी. मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर के लिए अधिक स्वायत्तता की पक्षधर है, वहीं संघ परिवार (यानी कि भाजपा) राज्य को ‘हिन्दुओं के देशÓ एकीकृत हिन्दुस्तान का अटूट अंग मानता है।
सत्ता की ललक अजीब दोस्तियों का आधार बनती है। सरकार बनाने के लिए दोनों पार्टियों ने धारा 370 तथा सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) के संबंध में अपने मूलभूत पैंतरे को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला कर लिया। भाजपा धारा 370 को रद्द करने के लिए दबाव बना रही थी क्योंकि कश्मीर में हल्के युद्ध जैसी बगावती स्थिति से लडऩे के लिए यह इसके निरस्त्रीकरण को अनिवार्य मानती है लेकिन पी.डी.पी. इस धारा को बनाए रखना चाहती है क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करती है। यह वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत उपलब्ध स्वायत्तता का दायरा बढ़ाने की मांग को भी आगे बढ़ाती रही है। प्रस्तावित ‘एम्सÓ के आबंटन पर उठे विवाद ने तो कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्रों को एक प्रकार से एक-दूसरे के विरुद्ध टकराव की मुद्रा में ला दिया था।
भाजपा के गढ़ जम्मू क्षेत्र के लोगों का दावा था कि इस क्षेत्र की जनसंख्या जहां घाटी की तुलना में अधिक है, वहीं जहां पर्याप्त मैडीकल आधारभूत ढांचे की कमी है, इसलिए ‘एम्सÓ के आबंटन का हकदार जम्मू क्षेत्र है। घाटी को इसका आबंटन करना जम्मू क्षेत्र के साथ भेदभाव की कार्रवाई होगी। संघ परिवार के विभिन्न घटकों सहित समस्त पाॢटयों तथा व्यापारिक संगठनों के आह्वान पर 24 अप्रैल को जम्मू में कश्मीर को ‘एम्सÓ के आबंटन के विरुद्ध रोष व्यक्त करने के लिए मुकम्मल बंद रखा गया। इस मुद्दे ने भाजपा के अंदर के मतभेद भी उजागर कर दिए हैं।
जम्मू क्षेत्र के हिन्दू संगठनों तथा भाजपा द्वारा मिलकर लिए गए स्टैंड के विपरीत पार्टी के उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने कहा, ”कश्मीर से एम्स छीन कर जम्मू को देने का सवाल ही पैदा नहीं होता। हम जम्मू इलाके में अलग ‘एम्सÓ के लिए संघर्ष कर सकते हैं।ÓÓ

सत्ता में टिके रहने की मजबूरियों के चलते दोनों गठबंधन सहयोगी दहकते विवादों पर समझौता करने के लिए संभवत: कड़ा संघर्ष करेंगे। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सुरक्षा और अलग-थलग पड़ चुके घाटी की आबादी के बड़े हिस्सों को राष्ट्रीय मुख्य धारा में वापस लाने से संबंधित मुद्दों को कैसे हैंडल किया जाए क्योंकि यदि ताजा घटनाक्रमों की रोशनी में देखा जाए तो ये मुद्दे व्यापक आयाम धारण करते जा रहे हैं।

सुरक्षा संबंधी मुद्दे मुख्य तौर पर अलगाववादियों-आतंकियों द्वारा अपनी रणनीति बदलते हुए सिविलियन हत्याओं का रास्ता छोड़ कर सुरक्षा बलों को अपना मुख्य लक्ष्य बनाने से संबंधित हैं। भारतीय सुरक्षा बल अलगाववादियों-आतंकियों के हमलों से निपटने की अपनी क्षमता पहले ही बखूबी सिद्ध कर चुके हैं। यह देखा जाना बाकी है कि पाकिस्तानी सेना के कुछ तत्वों द्वारा समॢथत आतंकी मुम्बई हमलों के सूत्रधार हाफिज सईद द्वारा हाल ही में दोबारा गिरफ्तार हुए अलगाववादी नेता मसरत आलम केे साथ पुन: संबंध स्थापित करने की रोशनी में कौन-सी रणनीति अपनाते हैं। जन सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत मसरत आलम की पुन: गिरफ्तारी से पूर्व छिन्न-भिन्न हो चुकी हुर्रियत कांफ्रैंस के विभिन्न गुटों ने राज्य सरकार द्वारा उसकी रिहाई का स्वागत करने के लिए आपस में हाथ मिला लिए थे।

कहावत है ”बोए पेड़ बबूल के, आम कहां से होयÓÓ। यह लोकोक्ति भाजपा द्वारा शिक्षा का भगवाकरण करने पर लागू होती है। हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर नीत भाजपा सरकार यह दावा कर सकती है कि राज्य के स्कूलों में आगामी शैक्षणिक सत्र से हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ ‘गीताÓ की अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई की शुरूआत करने वाली प्रथम सरकार होने का श्रेय उसे हासिल है। इस स्तंभ में अप्रैल के प्रारम्भ में यह लिखा जा चुका है कि ”एक बहुसांस्कृतिक तथा बहुभाषीय राष्ट्र होने के कारण भारत के मजहबी अल्पसंख्यक भी अब मांग कर सकते हैं कि उनके पवित्र ग्रंथ कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब एवं अंजील की पढ़ाई भी स्कूलों में अनिवार्य की जाए।ÓÓ जिस बात की आशंका थी वह आखिर अवघटित हो ही गई है।

29 अप्रैल को नरमपंथी हुर्रियत
कांफ्रैंस के चेयरमैन मीरवायज उमर फारूक ने जम्मू व कश्मीर के सरकारी व प्राइवेट शैक्षणिक संस्थानों में इस्लामी धर्म ग्रंथों के अध्ययन को पाठ्यक्रम का अंग बनाए जाने की मांग की। हुर्रियत के अंदरूनी स्रोतों का कहना है कि ”मीरवायज ने यह मांग आर.एस.एस. तथा इस जैसे अन्य हिन्दू दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा गीता को स्कूलों में अनिवार्य करने के कदम का मुकाबला करने के लिए उठाई है।ÓÓ

राजनीतिक बदलाखोरी के खेल में मजहब को राजनीति से गडमड करने तथा राजनीतिक लक्ष्यों की साधना करने के लिए सत्तातंत्र द्वारा मजहबी एजैंडे का दुरुपयोग करना हिन्दुस्तान जैसे बहुसांस्कृतिक और बहुभाषीय देश की एकजुटता के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है। राजनीतिक पार्टियां अपनी राजनीतिक हित साधना के लिए मजहब के दुरुपयोग को जितनी जल्दी तिलांजलि दे देंगी, उतना ही बेहतर होगा।

 

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